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Monday, January 22, 2018

हमें अपनी राह खुद बनानी होगी

हमें अपनी राह खुद बनानी होगी

आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म दिवस है और आज के ठीक तीन  दिन बाद हमारे देश का गणतंत्र दिवस है।  ऐसे मौके पर देश के बारे में सोचना जरूरी होता है। आज भारत में जो कुछ भी हो रहा है वह बिल्कुल अविश्वसनीय है। क्योंकि सरकार का कहना कुछ है और हो कुछ दूसरा ही रहा है। इसका कारण है कि  हम जो भी देख रहे हैं या सुन रहे हैं  उस के संदर्भ को परखने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। मीडिया भी लगातार सच्चाईयों के इतने पहलुओं को सामने रख दे रहा है कि सब कुछ भ्रमित होता महसूस होता है।  ऐसा लगता है कि कोई एक गज के लिए हमें पूरा थान हीं हारना चाहता हो या हारने के लिए तैयार हो। हमें अक्सर विदेशों का उदाहरण देकर समझाया जाता हे यह नीचा दिखाया जाता है। यह एक तरह की मूर्खता है। हर देश एक जैविक इकाई है।   समन्वित भारत को उसके सामाजिक मनोवैज्ञानिक स्तर पर देखें तो तीन तथ्य स्पष्ट होते हैं।  पहला कि, भारत के लोग कंप्यूटर की तरह नहीं है जो एक प्रोग्राम में बिहेव करेंगे या आचरण करेंगे उनसे इस तरह क्या आचरण की अपेक्षा समय बर्बाद करना है। कंप्यूटर का प्रोग्राम अचानक कुछ भी नहीं कर सकता उसका करना हमेशा प्रोग्राम्ड होता है। भारत यह लोग तयशुदा दिशा में कोई काम नहीं कर सकते।  यहां धर्माचरण से लेकर काला बाजार तक अचानक  होता है। दूसरे कि भारत वर्षों तक या कहिए कई सदियों तक गुलाम रहा और गुलामी से निकलने के लिये लगातार रहा, तरह तरह के प्रयोग करता रहा  इसलिए यहां की जनता के सोच में शांति और स्थायित्व की तलाश बेकार है। भारत के लोग छोटी-छोटी बातों पर भावुक हो जाते हैं और अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं और बड़ी से बड़ी बात को नजरअंदाज कर देते हैं। तीसरी बात जिसके लिए आरंभ में सुभाष चंद्र बोस और लोकतंत्र का हवाला दिया गया वह है कि भारत की आजादी एक चमत्कारिक विचार के रूप में उत्पन्न हुई थी। यही कारण है गकि अाज भी कवियों से लेकर राजनेता तक आजादी को बचाने की अपील करते देखे सुने जाते हैं। इसलिये देश में  अगर भ्रष्टाचार है स्वतंत्रता भी उससे जुड़ी हुई है। इसलिए भ्रष्टाचार के हर प्रयास को चुनौती देने की हमारा देश आजादी भी देता है।

    कोलकाता के बड़ा बाजार  या किसी भी अन्य बाजार में अगर ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे खाने पीने की अनगिनत दुकानें हैं।  इनमें खाने की तरह तरह की चीजें बिकती हैं। सबके पास अपने ग्राहक हैं। यह संकेत है कि भारत की जनता के पास उद्यम का अभाव नहीं है और ना बाजार का। जरूरत है उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने की। यह बात कोलकाता में हाल में हुये विश्व बांगला सम्मेलन में खुल कर सामने आयी। 

