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Wednesday, April 18, 2018

शीत युद्ध की  धमक

शीत युद्ध की  धमक

 अमरीका ब्रिटेन और फ्रांस  ने सीरिया  को सबक सिखाने के लिए उसके रासायनिक हथियारों के भंडार पर हमला कर दिया है। साथ ही  दुनिया  के बाकी हिस्से को यह दिखा दिया है  कि  किसी भी हमले में रासायनिक हथियार काउपयोग स्वीकार्य नहीं है।   कुछ ही हफ्ते पहले इंग्लैंड ने  रूस पर  कूटनीतिक  हमला कर दिया था।  उसका कहना था फिर उसने सेर्जेई औरउसकी बेटी यूलिया को  जहर देकर मार दिया है और वह जहर रासायनिक हथियारों के माध्यम से दियागया है।  अमरीका और उसके सहयोगियों ने सीरिया केरासायनिक हथियार बनाने और भंडारण  के  तीन स्थानों   पर हमला किया। उनका निशाना  दमिश्क के एक वैज्ञानिक शोध केंद्र,  होम्स के  दक्षिण  रासायनिक हथियार के दो   भंडार  थे ।   लगभग 1 साल पहले  अमरीका ने सीरिया के हवाई अड्डेपर भीषण हमला किया था उस समय भी  इरादा उसे रासायनिक हथियार  के इस्तेमाल का दंड देना था।  उस तुलना में वर्तमान हमला उतनाखतरनाक नहीं था।  वस्तुतः यह हमला प्रतीकात्मक था और इरादा दुनिया को दिखाना था कि  रासायनिक  हथियार बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।

    सीरिया में  7 वर्ष से चल रहे युद्ध में  यह ताजा हमला एक तरह से दुनिया की ताकतों को खासकर पश्चिमी ताकतों के लिए एक चुनौती था ।  कुछ ही दिन पहले अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने  घोषणा की थी कि ,” अमरीका सीरिया से बाहर निकल जाना चाहता है।  अभी जो दिख रहा है उससे लगता है कि ऐसा नहीं होने वाला,  कम से कम निकट भविष्य में तो  अमरीका निकलने वाला नहीं है।“ हाल के दिनों में   सीरिया में    सारिन,   क्लोरीन,  मस्टर्ड गैस   सहित अन्य रासायनिक  हथियारों का उपयोग हो रहा है। यह  कार्रवाई  2013  के  अगस्त से आरंभ हुई।  लेकिन बड़ा  फौजी जवाब  2017 के अप्रैल महीने में उस समय मिला जब एक रासायनिक हथियार के हमले से दर्जनभर से ऊपर लोग मारे गए थे।  इस हमले के माध्यम से  डोनाल्ड ट्रंप ने फौजी जवाब दिया था।  लेकिन,  इस हमले का बहुत मामूली व्यवहारिक असर हुआ।  इस हमले के  24 घंटे बाद  से ही सीरिया ने  हवाई अड्डों के इस्तेमाल  शुरू कर दिया। यही हाल  के हमलों  का भी है।  हाल  के फौजी  हमले से बहुत कुछ आने - जाने वाला नहीं है।

  सीरिया के ताजा हालात बहुत विस्तार से एक नया प्रश्न खड़ा कर रहे हैं और साथ ही एक नई चिंता की ओर इशारा भी  कर  रहे हैं।  पिछले शनिवार को विद्रोहियों के कब्जे वाले शहर  डोउमा  पर हमला हुआ।  यह दमिश्क के  पूरब  है।  इस हमले से एक सवाल उठता है कि “ क्यों रासायनिक हथियार बुरे हैं और पारंपरिक हथियार स्वीकार्य?”    चिंता यह है कि    क्या  सीरिया का युद्ध वस्तुतः नए शीत युद्ध की  शुरुआत की ओर संकेत तो नहीं कर रहा है।  कहीं  यह भविष्य के शीत युद्ध की धमक तो नहीं है।  पिछले हफ्ते जो हमला हुआ था उसमें 40 लोग मारे गए थे , इनमें बच्चे  भी थे।  यह सब के सब  क्लोरीन नाम  की  जहरीली गैस से मारे गए थे। 2013 से अब तक रासायनिक हथियारों के हमले से बहुत लोग मारे जा चुके हैं ।

