CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Wednesday, May 23, 2018

आकाश छूती तेल की कीमतें 

आकाश छूती तेल की कीमतें 

जिस तरह से कोई भी मोदी जी ने एक जुमला दिया था ​2014 के चुनाव प्रचार के दौरान कि  "अच्छे दिन " आने वाले हैं। इसका विलोम होगा या होता है कि "बुरे दिन " आने वाले हैं।  अच्चे दिन अचानक आते हैं और ना बुरे दि दोनों धीर- धीरे आते हैं। तो ... भाई बुरे दिन की शुरूआत हो चुकी है।  इसका सबसे ज्यादा असर  डीजल - पेट्रोल खरीदते समय दिखायी देता है।  2014 और 2018 के बीच  सस्ते कच्चे तेल के पुराने अच्छे  दिनों को नहीं भूल सकता। वे दिन थे जब दुनिया सस्ते तेल के लाभ का आनंद ले रही थी, लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अवसर का इस्तेमाल कियकिड़की के दिनों के लिए पैसे बचाने के नाम पर पेट्रोलियम उत्पादों पर भारी कर लगा दिया। तेल की बढ़ी कीमतों के नीचे  कुचल रहा देश क्या सरकार से यह पूछने की हिमाकत कर सकता है कि , सस्ते तेल से बचत और उच्च कराधान से हुई कमाई कहां गयी?  क्या सरकार कड़की के दिनों के लिये बचा कर रखी गयी उस राशि से कराहते देश की मदद कर सकती है?  जवाब चार वर्षों के विचित्र वित्तीय प्रबंधन की कथा में निहित है। आइए हम उस कथा को सुनते हैं -  

पहले साल यानी  2014 की दूसरी छमाही में तेल की कीमतों में गिरावट की शुरूआत तब हुई  जब 2008 में  कच्चा तेल 132 डॉलर प्रति बैरल की दर को छू कर इस अवधि में  46 डॉलर प्रति बैरल हो गया।  कच्चे तेल की कमी ने सरकार को ईंधन की कीमतों को विनियमित करने के लिए स्वच्छंदता प्रदान किया और तेल विपणन कंपनियों ने दैनिक आधार पर कच्चे तेल और  और अन्य लागतों के आधार पर कीमतें बदलनी शुरू कर दीं। इधर   लोग कच्चे तेल में गिरावट  के कारण सस्ते ईंधन की उम्मीद कर रहे थे, सरकार ने पेट्रोलियम में उत्पाद शुल्क 21.5 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिया और वित्त वर्ष 2014 तक डीजल में 17.3 रुपये प्रति लीटर और बढ़ाया।  इससे वित्त वर्ष 2014 में पेट्रोलियम उत्पादों से आय के जमा  में वृद्धि हुई और और उसका अनुपात  सकल घरेलू उत्पाद का 1.6 प्रतिशत हो गया, जो कि वित्त वर्ष 2014 में केवल 0.7 प्रतिशत था। इसके परिणामस्वरूप दशकों में तेल पर रिकॉर्ड टैक्स संग्रह हुआ। अब देखें कि इस कमाई का उपयोग कैसे किया जाता था-पेट्रोलियम उत्पादों पर उच्च उत्पाद शुल्क से हासिल  लाभ का एक बड़ा हिस्सा 14 वें वित्त आयोग की सिफारिशों को पूरा करने के लिये राज्यों में स्थानांतरित कर दिया गया। शेष धन का उपयोग सरकारी कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग का भुगतान करने के लिए  उपयोग किया गया। सस्ते कच्चे तेल के पुराने अच्छे  दिनों के दौरान अर्जित दो और लाभ हुये कि  थोक मुद्रास्फीति 5.2 से 1.8 प्रतिशत और खुदरा 9.4 से 4.5 प्रतिशत तक गिर गई थी। इसके अतिरिक्त, सस्ते आयात ने चालू खाता घाटे - विदेशी व्यापार घाटे सहित बाह्य संसाधनों के प्रवाह इत्यादि को सहनीय स्तर तक पहुंचा दिया। अर्थव्यवस्था पेट्रोल और अर्थव्यवस्था पीट्रोल - डीजल की बढ़ती कीमतों के आधार पर   ताजा मुद्रास्फीति का आकलन करती है। अब गैर-सब्सिडी वाले एलपीजी से होने वाली आय जल्द ही इस में शामिल हो जाएगी।यदि वर्तमान मूल्य निर्धारण फारमूले जारी रहे तो मुद्रास्फीति में वृद्धि होगी।  यही नहीं चालू खाता घाटा भली  बढ़ने की संभावना है। इसके अलावा  रुपये में गिरावट आई है।