     हमारे यह दो ही तरह के विचार अक्सर सुनने को मिलते मिलते हैं। पहला की यहां कुछ नहीं हो सकता और दूसरा कि सर्वत्र कुंठा व्याप्त है लेकिन हमें इस से ऊपर उठकर सोचना होगा कि क्या हम हम भारत के विकास के लिए जनता को तैयार करना जरूरी समझते  हैं।  जिस देश ने नेताजी के एक नारे पर - " तुम हमें खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा" , - पर आजादी की जंग की शुरुआत हो गयी , उस देश की जनता को विकास के अवसर नहीं समझा पाना हमारी सबसे बड़ी कमी है।  हम सरकार पर सब कुछ छोड़ देते हैं। ऊपर कहा जा चुका है कि हमारा माइंडसेट गुलामी की पीड़ा के बाद तैयार हुआ है और यही कारण है कि  हम हर  छोटे और बड़े काम के लिए सरकार की तरफ देखने के आदी हो गये  हैं। हम खुद अपने स्तर से कुछ नहीं करना चाहते। हमें अमन के भंगुर आधार को समझना होगा और यह मानना होगा। यहां के लोगों में काम करने का हुनर है और काम के अवसर का अभाव भी। लेकिन फिर वही बात आ जाती है कि शांति और स्थायीत्व के बारे में के बारे में कैसे सोचा जाए?  भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां हर 5 वर्षों के बाद चुनाव होने हैं और चुनाव में नयी सरकारें बनती भी हैं और पुरानी गिरती भी हैं। अगर एक सरकार गिरती है और दूसरी आती है तब नीतियों पर भी दूसरा असर पड़ता है तथा उसका प्रभाव रोजगार पर भी पड़ने लगता है। रोजगार जहां प्रभावित होता है उसी क्षण शांति भी प्रभावित होने लगती है। पहले मानसिक और असके बाद सामाजिक।  क्योंकि हमारा सारा दारोमदार हमारी सारी व्यवस्था सरकार पर ही निर्भर है। हम  किसी काम के लिए सरकार से अलग होकर सोच ही नहीं सकते।  आर्थिक उदारीकरण ने देश की  आर्थिक अवधारणा में बहुत बड़ा बदलाव लाया है लेकिन यह बदलाव जमीनी स्तर तक नहीं है। यह बदलाव अनि​िश्चत है और हर अलग मामले के लिये अलग है। ठीक वैसे ही जैसे  आप किसी सड़क पर बहुत तेज रफ्तार से जा रहे हैं और अचानक एक ठोकर आता है। ऐसे में दो ही बातें होती हैं पहला कि आपकी गाड़ी कूद जाएगी और फिर जमीन पर आकर ठीक से चलने लगेगी और दूसरा यह  आपकी गाड़ी  कूद जाएगी लेकिन जमीन पर आने के पहले उसके चक्के निकल जाएंगे।  उसके पुर्जे बिखर जाएंगे। ऐसी ही व्यवस्था हमारे देश में है।  उद्यम की ठीक से चलती हुई गाड़ी सरकार के इस कदम से कूद कर और निवेशकों के नियंत्रण से बाहर निकल जाए या फिर ठीक से चलने लगी है। जरूरी है हमें अपने स्तर से सड़क को ठीक करना। 

नेहरू ने सुभाष की जासूसी नहीं करवाई थी

नेहरू ने सुभाष की जासूसी नहीं करवाई थी
हरि राम पाण्डेय
आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्मदिन है।  नेताजी को लेकर भारतीय समाज में विशेषकर राजनीतिक हलकों में कई तरह की बातें चलती हैं और चलती रहीं हैं।  इनमें दो बातें सबसे ज्यादा मशहूर हैं पहले तो नेता जी जीवित हैं और दूसरी कि   नेहरु -  गांधी और उनके समर्थकों से उनको भय था इसलिए वह अभी तक अज्ञातवास में हैं।  यह अफवाहें कैसे उठीं  इसके बारे में कहना बड़ा मुश्किल है।  गौर कीजिएगा,  यहां  मैंने अफवाह शब्द का प्रयोग किया है, क्योंकि इतिहास में इस के समर्थन में कुछ प्रमाणित नहीं है।  उल्टे नेताजी और उनकी पत्नी को लेकर नेहरू की सद्भावना के  स्पष्ट प्रमाण है सरकारी फाइलों में।  ये फाइलें  2015 में सार्वजनिक कर दी गईं।  नेहरू और नेताजी की पत्नी एमिली शेंकेल के कई पत्र सुरक्षित हैं।  इन पत्रों से  नेता जी की पुत्री अनीता बोस  के पालन पोषण के लिए नेहरू की चिंता साफ झलकती है। 