      सीरिया में जांच करने वाले एक स्वतंत्र जांच आयोग  ने इस बात की पुष्टि की है सीरिया में 34 से ज्यादा  लोग मारे जा चुके हैं।  बहुत से लोग रासायनिक हथियारों से मारे गए हैं। सीरिया में 2011 से युद्ध शुरू हुआ था और एक अनुमान के अनुसार वहां अब तक तीन लाख  लोग मारे जा चुके हैं।   रासायनिक हथियार आतंक का शस्त्र हो सकता है युद्ध का हथियार नहीं।  लेकिन सीरिया में इस हथियार का लगातार उपयोग हो रहा है।  सीरिया की सरकार ने रासायनिक हथियार समझौता सीडब्ल्यूसी परहस्ताक्षर किया किया है कि  रासायनिक हथियारों का उपयोग नहीं  करेगा पर लगातार  कर रहा है । बड़ी संख्या में लोगों को मार रहा है।  क्या पश्चिमी देशों की खुफियागिरी विश्वसनीय है? पिछले 5 वर्षों में यह दुविधा थी कि  रासायनिक हथियारों का उपयोग  सीरिया की सरकार कर रही है या वहां के  विद्रोही।  सीरिया की सरकार हमेशा से

रासायनिक हथियारों के उपयोग से इंकार करती रही है और यह करती रही है युद्ध में ऐसे हथियारों  का उपयोग  बिल्कुल घृणित  है।  वह पश्चिमी ताकतों के पाखंड वह हमेशा दिखाती   रही है।  युद्ध का मोर्चा  बिल्कुल स्पष्ट हो गया है रूस और इरान दोनों  सीरिया के साथ  हैं तथा पश्चिमी   शक्तियां और इसराइल सीरिया के खिलाफ हैं।  अगर तकनीकी रूप में तो सबका एक समान दुश्मन है आईएसआईएस लेकिन किसी के पास इसे खत्म करने का कोई समान एजेंडा नहीं है।  7 साल की जंग के बाद यह स्पष्ट हो रहा है कि  सीरिया की जनता को मदद करने की भावना किसी में नहीं है।  इस युद्ध में लगी विभिन्न शक्तियां  असल में अपने अपने हितों को साधने में लगी है। फ्रांस इंग्लैंड और अमरीका द्वारा हाल में किया गया हमला रूस को एक संकेत था। सीमित  हमले से  यह संकेत दिया गया था  कि वे  बात को बढ़ाने के पक्ष में नहीं  हैं।  रूस से  सीधा संघर्ष नहीं चाहते लेकिन रूस और ईरान को उसकी औकात बताना चाहते हैं  और यह कहना चाहते हैं कि  वे  अपनी सीमा में रहे। यह रूस और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ती दूरी का स्पष्ट उदाहरण है। क्या यह शीत युद्ध के  शुरुआत का संकेत नहीं है?

 

Tuesday, April 17, 2018

मध्यवर्ग का मोहभंग

मध्यवर्ग का मोहभंग

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार शुरू किया था तो लोगों के अंदर विशेषकर भारतीय मध्यवर्ग के   भीतर, चाहे वह देश में हो या विदेश में , एक उम्मीद जगी थी कि महंगाई घटेगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। इसी उम्मीद पर देश ने  उन्हें सत्ता की बागडोर  सौंपी । देखते- देखते 5 साल गुजर   गये ।  देश के शहरों में पेट्रोल की कीमतें आज उस समय से ज्यादा हैं जब  26 मई2014 को नरेंद्र मोदी ने   सत्ता संभाली थी।  हालांकि उस समय से  अंतर्राष्ट्रीय तेल की कीमत काफी गिरी।  लेकिन देश में ऐसा कुछ  नहीं दिखाई पड़ा।  देश का मध्य वर्ग भारी  मंदी से जूझ रहा है।  वेतन बढ़ नहीं रहे हैं, रोजगार घटते जा रहे हैं, बोनस बंद हो चुके हैं।  उम्मीद थी कि  2018 के बजट मैं आयकर की छूट की सीमा  बढ़ेगी पर ऐसा नहीं हुआ।  कीमतों के बढ़ने से , खासकर पेट्रोल की कीमतों के बढ़ने से , नौजवानों का एक वर्ग काफी दुखी है।