अर्थव्यवस्था को तेल उबाल से बचाने के लिए सरकार को राजकोषीय घाटे के मोर्चे पर जोखिम उठाना होगा।  वित्त मंत्रालय के पास उत्पाद शुल्क को कम करके ईंधन की कीमतों को कम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। 65डालर प्रति बैरेल पर कच्चे तेल की कीमत को  मानते हुए, उत्पाद शुल्क में 2 रुपये प्रति  लीटर की कमी से राजकोषीय घाटे में बजट अनुमानों से 10-12 बीपीएस की वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा, जीएसटी राजस्व में भी कमी से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।चूंकि तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और राजस्व फिसल रहा है, जीएसटी के दायरे में डीजल-पेट्रोल की कीमतें लाने का विचार अब बेकार हो गया। 

पिछले चार वर्षो  में, सरकार ने सस्ते तेल पर भारी कर लगाया लेकिन बचत और कमाई का प्रबंधन करने के लिए एक व्यवहारिक तरकीब की जहमत नहीं उठायी। जब दुनिया सस्ते ईंधन से लाभान्वित हो रही थी, तो भारतीय खुशी से महंगा ईंधन खरीद रहे थे। अब देखना है कि सरकार भविष्य में हमारी कठिनाइयों को कम करने के लिए क्या करती है? 

इन आंकड़ों को जानकर पता चलेगा कि पिछले चार वर्षों में तेल अर्थव्यवस्था के प्रबंधन का पैटर्न प्रभावी रूप से राजकोषीय कुप्रबंधन की कहानी है। पिछले चार वर्षों की राजकोषीय कौशल और कृति अनिवार्य रूप से सस्ते कच्चे तेल और भारी कराधान की आय पर आधारित थी। मिल्टन फ्रीडमैन की बात हमारे  निकटतम पेट्रोल स्टेशन पर सच हो रही है: "यदि आप  सरकार को  सहारा रेगिस्तान सौंप देते हैं, तो पांच साल में रेत की कमी हो जायेगी।"

Tuesday, May 22, 2018

मोदी भक्तों के हाथ के तोते उड़ गये

मोदी भक्तों के हाथ के तोते उड़ गये

अंत में बाजी राहुल गांधी के हाथों में आ गयी। यदि कांग्रेस अध्यक्ष हर चुनाव​ी पराजय के बाद अपने विरोधियों को खुल कर खेलने तथा उपहास करने के मैदान छोड़ जाते थे इस बार वे टिक गये और ताल ठोंकने लगे। बीएस येदियुरप्पा ने विधान सभा में हार मानने के चंद मिनट  पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। इसमें राष्ट्र गान बजाया गया और जिसमें भाजपा के  विधायकों द्वारा सदन को त्यागने के लिए उनपर छींटाकशी हुई। राहुल गांधी ने जनता को यह बताने का प्रयास किया कि किस तरह " राष्ट्रवादी पार्टी " ने राष्ट्रगान का अपमान किया। उसकी कथनी क्या है और करनी क्या है। यहां आ कर भाजपा फंस गयी और उससे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। यहां तक कि उसके परम भक्तों की भी बोलती उस समय बंद थी जब यह बताया जा रहा था कि किस तरह इसी पार्टी ने एक समय राष्ट्रगान पर बहस के दौरान कितना बवाल खड़ा किया था।  उन्होंने कहा कि यह व्यवहार और विचारधारा की लड़ाई जो हम लड़ रहे हैं।"राहुल गांधही ने कहा कि पूरी योजना बना कर भाजपा के विधायकों और स्पीकर ने राष्ट्रीय गान से पहले सदन को  छोड़ने का अवसर चुना? इससे यह पता च्9ालता है कि वे अगर सत्ता में हैं तो  किसी भी संस्था का अपमान कर सकते हैं, बीजेपी और आरएसएस दोनों में अपमानजनक संगठन हैं। उन्होंनें आगे कहा कि प्रधान मंत्री (श्री मोदी) कहते हैं कि वह भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं, लेकिन "वह खुद भ्रष्टाचार हैं।"राहुल गांधी ने कहा, "मुझे आशा है कि बीजेपी और आरएसएस एक सबक सीखेंगे कि देश की इच्छा का अपमान नहीं किया जा सकता है।"