   नेताजी आखरी बार अपने परिवार से 8 फरवरी 1945 को मिले थे और उसी रात वे जर्मनी की एक नौका में सवार होकर देश की जंग लड़ने के लिए निकल पड़े थे। कहां गये यह किसी को पता नहीं चला।  लेकिन लेकिन इस निष्क्रमण तथा अज्ञातवास के  पहले नेता जी ने एक पत्र अपने भाई प​श्चिम बंगाल के मशहूर कांग्रेसी नेता शरत चंद्र बोस को लिखा था।  उस पत्र में नेताजी ने  साफ तौर पर कहा था कि " उन्होंने शादी कर ली है और उससे एक पुत्री है मेरे बाद उस परिवार की देखरेख उसी तरह करना जिस तरह मेरी करते रहे हो।" एमिली अपनी डायरी में लिखतीं हैं कि " लगभग ढाई साल के बाद अगस्त 1945 की एक रात  एमिली वियेना में अपने कमरे में थी, जब उसने सुना कि एक विमान दुर्घटना में ताइपेई में नेता जी की मृत्यु हो गई है। परिवार के लोग इस खबर को सुनकर सन्न रह गए। इसके बाद वह उस कमरे में गई जहां अनीता सो रही थी और वहां बैठकर थोड़ी देर तक रोती रही।लेकिन जीवन तो जीना ही था और वह अपने काम में लग गई। युद्ध के बाद वियना में जीवन बड़ा कठिन हो गया था लोग पाई-पाई को तरस रहे थे। घर में बच्ची अनीता के लिये दूध नहीं था। परिवार के पास पैसे नहीं थे।"  1948 में एमिली  ने अपने देवर  शरत चंद्र बोस को एक पत्र लिखा और बताया कि वह अपने परिवार के साथ वियना आ गई हैं। 

     क्या विडंबना है की खबरें उड़ती थीं कि नेताजी को खोजने के लिये  उनके परिवार की जासूसी की जाती है। लेकिन अवर्गीकृत फाइलों में  कोई भी पत्र ऐसा नहीं है जिसमें नेताजी या एमिली या उन्हें लिखे पत्रों में शरत बाबू ने कहीं भी जासूसी का जिक्र नहीं किया है। जासूसी की इस कथा   के साथ एक और सनसनीखेज बात कही जाती थी कि जवाहरलाल नेहरू ने लगातार नेताजी के विरुद्ध षड्यंत्र किया। लेकिन जब 23 जनवरी 2016 को प्रधानमंत्री ने नेताजी संबंधित फाइलों को सार्वजनिक किया और उसे लोगों के लिए सुलभ कराया गया तो बड़ी अजीब बातें सामने आईं। लोगों को यह उम्मीद थी कि उन फाइलों में जवाहरलाल नेहरू के संबंध में पक्के सबूत मिलेंगे और इससे पता चल सकेगा कि नेहरू और गांधी ने मिलकर सुभाष चंद्र बोस की हत्या करवाई। इसीलिए इन फाइलों को सार्वजनिक नहीं किया जाता था। लेकिन षड्यंत्र की इस कथा का कोई आधार नहीं मिला। उल्टे फाइलों के पुराने पड़ गए पन्नों रखे पत्र, सरकारी नोट और कानूनी दस्तावेजों से इतिहास के उस मोड़ पर प्रकाश पड़ता है जो देश के सर्वश्रेष्ठ नेता सुभाष चंद्र बोस के बारे में गढ़ी गयी कहानियों से गायब था।  

  शरतचंद्र के पुत्र अमिय बसु ने 10 जून 1952 को जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा【 संख्या पीएमओ 1956-71: 2 (67) 56-71 पीएम वॉल्यूम 1】। पत्र में अमिय बसु ने जवाहर लाल से निवेदन किया था कि " वे  समय - समय पर वियेना में अपनी चाची( सुभाष बाबू की पत्नी एमिली शेंकल ) को कुछ पैसे भेजना चाहते हैं। यह पैसे भारतीय रिजर्व बैंक और ऑस्ट्रियन नेशनल बैंक के माध्यम से जाएंगे। हो सकता है , आस्ट्रियन बैंक इस पर आपत्ति करें और जटिलताएं बढ़ जाएं।  अतएव मैं जानना चाहता हूं क्या यह राशि कोलकाता ( तत्कालीन कलकत्ता)  में ऑस्ट्रिया के वाणिज्यदूत को सौंप दी जाए और वे उतनी ही रकम अपने देश की करेंसी में वहां दे दे। 