   देश का मध्यवर्ग चुनाव में सबसे बड़ा वोट बैंक  है।  मध्य  की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है।  2009 के 20% से बढ़कर  2014 में  यह अनुपात 36% हो गया। 2014 में भाजपा ने बड़े जोर शोर से प्रचार किया था कि   रोजगार बढ़ेंगे और भ्रष्टाचार समाप्त  हो जाएंगे।  इस वजह से मध्यवर्ग भाजपा की तरफ खींचा चला  आया।  क्योंकि इसके पूर्व यह  वर्ग   राजनीतिज्ञों  और राजनीति से क्षुब्ध हो चुका था , उस वर्ग  का मोहभंग हो चुका था।  यही कारण है कि इस समुदाय ने बहुत बड़ी संख्या में भाजपा को समर्थन दिया।  मतदान का समग्र अनुपात  9% बढ़ गया । भाजपा का वोट का हिस्सा जहां10% बढ़ा वहीं कांग्रेस का 9% कम हो गया।

    पूरी  अवधि  लगभग बीत  चुकी है  और सरकार की नीतियों के कारण महंगाई उल्टे, पेट्रोल के मामले में,  बढ़ गई।  क्योंकि, सरकार चाहती थी कि वह पेट्रोल की कीमतें बढ़ा कर व्यापार घाटे को पूरा करें।  दुनिया भर में पेट्रोल की गिरती कीमत ने   सरकार को  अपना मंसूबा पूरा करने का अवसर दिया।  लेकिन देश की उम्मीदें खत्म  हो गयीं । भाजपा को उपचुनाव में करारा झटका लगा।  यह एक प्रबल संकेत है।  पिछले दिनों से लगातार जीवन जीना महंगा होता जा रहा है।  भाजपा जब सत्ता में आई थी तो सर्विस टैक्स  12.5 प्रतिशत अब जीएसटी के नाम पर बढ़कर 18% हो गया है। इससे पानी बिजली आवागमन सब कुछ  महंगा हो गया। वरिष्ठ नागरिक जो जीवन भर की संचित पूंजी के ब्याज से  जिंदगी  गुजारते हैं वे   हताश हैं क्योंकि बैंक जमा पर ब्याज दर घट चुकी है। सोचिए, उनके लिए कितना बड़ा संकट है  जिनकी ब्याज दर से जिंदगी चलती थी। एक तरफ ब्याज की दर कम हो गई यानी आमदनी घट गई और दूसरी तरफ महंगाई बढ़ गई यानी उस  आमदनी में  जीना कठिन हो गया।  मध्यवर्ग को टैक्स में छूट नहीं मिली जो चोट पर मरहम का काम करती , ऊपर से जो लाभ मिलता था वाह  सेस  मैं1% इजाफा करके घटा  दिया गया। 

   मध्य वर्ग के मतदाता पढ़े लिखे हैं और  चीजों को समझते हैं,  उन्होंने अब सवाल पूछने शुरू कर दिए हैं। कुछ तो भाजपा से विमुख हो चुके हैं और हो सकता है  उसे वोट न दें।  लेकिन वोट नहीं देना या कहें कि मतदान में शामिल नहीं होना तो पार्टी  के लिए फायदेमंद हो जाएगा।  भाजपा को भी महसूस होने लगा है  लिहाजा वह  वामपंथी आदर्शों की ओर हल्का  सा झुकती दिख रही है ,  विशेषकर अपनी आर्थिक नीतियों  के मामले में।  जैसे आरंभ में भाजपा मनरेगा के विरुद्ध थी लेकिन अब उसने उस  मद  में  आवंटन बढ़ा दिया है।  संदेश साफ है की अंत्योदय कार्यक्रम गलत नहीं था।  लेकिन अन्य गैरबराबरियों  का क्या होगा ?

      भाजपा  ने  बड़ी चालाकी से एक नया वोट बैंक  तैयार करना शुरू कर दिया है।  वह वोट बैंक है गरीब और निम्न मध्यवर्गीय आबादी का।  अब  चूंकि  मध्यवर्गीय  आबादी  तेजी से बढ़ रही है और कोई सरकार इसे नजरअंदाज करने का साहस नहीं कर सकती इसीलिए वह इसे भी लुभाने की कोशिश में है ।  2014 में कांग्रेस ने  मध्यवर्ग को ध्यान में नहीं रखा । कांग्रेस  को उसकी कीमत चुकानी  पड़ी ।  भाजपा को शक है कि  मध्य मध्यवर्ग अमीरों के साथ जा सकता है यही कारण है  कि  पार्टी गरीब और निम्न मध्यवर्गीय समुदाय को लुभाने में लगी है।  वह कितना सफल होगी यह तो वक्त ही बताएगा।