मीडिया ने 2019 के लोकसभा चुनावों की  बड़ी लड़ाई की शुरुआत के बारे में अपनी सामान्य गतिविधि  शुरू कर दी थी क्योंकि सबको सहज ही अनुमान था कि भाजपा ही जीतेगी पर राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी की पकड़ से लोकतंत्र को बचाने के लिए बहुत सावधानी से उस अनुमान को गलत साबित कर दिया। असामान्य रूप से आक्रामक मनोदशा में, पहली बार कांग्रेस के अध्यक्ष  ने मोदी जी बखिया उधेड़ दी। "नरेंद्र मोदी के भ्रष्टाचार" से  लड़ने के लिए अपनी पार्टी के कार्यकर्तओं  और जेडी (एस) को बधाई देते हुए राहुल ने कहा कि उन्हें "गर्व है कि विपक्ष एक साथ खड़ा हुआ है और उसने भाजपा को हराया है"। ऐसा लगता है कि राहुल गांधी , उन सभी संभावित  अपमानजनक भविष्यवाणियों का उत्त्त्तर देने के लिये तैयार थे ,जिसके जरिये  विरोधियों ने उन्हें पहले ही ढेर कर देने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा, "प्रधान मंत्री मोदी भ्रष्टाचार के बारे में बात करते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि प्रधान मंत्री मोदी एक तरह से खुद भ्रष्टाचार है।" उन्होंने कहा कि  "विधायकों की खरीद सीधे नई दिल्ली द्वारा अधिकृत थी"। राहुल ने ऑडियो क्लिप का जिक्र किया था जिसमें येदियुरप्पा सहित भाजपा  नेताओं द्वारा विधायकों की खरीद का आरोप लगाया गया था। राहुल गांधी ने कहा ,"मुझे यह कहते हुए गर्व है कि भारत में, शक्ति सबकुछ नहीं है, पैसा सबकुछ नहीं है ... लोगों की इच्छा ही सब कुछ है।" भाजपा,  जिसे कर्नाटक के गवर्नर ने बुधवार को 104 सीटों पर सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था, बहुमत के आठ से कम थी। शनिवार को, येदियुरप्पा ने स्वीकार किया कि उनकी पार्टी आवश्यक संख्या जुटाने में विफल रही है। आने वाले दिनों में कर्नाटक के विकास पर सभी आंखें टिकी होंगी और  एक बात निश्चित रूप से है - कोई भी राहुल गांधी की राजनीति में उपस्थिति को चुनौती नहीं देगा। निश्चित रूप से कांग्रेस अध्यक्ष, अगला "तूफान" हैं।

अब भयानक संक्रमित चिकेन भी बाजार में

अब भयानक संक्रमित चिकेन भी बाजार में

भारी पैमाने पर महामारी फैलने का खतरा

हरिराम पाण्डेय

कोलकाता :  अभी अखाद्य और सड़े मांस को होटलों- रेस्तराओं में खिलाये जाने की घटना की गूंज बाकी ही हे कि जानलेवा जीवाणुग्रस्त मुर्गियों (चिकेन) को कोलकाता और आसपास के शहरों सहित सीमावर्ती राज्यों के बाजारों में बहुत तेजी से  बेचे जाने की खबर है। इन मुर्गियों में निमोनिया के इतने खतरनाक जीवाणु हैं कि इससे  4 महीने से एक साल के बीच लगभग 3 लाख लोगों की मौत हो सकती है और इतने ही पशुपक्षी बीमार हो सकते हैं जो इन जीवाणुओं के वाहक के रूप में महामारी और फैला सकते हैं। 