दो दिनों के बाद नेहरू ने जवाब दिया।  यह पत्र सम्बंधित  अधिकारी के नाम था।  पत्र में  नेहरू ने जानना चाहा था कि क्या इस तरह से कुछ रकम भेजी जा सकती है और हम लोग कैसे उन्हें मदद पहुंचा सकते हैं।  संबंधित मंत्रालय और रिजर्व बैंक इस पर राजी हो गए तथा अमिय नाथ बसु को सूचना दे दी गई कि वह इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

   इस  पत्र के बाद से कई और घटनाएं जुड़ गयीं।  विख्यात नेता आसिफ अली वियेना यात्रा पर जाने वाले थे। जवाहरलाल नेहरु आसिफ अली से कहा कि सुभाष बाबू की विधवा से मिल लें। आसिफ अली ने नेहरू से कहा एमिली शायद ही मिलें। पर वह कहते हैं तो वे उनसे मिलेंगे और उन्हें तैयार करेंगे कि एमिली अपने लिये ना सही  कम से कम उस बच्ची के लिए सरकार की मदद स्वीकार कर लें। 

 यहां सुभाष बाबू के विवाह को लेकर भी कई विवाद हैं।  लेकिन,  नेहरू का उत्तर इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट था। नेहरू ने साफ कहा था कि " उस विवाह को लेकर  जहां तक हम सबों का मामला है हम उस शादी को मानते हैं और यही बात समाप्त हो जानी चाहिये।" 

  सुभाष बाबू की पत्नी एमिली शेंकेल ने आसिफ अली से भेंट की और बच्ची के भविष्य के बारे में उनसे चर्चा की। बच्ची के भविष्य के बारे एमिली की चिंता के बारे में जब नेहरू को जानकारी मिली तो उनहोंने स्पष्ट कहा कि "  भविष्य की कोई गारंटी नहीं ली जा सकती है।" नेहरू ने कहा कि " मैं जो चाहता था कि कुछ पैसे उनके पास बच्ची के लिए रखवा दिो जाएं और इसका उपयोग तब तक नहीं हो जब तक इसकी जरूरत ना हो।"  उन्होंने इसका फैसला शेंकेल  पर ही छोड़ दिया।  उन्होंने समझाने की भी कोशिश की कि अगर वह इसे नहीं पसंद करती हैं छोड़ दें, कोई दूसरा विकल्प सोचेंगे।  इस बीच,  नेहरू ने कहा " क्यों न अपने वियना कार्यालय के माध्यम से वे सौ पौंड भेजने को तैयार है जो समय समय पर बच्ची को दिया जाता रहेगा। नेहरू ने कहा यह रकम सरकारी नहीं है यह कांग्रेस की तरफ से है।"  नेहरू ने यह कदम अन्य माध्यमों से भी उठाने की कोशिश की।  उन्होंने पूछा किक्रिसमस के अवसर पर उपहार स्वरूप सौ पौंड  भेजे जा सकते हैं यह राशि  अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पास  आई एन ए  के कोष  का हिस्सा है। वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रधानमंत्री के इस निर्देश का पालन किया और अक्टूबर 1952 में वियना में भारतीय दूतावास में एक अधिकारी के वी रामास्वामी ने आधिकारिक तौर पर सूचना दी कि उनके नाम 100 पौंड का एक ड्राफ्ट आया है। यह ड्राफ्ट उपहार के तौर पर है।  रामास्वामी ने अनुरोध किया कि वे निर्देश दें कि इस राशि का क्या उपहार खरीद कर उन्हें भेजा जाय। नेहरू एमिली के प्रति स्नेह जताने में कुछ कदम और आगे बढ़ गए। उन्होंने विदेश सचिव से यह जानना चाहा कि " क्या सुभाष बोस की पत्नी को चाय भेजी जा सकती है। " नकदी और उपहार भेजने की यह  व्यवस्था 1953 तक शरूआती कुछ महीनों तक चलती रही। 