 

Monday, April 16, 2018

कठुआ - उन्नाव और न्याय का सवाल

कठुआ - उन्नाव और न्याय का सवाल
संत इज़्किल ने  कहा है कि " एक धार्मिक आदमी का मार्ग चारों तरफ से स्वार्थी, अन्यायी और बुरे लोगों से घिरा होता है। इसमें धार्मिक वही है जो अपनी अच्छाइयों को कायम रखे हुए इन बुराइयों से बाहर निकल आता है। वही अपने भाइयों -साथियों और नीरीह  बच्चों का रक्षक होता है।"
      जम्मू के कठुआ में आठ साल की बच्ची की हत्या और उन्नाव में एक दूसरी किशोरी के बाप की हवालात में मौत, इन दिनों सोशल मीडिया  बड़ी चर्चा का विषय है। इस संदर्भ में जरा संत इज़्किल के उपरोक्त उद्धरण को देखें। इस पूरे मामले के चारों ओर अन्याय और उस  अन्याय  के औचित्य के लिए तरह - तरह की दलीलें लिपटी हुई हैं। अब इस से कैसे बाहर निकला जाए ?  दूसरी सदी के रोमन सम्राट मार्कस औरेलिस की बात याद आती है कि  " जीवन का उद्देश्य बहुमत के साथ रहना नहीं है अच्छाई और बहादुरी अपनी राह चुनने में है।" अब दोनों उद्धरणों को मिला दें तो ऐसा लगता है की बुराइयों के बीच से निकलने एक मात्र तरीका है हम उनके साथ ना रहें जिन से हम सहमत होना चाहते हैं ,बल्कि अपने सिद्धांत खुद गढ़ें और उस पर अड़े रहें अगर आप अपने हित के प्रतिकूल भी आ जाते हैं तो वहीं खड़े रहिए धर्म के लिए यह कीमत चुकानी पड़ेगी।
    उपरोक्त सिद्धांतों के अनुरूप हम एक समाज के रूप में उन लोगों की निंदा करते हैं जिन्होंने ऐसा किया और साथ ही उनकी भी, जो उन्हें बचाने में जुटे हैं । यह एक ऐसा अपराध है जिसे रफा-दफा नहीं किया जा सकता है । वह भी किसी इतिहास और किसी आदर्श के आधार पर।  आठ  साल की बच्ची के साथ जो कुछ भी हुआ उस पर गुस्सा और न्याय की मांग जायज है।  उसके लिए किसी धर्म की जरूरत नहीं है । जरूरी है कि आप एक अच्छे इंसान बने रहें। 
चार-पांच दिनों से इस मामले को राजनीतिक रंग दिए जाने की कोशिश चल रही है । ऐसे में यह जरूरी है उनका विश्लेषण किया जाए जो ऐसा करते हैं।  साथ ही इस मामले के प्रति उनके रुख का विश्लेषण जरूरी है। जैसे ही इस मामले को राजनीतिक रंग दिया जाने लगा वैसे ही नरमपंथी समूह को रास्ते से जबरन हटा दिए गया और पक्षपाती लोग उनकी जगह पर आ कर जम गए । अगर सोशल मीडिया की मानें  तो देश का हर आदमी इस घटना पर क्रोधित है लेकिन वे कब तक अपनी जगह पर अड़े रहेंगे जब उन्हें पता चलेगा उनका उपयोग राजनीतिक समर्थन के लिए किया जा रहा है तो वह बगले झांकने लगेंगे।  एक ऐसा भी समुदाय है जो चीख - चीख कर कह रहा है कि जब तक दोष प्रमाणित ना हो जाए तब तक कुछ नहीं किया जाए।  जब भी कोई बर्बर घटना घटती है जैसा कि कठुआ में हुआ तो आपराधिक न्याय का यह जुमला उछाला जाने लगता है । इसके बहुत ही गंभीर परिणाम हो रहे हैं  और  गरीब मारे जा रहे हैं।  ऐसे लोगों के मामले में जो किसी दल में नहीं हैं किसी बलात्कार के मामले में " निर्दोष - दोषी"  समीकरण को बदलने की कोशिश करने वाले जो लोग हैं वह वस्तुतः मामले की आपराधिक ता के बारे में बहुत कम जानते हैं या नहीं जानते हैं।  वह महज किसी धर्म या जमात के करीब आना चाहते हैं या आने का बहाना चाहते हैं। जो हो, वे जो  आपराधिक न्याय के सिद्धांतों के बारे में कुछ नहीं जानते हैं , आगे बढ़ कर बोलते हैं । 