अमरीका में विगत तीन वर्षों से अमरीका में ए (एच7एन9) एवियन फ्लू के उपचार के लिये लगभग एक लाख मुर्गियों पर प्रयोग चल रहा था। ये वाइरस पक्षियों और पशुओं के ​लिये बहुत खतरनाक थे और इनका तेजी से संक्रमण होता था। जून 2015 में इस बीमारी से 5 करोड़ पक्षी मरे थे ओर अमरीकी अर्थ व्यवस्था को 3.3 अरब डालर का आघात लगा था।  गत वर्ष यानी 2017 के सितम्बर में  प्रयोग के दौरान  अचानक 15 लाख मुर्गियों में एच5एन6 के वाइरस देखे गये जो पक्षियों के लिये हानिकारक नहीं थे बल्कि मनुष्यों के लिये अतिमारक थे। " एशियन पैसेफिक जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल बायोमेडिसिन " के मुताबिक ये वाइरस हथियार की तरह मारक हैं और बेहद खतरनाक हैं। यह संक्रामक है और अन्य पक्षियों मनुष्य तथा जीव जंतुओं में  में तेजी से फैलता है। इस का असर चार महीनों में दिखने लगता है।

 इन मुर्गियों को प्रयोगशाला से तत्काल बाहर कर दिया गया। सावधानीवश भारत सरकार ने इन मुर्गियों के आयात पर तुरत रोक लगा दिया। डब्लू टी ओ ने रोक हटाने  के लिये हस्तक्षेप भी किया पर कुछ नहीं हुआ। 2018 की जनवरी में पाया गया कि लगभग एक लाख  33 हजार मुर्गिया वहां से गायब हो गयीं हैं। अत्यंत सुविज्ञ सूत्रों के मुताबिक उन मुर्गियों को भारत ले आया गया है और बेचा जा चुका है। अमरीकी विदेश विभाग के अनुसार ,संदेह है कि यह काम आतंकियों का है और वे समुद्री राह से इन्हें यहां ले आये हैं। अमरीका ने सरकारी तौर पर भारत सरकार के खाद्य विभाग को यह सूचना दे दी थीं ओर जब तक वह चेते तबतक मुर्गियां बिक चुकी थीं। भारत में पोल्ट्री का 50 हजार करोड़ रुपये का कारोबार है और पहले से ही जिनेटिकली मोडिफायड अनाज और सोया बीज खिलाये जाने वाली अमरीकी मुर्गियों को लेकर बवाल मचा हुआ है।  