   1953 आखिरी दिनों में नेहरू को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और राज्य के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता बिधान चंद्र राय की मदद से इस मामले में  प्राप्त हो गई।  राय ने प्रस्ताव दिया की क्यों ना हम लोग एक ट्रस्ट बनाकर बच्ची के नाम से उसमें कुछ रुपया जमा करा दें और इसकी जिम्मेदारी बर्न  में भारतीय राजदूत को सौंप दी जाय।  उन्होंने कहा की शेंकेल  को पिछले  कई महीनों से 200  - 300 रुपए मिल रहे हैं अब उसे आशंका हो रही है यह रुपए नहीं मिलेंगे। विधानचंद्र राय ने शेंकेल को पत्र लिखा की अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी  एक ट्रस्ट बनाकर  उनकी बेटी के लिए कुछ रुपए जमा कराना चाहती है और इसकी जिम्मेदारी है नेहरू पर दी गई है। यह रकम 15 हजार ब्रिटिश पौंड या  भारतीय मुद्रा में लगभग दो लाख रुपये के बराबर है। यह राशि नेताजी की जीवनी पर बने एक फिल्म के मुनाफे में मिली थी।  राय ने यह भी सुझाव दिया कुछ लोग और ट्रस्ट में शामिल कर लिये जाएं । जल्दी ही इस के कानूनी कागज इत्यादि बने गए। 23 मई 1954 को ट्रस्ट बन गया जिसमें जवाहरलाल नेहरू,  बिधान चंद्र राय इत्यादि शामिल थे।  ट्रस्ट ने घोषणा की कि इसमें दो लाख नेताजी की विधवा के लिए जमा कराए हैं जो अनीता बोस के काम आएंगे।  इस पर गवाह के रूप में कैलाश नाथ काटजू और रफी अहमद किदवई ने हस्ताक्षर किए। 

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि 1958 के अंत में नेहरू को पता चला कुछ दिनों से अनीता को रुपए नहीं मिल रहे हैं। वे चिंतित हो गए। उन्होंने बी सी राय को लिखा। जांच करने के बाद बी सी राय ने बताया की बकाया रकम एक साथ दे दी जाएगी। बी सी राय की  की जुलाई 1962 में और जवाहरलाल नेहरु की मई 1964 में मृत्यु के बाद थोड़ा व्यवधान हो गया। फिर, जुलाई 1964 में लाल बहादुर शास्त्री ने इस ट्रस्ट को दोबारा शुरू । अनीता बोस के वयस्क होने तक यह चलता रहा।  भला हो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जिन्होंने कई परेशानियां झेलकर कर इन फाइलों को सार्वजनिक किया और नेहरू सुभाष के बीच मतभेद की कहानी को खत्म किया।