      कुछ दिन पहले गुड़गांव के एक स्कूल में बच्चे का खून हो गया था पहले तो टालमटोल होती रही ।  बाद में जब दबाव पड़ा  तो पुलिस ने एक गरीब को बलि का बकरा बना दिया।  पुलिस की यह प्रवृत्ति है कि   बकरे के रूप में गरीबों का इस्तेमाल करती है। पूरी दुनिया में माना जाता है की गरीबी और जबरदस्ती अपराधी बनाए जाने की संभाव्यता में सह संबंध है । कई बार ऐसे लोग ,जो अपना बचाव नहीं कर सकते उन्हें पुलिस जैसी संस्थाएं और राजनीतिज्ञ  अपना निशाना बना बना लेते हैं। विशेषकर , ऐसे मौके पर जब किसी मामले को खत्म करने के लिए दबाव पड़ने लगता है। ऐसे कई  बहुत  लोग हैं जो खुद को या अपने परिवार को बर्बाद होने से बचाने के लिए तर्क देते हैं कि जब तक अपराध ना प्रमाणित हो तब तक वह निर्दोष है लेकिन इस तर्क की कोई सुनवाई नहीं होती।  पुलिस ऐसा नहीं करती। पुलिस जांच में सुस्ती बरतती है और अंत में किसी गरीब के सिर पर थोप कर उसे हवालात में डाल देती है।  मीडिया भी चुप रह जाती है। जिस अपराध की बात हो रही है उसमें एक एंगल हिंदूवाद का भी है और मीडिया का एक वर्ग भी इसके साथ शामिल है।  इसके दो कारण हैं, पहला हिंदुओं ने ही घिनौना अपराध किया है और उनका इरादा दूसरी बिरादरी के लोगों को वहां से भगाना है दूसरा कारण है हिंदू संगठन और नेता बलात्कारी  का समर्थन कर रहे हैं इन दोनों तर्कों पर झूठ का मुलम्मा चढ़ा हुआ है और अगर उनकी बारीक जांच की जाए तो यह टिक नहीं पाएगा।
     अब सवाल उठता है कि जब इतना कुछ है ही तो हम न्याय की मांग क्यों कर रहे हैं? जब कि पूरी संभावना है कि इस घटना  को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। राजनीतिक नेताओं द्वारा बलात्कारियों का बचाव कोई नई बात नहीं है। 1984 के सिख दंगे में बहुत सी महिलाओं के साथ बलात्कार हुए थे लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जी ने यह कह दिया कि " जब बहुत बड़ा वृक्ष गिरता है तो धरती कांपती है।"   हाल में मीडिया का एक वर्ग तरुण तेजपाल को छुड़ाने के लिए लामबंद हो गया था उनका कहना था तेजपाल हिंदुत्व फासीवाद के शिकार हुए हैं।
  यही नहीं कश्मीर में एक आतंकवादी जो फौज की गोली का शिकार हुआ था , की अंत्येष्टि में हजारों लोग शामिल हुए थे। यानी,  दोषी को बचाना और अपराध को राजनीतिक रंग देना इन दिनों आम बात हो गई है। यही नहीं घटना के बाद मीडिया में बहस  दौरान एक नए किस्म का तर्क सुना  जा रहा है इसमें लोग एक दूसरे समुदाय पर दोष मढ़ने के लिए आमादा रहते हैं और उदाहरण के तौर पर पीछे कभी किए गए अपराध की मिसाल देते हैं। इस तरह के तर्क शातिर किस्म के कायर लोग देते हैं। क्योंकि जब बलात्कार का शिकार एक हिंदू लड़की होती है तो क्यों नहीं बलात्कारियों के धर्म को उछाला जाता है इस दमनकारी व्यवस्था के साथ अगर हम हैं तो समझ लीजिए हम एक-दूसरे के खिलाफ हैं क्योंकि जो बात घर के लिए खराब होती है वह घरवालों के लिए अच्छी नहीं होती । इसका ध्यान रखना जरूरी है।