Monday, May 21, 2018

यह हमारे लोकतंत्र का नाटक है

यह हमारे लोकतंत्र का नाटक है
पिछले कुछ दिनों से कर्नाटक में जो चल रहा है वह दरअसल केवल वहीं नहीं है बल्कि हमारे पूरे लोकतंत्र में यह हो रहा है। हम चौबीसों घंटे छोटी-छोटी सियासी लड़ाइयों में जुटे रहते हैं और उन्हें जीतने की कोशिश में  लगे रहते हैं।यह नहीं देख रहे हैं कि इस विजय में हम सामूहिक रूप से पराजित होते जा रहे हैं। दरअसल, हमारा लोकमानस संवाद के संकट से गुजर रहा  है । बाहर -बाहर दिख रहा है कि जोरदार संवाद चल रहा है लेकिन भीतर से सब कुछ मौन है। पूरा समाज कई गुटों में बंट गया है। कोई किसी खास व्यक्ति की आलोचना में जुटा हुआ है तो कोई गुट किसी विशेष संगठन की निंदा ही अपना उद्देश्य बना रखा है। जितनी भी घटनाएं घटती हैं सबका राजनीतिकरण होता जा रहा है। हमारे सारे संबंध ,सारे रिश्ते इसी की भेंट चढ़ गए हैं और हम अलग अलग लड़ाईयां जीतने में जुटे हुए हैं। हम यह नहीं देख पा रहे हैं यह विजय एक समष्टिगत पराजय है। इस पराजय से अनभिज्ञ हम अपनी सुविधा के अनुसार अपने-अपने गुट बना ले रहे हैं और एक दूसरे की पीठ ठोंकने या फिर उसकी आलोचना करने में जुट गए हैं। इस प्रक्रिया में चुटकुलों से लेकर गालियों तक का इस्तेमाल खुलकर हो रहा है। यही नहीं  इतिहास को झुठला दिया जा रहा है अथवा भ्रामक ऐतिहासिक प्रसंगों को पेश कर उन्हें ही प्रमाणित कहा जा रहा है। तकनीकी कौशल से बनाई गई तस्वीरों को कुछ इस तरह पेश किया जा रहा है मानो वह सच हैं और फिर उस झूठे सच को सनसनीखेज बनाकर लोगों के सामने इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो सब कुछ सही है। कविताओं और फिल्मी गीतों के पैरोडी गढ़े जा रहे हैं। ऐसा वातावरण तैयार करने की कोशिश की जा रही है मानो वही सच है बाकी सब झूठ है। बहुत तेजी से सत्य से नैतिकता और ईमानदारी के मूल्यों का क्षरण होता जा रहा है। सब पर से भरोसा लगातार कम होता जा रहा है। सरल और सही ढंग से सोचने वालों को बेवकूफ माना जाने लगा है। वर्तमान में हम दो ही काम करते हैं या तो आंख बंद करके समर्थन करते हैं या फिर विरोध।
    ऊपर से तो दिखता है कि बहुत कुछ लिखा- देखा और कहा जा रहा है अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर। सबचर्चा से भरे रहते हैं। लेकिन जो वास्तव में होना चाहिए वह नहीं हो रहा है। समस्त समाज अभिव्यक्ति की कठिनाइयों से जूझ रहा है। शब्दों के स्वतंत्र अर्थ नहीं हैं हर शब्द में निहितार्थ खोजना पड़ रहा है। वाक्य में शब्दों के नए अर्थ पनपते  जा रहे हैं और असल अभिव्यक्ति शून्य होती जा रही है। उनमें अर्थ संप्रेषित करने की ताकत खत्म होती जा रही है समाज हताश होता जा रहा है।  इस हताशा को इनकार करने के लिए वह दूसरों में दोष निकालता है कि "पहले भी तो ऐसा होता था उस काल में भी तो यही हुआ था आज हो रहा है तो क्या हुआ? ऐसा लग रहा है जैसे पूरा समाज संवादहीनता  और  अभिव्यक्ति विहीनता  की संकरी सर्पीली गलियों में भटक गया है। बकौल ग्रामस्की यह स्थिति व्यवस्थागत सुधार मैं बहुत बड़ी बाधा है पिछले कुछ चुनावों का मुआयना करें । हर चुनाव परिणाम के बाद हमें गिरावट का एक नया स्तर देखने को मिलता है। वह गिरावट धीरे-धीरे आम बात बन जाती है और फिर हम और गिरने लगते हैं दूसरे चुनाव के बाद। यह एक तरह से सोशल कंडीशनिंग है। जिसमें हम अपनी कुंठा को सच मान कर स्वीकार कर लेते हैं । जब भी हम किसी घटना का विरोध करते हैं या किसी व्यक्ति का विरोध करते हैं तो एक नया गुट उस के समर्थन में खड़ा हो जाता है। कर्नाटक का ही उदाहरण लीजिए। कई धाराएं चल रही हैं। हम यह समझने के लिए तैयार नहीं है  कि इससे हमारे लोकतंत्र और संविधान को कितनी क्षति पहुंचेगी। अगर कभी कोई इस पर बात उठाता भी है तो उस की बोलती बंद कर दी जाती है। भविष्य में क्या होगा यह कोई सुनने को तैयार नहीं है। फिलहाल हमारी पार्टी हमारे नेता ही विजयी हैं।  यही ठीक है। हमारे अपने - अपने पूर्वाग्रह हैं।  हम नहीं जानते हम क्या जानते हैं और क्या नहीं जानते। फिर भी हम यह मानने को तैयार नहीं हम क्या नहीं जानते। अब कर्नाटक का ही उदाहरण लें। वहां जो कुछ भी हुआ वह भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए भविष्य में एक उदाहरण बन गया। शीर्ष अदालत के आदेश ने येदियुरप्पा को गवर्नर  द्वारा दिए गए समय को अमान्य कर  विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया। इसे अब से एक ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा और उद्धृत किया जाएगा।
ऐसी परिस्थितियां बार-बार उत्पन्न होती हैं, पूरी तरह से। क्योंकि राज्यपाल को जो करना चाहिए वह हमारे संविधान में संहिताबद्ध नहीं है। यह अपने विवेकाधिकार के लिए छोड़ दिया गया है। वे विवेकाधीन प्रक्रियाएं उदाहरण पर आधारित हैं और यह खतरनाक है क्योंकि लोकतंत्र के हर झगड़े के लिए एक उदाहरण है। इस नाटक को दोहराये जाने से रोकने के लिए, नियमों को  मजबूत बनाया  जाना चाहिये। एक गवर्नर के विवेकानुसार नहीं छोड़ा जाना चाहिए,क्योंकि  आखिरकार वह राजनीतिक नियुक्ति है।
जब तक हम कानून द्वारा इन दिशानिर्देशों को निर्धारित नहीं करते हैं, हम चुनाव की भावना को दूर करने वाले बदसूरत राजनीति  के  गवाह बने रह सकते हैं। विख्यात दार्शनिक  हेबरमास ने आदर्श संवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। इसके तहत हर आदमी को बोलने और प्रश्न पूछने की आजादी है लेकिन इसमें सबसे बड़ी शर्त है कि बोलने और सुनने वाला इंसान किसी भी प्रकार के मनोवैज्ञानिक दबाव से मुक्त हो। ऐसा नहीं होता। हमारे संविधान ने हमें बोलने की आजादी दी है। लोकतंत्र में व्यवस्था पर सवाल उठाने की आजादी है। लेकिन ,हम कभी यह नहीं कहते कि नेताजी संविधान को फुटबॉल मत बनाइए क्योंकि उसे किसी विशेष पार्टी ने अंगीकार नहीं किया समस्त भारत की जनता ने उसे स्वीकार किया है।