Sunday, January 21, 2018

अच्छे दिन " कैसे आएंगें

"अच्छे दिन " कैसे आएंगें
गरचे, सभी लोग अर्थव्यवस्था को लेकर चिंतित हैं और मोदी सरकार लगातार कह रही है सब कुछ नियंत्रण में है तो फिर क्या बात है, सच क्या है?
पिछले साल नवंबर में जीएसटी की वसूली 80,808 करोड़ हो गई जबकि अक्टूबर में यह 83,346 करोड़  थी जीएसटी पिछले साल जुलाई में लागू हुआ था और उस वर्ष उसी महीने में लगभग 93,283 करोड़ रुपए की वसूली हुई थी। इसके बाद वसूली लगातार घटती गई । अगस्त में यह 90,669 करोड़ हो गई तथा सितंबर में थोड़ी सी बढ़कर 92,150 करोड़ हो गई । इस बीच मोदी सरकार ने निश्चय किया कि जीएसटी कर दरों में कमी कर दी जाए और 178 वस्तुओं के करों में कमी कर दी गई ।  इसका मतलब है इस सरकार ने राजस्व घाटे के बावजूद जीएसटी के दरों में कमी की। यह स्पष्ट जाहिर है कि केंद्र ने जैसा चाहा था वैसा हो नहीं रहा है। व्यापारिक समुदाय बहुत कठिनाई महसूस कर रहा है । अब कुछ बड़ा करने की जरूरत महसूस हो रही है । व्यापारियों को जीएसटी में जो रियायत दी गई , खासकर गुजरात चुनाव के पहले ,वह संतोषजनक नहीं महसूस हुई और नतीजा यह हुआ कि बीजेपी की सीटें गुजरात में कम हो गई ।  केंद्र और राज्य सरकारों को  होने वाले राजस्व में कमी आई है । कहीं न कहीं कुछ गलत तो हुआ है । हलांकि इसे लेकर भाजपा सरकार बहुत बड़ी-बड़ी बातें करती थी । बातों यह सिलसिला यहीं  नहीं खत्म हुआ है । नोटबंदी को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बहुत उत्साहित थे लेकिन उसका कोई सुफल नहीं प्राप्त हो सका।  जैसा कि, सरकार ने दावा किया था वैसा नहीं हो हुआ।   उत्तर प्रदेश में मोदी जी ने मतदाताओं को आश्वासन दिया था कि उनके खाते में 15 -15 लाख रुपए जमा करा दिए जाएंगे, लेकिन हो नहीं सका। नोट बंदी का ही क्या हुआ? काला धन कितना है यह सरकार को मालूम नहीं है उल्टे नोटबंदी के कारण चल रहे 86 प्रतिशत नोट फंस गए। सरकार का कोई भी कदम इसे सुधार नहीं सका। आंकड़े बताते हैं कि औद्योगिक उत्पादन सूचकांक अक्टूबर 2016 में 4.2 था वह 1 वर्ष बाद अक्टूबर 2017 में गिरकर 2.2 प्रतिशत हो गया और अन्य उद्योगों पर  इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। व्यापारिक मोर्चे पर भी हालात बहुत अच्छे नहीं है 2016 नवंबर में व्यापारिक घाटा 13.4 बिलियन डालर  था जो 2017 के नवंबर में बढ़कर 13.8 बिलियन डालर हो गया। दूसरे शब्दों में ,व्यापारिक घाटा आयात में वृद्धि नहीं होने के कारण हुआ। अर्थव्यवस्था पर लगातार तनाव बढ़ता रहा। मोदी जी का " मेक इन इंडिया " असफल हो गया। चिंता की एक और बात है कि तेल का आयात रोज-रोज महंगा होता जा रहा है ।2017 के नवंबर में यह 39.1 प्रतिशत बढ़ कर 9.6 अरब डालर हो गया था । इसके कारण वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पेट्रोल और डीजल पर से जो 2रूपये प्रति लीटर की दर से दाम घटाया था ,उसे वापस ले लिया।  