Sunday, April 15, 2018

अब गलत को गलत कहना होगा

अब गलत को गलत कहना होगा

इन दिनों हमारे देश में लगातार ऐसी घटनाएं घट रही हैं कि  लगता है  कि गृह युद्ध की स्थिति आ गई है। हम 8 साल की बच्ची  से सामूहिक बलात्कार  और फिर  उस की  निर्मम  हत्या  की घटना पर चुपचाप बैठे हैं या हिंदू मुसलमान अथवा जनजाति के समीकरण ​ि0बठाने में लगे हैं।  बलात्कार ऐसा लगता है कि पुराने जमाने की तरह युद्ध का एक हथियार बन गया है। लेकिन, कठुआ में जो हुआ वह ऐसा नहीं था। यह साफ है कि वह बच्ची वहां के हिंदुओं और गूजरों के बीच जंगल और चारागाह को लेकर लंबी लड़ाई का शिकार हुई और इसमें जुड़ गई वहां की सामाजिक स्थिति जो अरसे से जातीय अनुपात  को बदलने को लेकर उस इलाके में फैली हुई है। वह  बच्ची इसी निर्ममता का शिकार हुई है। उसे पहले पकड़ा गया फिर   नशे की दवा दी गई और तब एक मंदिर में कई लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया।  बहुतों को याद होगा बोस्निया का वह बलात्कार, जहां इरादा था की इसके बाद जो बच्चे पैदा व7े सर्बियाई होंगे। यही नहीं 1971 के बांग्लादेश के युद्ध में पाकिस्तान के पंजाब से आए सैनिकों ने लगभग दो लाख  महिलाओं से इसलिए बलात्कार किया उससे जो बच्चे पैदा होगे वे पंजाबी होंगे।  पुरुषों द्वारा   यौन अपराध अपनी ताकत को साबित करने और अपनी आबादी  को बढ़ाने के इरादे से पहले भी कई बार किया गया है।  एमनेस्टी इंटरनेशनल ने महिलाओं को युद्ध का एक ऐसा शिकार बताया है जिसे  कोई जानता नहीं ना ही  इसके लिए उसे कोई सम्मान मिलता है। हार्वर्ड के विख्यात  प्रोफेसर  होमी भाभा   ने जातीय राष्ट्रवाद के उदय  को ऐसे विचार की संज्ञा दी है जिसमें कुछ लोग यह समझते हैं कि उनका उस क्षेत्र पर   दूसरों से ज्यादा अधिकार हैं या उनकी नागरिकता ज्यादा गंभीर है।  ऐसे लोगों के पास प्रचुर आर्थिक सामाजिक और कानून अधिकार भी हें फिर भी वह दूसरों को बर्दाश्त नहीं कर पाते।   कठुआ का समाज हिंदू बहुल है   और गूजर वहां जनजातीय  समुदाय के हैं। वे  गूजरों को बराबरी का दर्जा  देने को तैयार नहीं हैं।  वह लड़की जो इस घटना की शिकार हुई वह गूजर के समुदाय की थी। वह बच्ची राष्ट्रवाद  के जहरीले प्रभाव  का  ही शिकार नहीं हुई  बल्कि भारत में चल रहे  वर्तमान वहशीपन का भी  शिकार हुई है।  इस क्रूरता को ऐसे लोगों की मंजूरी मिली हुई है जो खुद को हिंदू एकता मोर्चा का सदस्य बताते हैं।  साथ ही सरकार की लंबी चुप्पी  भी इसके लिए  जिम्मेदार है यहां तक की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बहुत देर तक चुप्पी साध रखी थी।  यह क्रूरता अभी और लोगों को शिकार   बनाएगी अभी तो केवल  दलित और मुसलमान  ही इसका शिकार हुए हैं  और धीरे धीरे महिलाएं भी इस सूची में शामिल हो रही हैं।   अभी हाल ही में एक भाजपा विधायक ने एक किशोरी को अपना शिकार बनाया, हम चुप रहे।  हमने चुप रह कर आबाध वैश्वीकरण और धार्मिक हिंदुत्व को मंजूरी दे दी।  एक तरह से हमने अपने फर्ज की तरफ से आंखें मूंद लीं। हम  खुद को लोकतांत्रिक  कहते हैं और हम ने मान लिया हमारी ट्रेन,  जो निजीकरण की तरफ बढ़ रही हैं, समय पर चलेगी , हमारे बच्चों के लिए रोजगार होगा, भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा। बशर्ते हम कुछ सड़कों के नाम बदल दें, कुछ मूर्तियों को गिराकर उनकी जगह नई मूर्तियां लगा दें तो हो सकता है कि भविष्य में हमें इसका लाभ मिले और हमने ऐसा किया। किसी ने यह नहीं सोचा कि  यह ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाला। गौर कीजिए, पहले उन्होंने अल्पसंख्यकों  पर हमले किए उसके बाद दलितों पर अब महिलाएं निशाने पर हैं। नेहरु और अंबेडकर पर उंगलियां उठायी जाती हैं। लेकिन वे ज्यादा यथार्थवादी थे और साथ में थोड़ा सीनिकल भी। आजाद भारत शवों  के ढेर पर बना बना है। लगभग  20लाख शरणार्थियों  के लहू से इसकी नींव भरी गई है। हमें उस संर्घष के लिए अब तैयार होना होगा जब सही कहने के लिये दंडित होना पड़े। लेकिन हमें अब कहना होगा कि  क्या सही है और क्या गलत है।