Sunday, May 20, 2018

राहुल को सतर्क रहना होगा

राहुल को सतर्क रहना होगा
कल शाम तक सोशल मीडिया पर एक मजाक चल रहा था कि दिल्ली एकमात्र ऐसा राज्य था जहां भाजपा तीन विधायकों के बावजूद सरकार बनाने में नाकाम रही थी।लेकिन शाम ढलते- ढलते कहानी बदल गयी। बीजेपी के बीएस येदियुरप्पा 104 विधायकों के बावजूद विधान सभामें बहुमत प्रमाणित कनरने के पहले इस्तीफा दे दिया। कर्नाटक के राजनीतिक नाटक में भाजपा की इस दुर्गति का राष्ट्रीय राजनीति पर  बहुत बड़ा होगा। हां, खुद को अपराजेय समझने वाली भाजपा को यह शर्मिन्दगी उठानी पड़ी करिश्माई नरेंद्र मोदी-अमित शाह जोड़ी को इस स्थिति ने घुटनों पर ला दिया है। अलबत्ता , राहुल गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस ने 2014 के बाद यह  दुर्लभ क्षण देखा है। लेकिन कांग्रेस ने यह ससमझ लिया अब विपक्ष अपने जश्न पर रोक लगाये और जनता के लिये कुछ अच्छा करे तो उसका भला हो सकता है। क्योकि विपक्ष बनाम- भाजपा का यह मुकाबला अभी  " डेविड बनाम-गोलियाथ " जंग बनी हुई है और भाजपा अभी भी पूरे विपक्ष के मुकाबले ज्यादा शक्तिशाली है। कर्नाटक में राजनीतिक नाटक अभी खत्म नहीं हुआ है और जल्द  खत्म होने वाला भी नहीं है। कर्नाटक के प्रभावों पर और चर्चा करने से पहले,  पहले उस संभावित राजनीतिक परिदृश्य को भी देख लें जो आने वाले दिनों सामने आ सकता है। यह अभी मालूम नहीं है कि यह कोई चाल तो नहीं है क्योंकि   निश्चित रूप से कोई  नहीं जानता कि क्या भाजपा ने जानबूझ कर  75 वर्षीय येदियुरप्पा के घोटाले से छुटकारा पाने के लिए यह किया था। मोदी और शाह देश के अबतक के  सबसे अच्छे चुनावी योद्धा हैं। यह मानना थोड़ा कठिन है कि जो दिख रहा है वही हुआ होगा। यही नहीं बीजेपी और आरएसएस के भीतर से भी  आवाजें आ रही थीं कि कर्नाटक में अपनी छवि के मूल्य पर  सरकार ना बनायें। 