इसका अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ा। सरकार चाहती थी कि तेल को भी जीएसटी के तहत लाया जाए लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकी। सरकार अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की गिरी कीमतों का लाभ ले रही थी ।कीमतें बढ़ने के कारण वह लाभ खत्म हो गया, उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में पेट्रोल की कीमत 79 रूपये प्रति लीटर है जो  जो खरीद में 29रूपये लीटर पड़ता था।  सरकार को 50 रूपये प्रति लीटर का लाभ होता था । यह लाभ राज्यवार अलग-अलग था, लेकिन सभी मामलों में केंद्र सरकार को भारी लाभ होता था। तेल की कीमतों में वृद्धि का असर सीधे साधारण उपभोक्ताओं पर भी पड़ा।  माल भाड़ा भी बढ़ गया। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में मुद्रास्फीति के आंकड़े बताते हैं कि वह 2016 में यह 3.6 थी जबकि नवंबर 2017 में बढ़कर 4.9 प्रतिशत हो गयी। इसी तरह थोक मूल्य सूचकांक भी बढ़  गया। यह नवंबर 2016 में 3.15 था जो 2017 में बढ़कर 3.93 हो गया। जो हो आंकड़े उत्साहजनक नहीं हैं। तेल की कीमतों से मुनाफा कमाने के जरिए राजस्व बढ़ाने के चक्कर में सरकार ने महंगाई बढ़ा दी। गरीब और मध्यवर्गीय लोग अपनी आमदनी गवां बैठे। नतीजा यह हुआ कि ना वे खरीद कर पा रहे हैं निवेश कर पा रहे हैं। भारत की अर्थव्यवस्था की हालत है खराब होती जा रही है। यकीनन मोदी सरकार ऐसा नहीं  चाहा था। अब जो लोग अर्थव्यवस्था की आलोचना करते हैं सरकार और उनके समर्थक उन पर भड़क जाते हैं। सरकार को यह बताना कठिन है रिजर्व बैंक ने भी विकास को कम बताया है। रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि  मंदी के कारण चालू वित्त वर्ष में विकास के आंकड़े 7.3% से घटकर 6.7 प्रतिशत हो गये हैं। यह आंकड़ा 2017 -18 के पहले तिमाही का है। जबकि खरीफ के उत्पादन में वृद्धि हुई है और यह  जीएसटी पर असर डालेगा । जिस दिन रिजर्व बैंक ने आंकड़े पेश किए थे उसी दिन प्रधानमंत्री ने कहा कि अर्थव्यवस्था में सब कुछ ठीक-ठाक है । प्रधानमंत्री ने दावा किया की  सकल घरेलू उत्पाद पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में 8 बार 5.7 प्रतिशत तक पहुंच चुका था। यह तुलना सही नहीं है । क्योंकि, जीडीपी के आकलन की जो विधि है वह जनवरी 2015 से बदल चुकी है और ऐसा पूर्ववर्ती सरकार के काल में नहीं था। सरकार बार-बार कह रही है की हमारी अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से बढ़ रही है लेकिन अन्य देशों की तुलना में हमारे यहां निवेश लगातार कम होता जा रहा है । आज हालात यह हैं कि हमारी आर्थिक  गतिविधियां प्रभावित हो रहीं हैं।  सरकार पूंजी तैयार नहीं कर पा रही है, बैंक क्रेडिट में सुधार नहीं हो रहा है ,रोजगार नहीं प
बढ़ रहे हैं ।किसी भी देश का राजनीतिक भविष्य उसकी अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है, बातों पर नहीं । अगर मोदी जी सकल घरेलू उत्पाद के मामले में सही बोल रहे हैं तो वह घोषणा करें कि रिजर्व बैंक के आंकड़े गलत हैं।