Friday, April 13, 2018

गैरजिम्मेदाराना हरकत  

 गैरजिम्मेदाराना हरकत

 अगर देश में रोजाना हो रही है हरकतों  को एक साथ रखकर देखें तो अजीब लगेगा आपके मुंह से सहसा एक सवाल आ  जाएगा क्या हो गया हमारे देश को। कहीं 5 बरस की बच्चे से बलात्कार हो जाता है और उसकी हत्या देश  चुप रहता है।  कहीं विधायक एक किशोरी के साथ मुंह काला करता है और शिकायत दर्ज कराने गए  उसके बाप को   झूठे मुकदमे में  फंसा दिया जाता है।  उसे इतना उत्पीड़ित किया जाता है कि  वह हवालात  मैं ही आत्महत्या कर बैठता है। देश और वक्त की सरकार चुप रहती है । कहीं दंगे होते हैं,  बैंक का घोटाला हो जाता है और घोटालेबाज देश से बाहर ऐश करता है।  देश चुप रहता है।  क्या हो गया है हमारे मानस को?  पिछले दिनों कांग्रेस ने दिनभर की भूख हड़ताल की।  खाए , पिए और अघाए लोगों का एक समूह दिन भर कुछ नहीं खाया।  देश चुप रहा।  जिस देश में कम से कम आधी जनता और लाखों दुधमुंहे बच्चे दिन भर बिना खाए बिलबिलाते रहते हैं उस देश में कुछ लोगों का एक समूह सरकार की नीतियों के विरोध में नहीं खाया और हम चुप रहे।  यही नहीं जिसे इस देश को चलाने की जिम्मेदारी हम ने सौंपी है वह भी  गुरुवार को भूख हड़ताल पर बैठे।  प्रधानमंत्री भी शामिल थे।  कितना हास्यास्पद लगता है कि जब सरकार  हड़ताल पर चली जाती है।  यह तो हद हो गई।  सोमवार को कांग्रेस अनशन पर बैठे थे उनका कहना था की भाजपा की  दमनकारी नीतियों के विरोध में उन्होंने कदम उठाया है। घटिया कॉमेडी नाटक की तरह  वह लोग दिन भर बैठे  रहे।  अलबत्ता, यह तो जरूर हुआ कि  उन्होंने ए सी और अन्य आराइशों    को छोड़कर इस गर्मी में  बैठे रहे,  वाह रे दुखी लोग।  अब इसके बाद उसी नाटक का दूसरा दृश्य सामने आता है और सत्तारूढ़ दल  के लोग भी यहां तक की हमारे प्रधानमंत्री भी दिन भर के  अनशन पर बैठ गए ।  उनका कहना था कि वे लोग विरोधी दलों के टोकाटाकी  यह सलाह अनशन पर बैठे हैं।  अब सवाल उठता है हर आदमी विरोध कर रहा है  तो उत्तरदाई कौन है ? भाजपा का यह नाटक  बहुत सुंदर ढंग से गढ़ा गया था। जहां कांग्रेस के अनशन पर छोले भटूरे की महक  छाई हुई थी वही भाजपा के इस अनशन पर अनशन स्थल से खाने पीने के स्टॉल्स हटवा दिए गए थे,  ताकि कार्यकर्ता  ललचाए नहीं।  देशभर में भाजपा के नेता अपने अपने इंसानों की तस्वीर  ट्विट  करते रहे। प्रधानमंत्री  अपने अनशन रत कार्यकर्ताओं के साथ यह प्रदर्शित करते रहे देश का आम आदमी बिना   खाए पिए  भी काम  काम करता रहता है । जब सारी कवायद चाहे  कांग्रेस की हो  या  भाजपा की देख कर ही लग रहा था तमाशा हो रहा है सब  सब दिखाऊ  है। भाजपा सत्तारूढ़ दल है और संसद से लेकर देश के राज्यों तक में उसका बहुमत है कई राज्य छोड़कर सभी राज्यों में उसकी सरकारें हैं। सरकार का कर्तव्य है कि वह दूसरों की शिकायतों को सुने और उसे दूर करने की कोशिश करे।  अगर  अगर प्रधान सेवक  ही हड़ताल पर चला जाता है तो जनता की कौन  सुनेगा।