यही नहीं , मोदी और शाह ने येदियुरप्पा को  शपथ ग्रहण से दूर रखा और यह सुनिश्चित किया कि भाजपा के मुख्यमंत्री या केंद्रीय नेता ने समारोह में भाग नहीं लिया। यह सोचा भी नहीं जा सकता है कि मोदी और शाह जैसे चुस्त राजनेता इस बात को भांपने से  से चूक गए होंगे कि अगर भाजपा बहुमत साबित कर भी देती है तब भी यह विजय बदनामी भरी होती और आम चुनाव में इसका खामियाजा भुगतना होता। अब बाती है कि भाजपा ने इतना फासला आखिर तय क्यों किया? तो, यह अपने चारों तरफ मौजूद अड़चनों को दूर करने का प्रयास था । अब भाजपा आने वाले हफ्तों और महीनों में राज्य स्तर पर पार्टी के संघर्ष का नेतृत्व करने के लिए कर्नाटक में एक नया नेता ला सकती है, लेकिन आगामी लोकसभा चुनावों में कर्नाटक से अधिकतम सीटें जीतने का भी लक्ष्य है। कर्नाटक में लोकसभा में 28 सीटें हैं। इस तर्क से,  येदियुरप्पा नौसिखुआ हैं पर शायद बीजेपी नहीं। कांग्रेस-जेडी (एस) गठबंधन के लिए आगे की राह समतल नहीं है। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाजपा संभावित तौर पर जो करना चाहती थी वह  नहीं कर सकी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने  राज्यपाल वाला द्वारा यद्यियुप्पा को बहुमत साबित करने के लिए दी गयी  15 दिनों की मोहलत  को काफी कम कर दिया था। लेकिन  भाजपा चुप नहीं बैठेगी  और इस बार वह निशाना लगा कर हमला करेगी। संक्षेप में कहें तो यह कहा जा सकता है कि  कांग्रेस-जेडी (एस) सरकार को बहुमत साबित करने के लिए यह काफी कठिन कार्य होगा। कांग्रेस-जेडी (एस) सरकार के शपथ लेने के बाद " रिसॉर्ट राजनीति " खत्म हो सकती है, लेकिन दोनों पार्टियों को अभी भी अपने जमात को जोड़े  रखना मुश्किल होगा। उन्होंने, आखिरकार, आज एक छोटी सी लड़ाई जीती है। युद्ध अभी भी चल रहा है। उन्हें विधान सभा में  अपना बहुमत साबित करना होगा। 

येदियुरप्पा ने जेडी (एस) नेता और भावी मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी से कहा : "प्रिय कुमारस्वामी जी, मैं एक लड़ाकू हूं और मैं अपनी आखिरी सांस तक लड़ूंगा।" कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का भाव अब अनिवार्य रूप से बढ़ जाएगा। कर्नाटक में राहुल गांधी को दोतरफा ​जिम्मेदारी हो गयी। पहली कि वे इस बात पर नजर रखेंगे कि पार्टी की एकता बनी रह और दूसरे कि यह एकता आमचुनाव तक कायम रहे। सबसे बड़ा श्रेय यह है कि   राहुल गांधी के सबसे बुरे आलोचकों को भी उन्हें यहश्रेय देंगे कि उन्होने पार्टी को नई आशा और शक्ति को नयी ताकत दी है। लेकिन कांग्रे को भाजपा को कम करके आंकना नहीं चाहिये। मोदी के नेतृत्व में भाजपा अभी भी कांग्रेस से बहुत आगे है। 

Friday, May 18, 2018

कर्नाटक में  नाटक 

कर्नाटक में  नाटक 

बुधवार को कांग्रेस विधायक दल की बैठक में सदस्यों से पूछा गया कि क्या उन्हें बीजेपी शिविर से जुड़े किसी से भी कोई " प्रलोभन " मिल रहा है?  उनमें से 12 ने अपने हाथ उठाए। प्रत्येक व्यक्ति को अपने मोबाइल फोन पर वॉयस रिकॉर्डिंग ऐप्स इंस्टॉल करने की सलाह दी गई थी ताकि भविष्य की बातचीत रिकॉर्ड की जा सके।यदि कांग्रेस खेमे पर भरोसा किया जा सकता है तो उनके अनुसार बीजेपी नेता श्रीरामुलु के एक आदमी ने गुरुवार को विधायकों में से एक को फोन किया था  लेकिन बातचीत ज्यादा नहीं हुई क्योंकि उसे संदेह था कि उनकी बात रिकार्ड  की जा रही है। उसने फोन काट दिया। कांग्रेस से सम्पर्क का जिममा बल्लारी सममूह को सौंपा गया था और इस तरह के फंदों ससे वाकिफ है। इस तरह के जाल से वाकिफ है अतएव उसने विधायकों को नहीं उसके रिश्तेदारों ओर दोस्तों को फोन करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि कांग्रेस-जेडी (एस) शिविर छोड़ने और बीजेपी में जाने के लिए उनके विधायकों के  परिजनों  पर दबाव डाला जा रहा है।इस समय कर्नाटक की सियासत में चूहे- बिल्ली का खेल चल रहा है। कांग्रेस की बेचैनी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बिदाड़ी में एक रिज़ॉर्ट से सुरक्षा वापस ले ली गई। यही वह जगह है जहां सभी कांग्रेस विधायकों को रखा गया है।  बी एस येदुरप्पा ने रामनगर जिले के एसपी को स्थानांतरित कर दिया जहां  रिज़ॉर्ट स्थित है और अपनी पसंद के एक नए अधिकारी को तैनात किया गया है। यही कारण है कि कांग्रेस ने अपने विधायकों को बदलने का फैसला किया। मूल योजना विधायकों को विमान से कोच्चि  ले जाना था। 