Friday, January 19, 2018

तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है 

तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है 

सरकार ने किसानों के लिये औपचारिक कर्ज यानी सरकारी एजेंसियों द्वारा ​दिये जाने वाले कर्ज की सीमा को बड़ा दिया है तब भी किसान महाजनों के कर्ज में दब कर आत्महत्याएं करने के लिये मजबूर हो रहे हैं। एक तरफ सरकार ने खेती के लिये कर्ज की सीमा को बढ़ा कर 10 लाख करोड़ कर दिया है। यह सीमा पिछले साल से 11 प्रतिशत ज्यादा है। लेकिन सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि हर साल 12 हजार किसान अपनी जिंदगी खत्म कर रहे हैं। कर्ज में डूबे और खेती में हो रहे घाटे को किसान बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। कृषि ऋण में वृद्धि के बावजूद वे क्यों ले रहे हैं कर्ज यह एक माकूल सवाल है। 2013 के आंकड़े बताते हैं कि कुल कृषि ऋण में सूदखोर महाजनों की हिस्सेदारी नौ प्र​तिशत बढ़ी है। किसानों को आसानी से और कम से कम व्याज दर पर  कर्ज हासिल हो जाय जिससे वे समय पर बीज ओर खेती के सामान इत्यादि खरीदने के लिये किसान क्रेडिट कार्ड योजना आरंब सरकार ने आरंभ की थी , साथ ही फसल बीमा योजना भी आरंभ की गयी थी। लेकिन इसका अपेक्षित लाभ नहीं प्राप्त हो सका।  भारत में सबसे ज्यादा श्रम शक्ति खेती में ही लगी है ओंर तब भी खुशहाली नहीं आती। इसका मुख्य कारण है पैदावार में बढ़ती लागत, भंडारण की घटती सहूलियत एवं बाजार तक पहुंच में कमी। इन मु​श्किलों के कारण लगभग दस प्रतिशत किसान ऐसे हैं जो खेती पसंद ही नहीं करते। सरकारी आंकड़ों को ही मानें तो देश में ग्रामीण क्षेत्रों में जितने परिवार हैं उनमें 57.8 प्रतिशत खेती पर ही निर्भर हें ओर इनतें 69 प्रतिशत किसानों के पास मामूली खेत हैं और उसी पर वह सारा पसीना बहा कर अपने परिवार का गुजर बसर करता है। देश में 72.3 प्रतिशत ग्रामीण परिवार खतिहर मजदूर के तौर पर या छोटी मोटी खेती करने अपना गुजारा करते हैं। इसके कारण किसान खेती छोड़ रहे हैं। 1951 की जनकाणना के अनुसार 71.9 प्रतिशत ग्रामीण आबदी कृषि क्षेत्र में ही लगी थी लेकिन 2011 की जनगणना में यह अनुपात घट कर 45.1 प्रतिशत पर आ गया।। इस कमी का मुख्य कारण कृषि उत्पादकता में कमी और लागत में वृद्धि।  जहां तक उत्पादकता में कमी का सवाल है तो यह प्रतिकूल मौसम और खेतों में लगातार बढ़ती उरवर्क की मात्रा जिम्मेदार है। ये कुछ ऐसे कारक हैं जो मामूली किसान के वश से बाहर हैं। पर्यावरण असंतुलन के कारण मौसम लगातार अनि​​श्चित होता जा रहा है और रासायनिक उर्वरकों के लगातार उपयोग से खेतो की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। कार्बनिक खादों का उपयोग जैसे गोबर की खलाद या हरित खाद इनका एक मात्र है जो बहुत तेजी दुर्लभ हो रहा है। गो वंश का अनवरत विनाश और मुश्किलें पैदा रहा है। इसके कारण गांवों से तेजी से श्रम शक्ति का विस्थापन हो रहा है और खती छोड़ रहे हैं। उनका मानना है कि खेती मे मजदूरी के लिये मोहताज होना पड़ता है। दूसरी तरफ किसानों के जीवन स्तर में सुधार के लिये सरकाकिी ओर से कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। कहने के लिये सरकार ने किसानों के लिये कई यागेजनाएं लागू कर दीं हैं लेकिन वे आकाश कुसुम हैं। मामूली किसान उन तक पहुंच नहीं पाता या बड़ी मुश्किल से पहुंचता है। औपचारिक ऋण देने वाली संस्थओं की प्रक्रिया इतनी जटिल और उलझी हुई है कि किसान उनहें समझ ही नहीं पाता  नतीजा यह होता है कि स्थानीय महाजनों से उसे कर्ज लेना होता है जो आगे चल कर जान लेवा बन जाता है। 2012 के प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक 85 प्रतिशत छोटे किसान गैर संस्थागत ऋण बाजार जैसे सथानीय साहूकार या कथित मित्रों से कर्ज लेते हैं जो औपचारिक कर्ज से लगभग 100 गुना ज्यादा वसूलते हैं। 2011- 2012 के आंकड़े बताते हैं कि 82 प्रतिशत छोटे किसान कर्जे में फंसे थे और यह उनकी निराशा का मुख्य कारण था जो उन्हें आत्म हत्या की राह पर ले जाता है। 

उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो 

इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है 

 सरकार ने इस ​स्थिति से उबरने के लिये कई योजनाएं लागू जरूर की हैं पर इनका लाभ बड़े किसान ही उठाते हैं, छोटे किसानों तक उनकी पहुंच होती ही नहीं है। दूसरी योजना सरकार की थी फसल बीमा योजना। जिसे लागू तो कर दिया गया पर किसानों को उसकी जानकारी ही नहीं है। आंकड़ों के अनुसार ब्हिार के 49 प्रतिशत , राजस्थान के 37 प्रतिशत पंजाब के 67 प्रतिशत और हरियाणा के 42 प्रतिशत किसानों को इसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। बढ़ती जनसंख्या के कारण खेत सिकुड़ रहे हैं और छोटे खेतों तथा संसाधन के अबाव के कारण फसलों के विविधिकरण की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है ओर सरकार का ध्यान मुख्यत: धान , दाल तथा गेहूं  पर ही अतएव दूसरी फसलों को प्रोत्साहन नहीं मिलता।  

  खेती अपने देश में राज्य का विषय है और यह सरकार का कर्त्तव्य है कि वह अपने किसानों की पहुंच आवश्यक सुविधाओं तक कराये। सरकार यकीनन कुछ कदम तो उठाती है पर उसकी जानकारी आम लोगों को नहीं होती। किसानों की चिंताओं को दूर करने के लिये योजनाएं ही जरूरी नहीं हैं उनका प्रभावी ढंग से लागू होना भी जरूरी है।

लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में 

ये गांधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है