     भूख हड़ताल  या  अनशन  एक नैतिक शस्त्र है  ना कि  उत्तर मांगने का जरिया।  जरा अपने भीतर झांक कर सरकार  देखें कि संसद में व्यवधान में  वह निर्दोष नहीं है। बजट सत्र में संसद में व्यवधान और कार्यस्थगन के कारण बहुत तुम कहां हो सका ।  गुरुवार के पहले तक प्रधानमंत्री यह कहते चलते थे कि जो लोग 2014 में सत्ता नहीं पा सके वह नहीं चाहते कि सरकार जनता का काम करें और देश आगे बढ़े । इसलिए उन्होंने संसद को नहीं चलने दिया।  विपक्ष ने लोकतंत्र की हत्या कर दी  और हम इस अपराध को जनता के सामने लाने के लिए अनशन पर बैठे हैं ।   लेकिन क्या यह दावा सही लगता है?

 इस बार संसद में व्यवस्था नहीं रही।  भारत के लोकतंत्र के इतिहास में यह पहली घटना है जब सदन में व्यवस्था हीनता के चलते अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता।  यह खुद के खिलाफ  ही अविश्वास प्रस्ताव है।  संसद के इसी सत्र में सरकार ने यह भी दिखाया है कि वह चाहे तो काम काज चल सकता है। सदन में भारी अव्यवस्था के बीच 1घंटे के भीतर बजट पारित हो गया, कैसे?  भाजपा का  संसद में प्रचंड बहुमत  है और यह उसकी जिम्मेदारी है कि  वह  विपक्ष के साथ बैठकर इस मामले को सुलझाए और  सदन के चलने की व्यवस्था करे। भाजपा,  ऐसा लगता है,   कि सदन इस कारोबार को चलाने के बारे में दो ही ढंग से सोचती है।  पहला जबरदस्ती विधेयकों को पास करा दिया जाए या फिर  सदन को ही पंगु बना दिया  जाए।  वैसे अगर सदन को पंगु बना देना इतिहास को देखा जाए तो यूपीए -दो  के सरकार  के काल में आखिरी  कई सत्रों  को नहीं चलने देने का रिकॉर्ड भाजपा के पक्ष में  जाएगा।  संसद के दोनों सदनों में अरुण जेटली तथा सुषमा स्वराज ने इतना शोर मचाया एक तरह से लोकतंत्र को ही काम नहीं करने दिया गया।  इसके पक्ष में सुषमा जी का यह तर्क था संसद को नहीं चलने देना  भी संसदीय लोकतंत्र का एक तरीका है।  अरुण जेटली ने कहा था कि अगर संसदीय जवाबदेही को नजरअंदाज किया जाता है तो यह विपक्ष का कर्तव्य है संसद नेता होने से  रोके।  आज भाजपा शासन में है और देश में जो हो रहा है,  सामाजिक सांप्रदायिक स्तर पर,  वह देश की जनता देख रही है।  मोदी जी से लोग समाधान मांगते हैं प्रदर्शन नहीं।   मोदी जी ने क्यों किया वाह लोकतंत्र  मैं गैरजिम्मेदाराना हरकत है।