लेकिन कांग्रेस शिविर का दावा है कि चार्टर्ड उड़ानों को  अनुमति देने से इंकार कर  गया था। उधर, नागर विमानन मंत्री जयंत सिन्हा ने ट्वीट कर के बताया कि  घरेलू चार्टर उड़ानों के लिए डीजीसीए की अनुमति की आवश्यकता नहीं है, लेकिन बेगलुरू में  स्थानीय एटीसी से पूर्व अनुमोदन की जरूरत है। आधी रात के कुछ पहले ही कुछ बसें ईगलटन रिसॉर्ट गेट्स से बाहर निकलीं। विधायकों को निर्देश दिया गया था कि मीडिया वालों को अपने  गंतव्य के बारे में कुछ ना बतायें। लेकिन जब बस  बेंगलुरु-हैदराबाद हाई वे पर आयी तो बात साफ हो गयी कि उस कांग्रेस - जे डी (एस) जमात ने  550 किलोमीटर दूर तेलंगाना की राजधानी को अस्थायी तौर पर चुना है।

उधर कांग्रेस- जद (से)  का नाटक चल ही रहा था कि गवर्नर ने घोड़े के व्यापार (हार्स ट्रेडिंग ) के लिए बीजेपी को छूट दे दी ,उन्होंने अगली सुबह मुख्यमंत्री के लिए शपथ ग्रहण करने का भी आदेश दिया।येदुरपपा धन्यवाद दे रहे थे पर ऐसा लग रहा था कि वे खुश होने का नाटक कर रहे हैं। लगता थ कि उन्हें अहसास हो रहा था कि उन्हें इसके लिये जनादेश नहीं मिला है। 

अजीब स्थिति हो गयी है। जिसे सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं उसके पास बहुमत नहीं है और जो दल कट्टर विरोधी  थे वे चुनाव के नतीजों की घोषणा के कुछ ही घंटों में एक जुट हो गये। इससे भी अलग , जिसे मुख्य मंत्री बनाये जाने की बात थी उस पार्टी के पास सबसे कम सीटें थीं। अब इसके बाद विवाद कि राज्यपाल किसे बुलाएं सरकार बनाने के लिये। इस पूरे नाटक में नैतिकता कहीं दिख नहीं रही थी। आम चुनावल में एक साल से भी कम समय बचा है और कर्नाटक के नाटक ने कई अंतदृष्टि प्रदान की है। पहली कि किसी भी तरह जीतने का मोदी - शाह का गठबंधन अभी भी सक्रिय है। जाति प्रथा का अभी भी बोलबाला है। यही नहीं, इससे कांग्रेस कों सीखना होगा कि जहां भी ततरफा मुकाबला हो वहां अपना महानता का भाव त्याग कर  उसे क्षेत्रीय पार्टी से पहले ही गठबंधन कर लेना चाहिये। यही नहीं इस चुनाव ने बताया है कि अगर सभी दल एकजुट हो जाएं तो भाजपा को धूल चटाई जा सकती है। 

 भारतीय राजनीति में नैतिकता के लिये कोई जगह नहीं हे। टगर कोइं जीत जाता है तो भ्रष्टाचार कोई मामला नहीं है। अब इस चुनाव से और उसके बाद होने वाले नाटक से किसने क्या सीखा यह तो समय ही बतायेगा, लेकिन इस नाटक के झटके अभी कई दिनों तक महसूस होंगे।