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Thursday, November 23, 2017

होना राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष 

होना राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष 

राहुल गांधी का अध्यक्ष होना कोई ऐसी घटना नहीं है जो अप्रत्याशित हुई हो या कोई बहुत बड़ी सफलता हो उनके लिये। राहुल गांधी ने जिस दिन राजनीति में कदम रखा और 2004 में अमेठी का चुनाव जीता उसी समय से यह लगने लगा था कि वे पार्टी के नये अध्यक्ष होंगे। बस उस समय एक ही सवाल था कि उनकी माताजी सोनिया गांधी कब पद छोड़ेगी। कांग्रेस के इस पद का मां से बेटे तक आना तो कांग्रेस की फितरत है और यह एक तरह से विरासत मिलने की तरह है। बदकिस्मती कांग्रेस की यह है कि उसमें जो भीतरी फूट है उसे केवल नेहरू - गांदाी परिवार का सदस्य ही एकजुट रख सकता है। अब कुछ एकदम अनहोनी हो जाय तो अलग बात है कि दिसम्बर में राहुल गांधी का पार्टी अध्यक्ष होना तय है। वैसे अभी भी  सारे फैसले वही करते हैं बस सोनिया जी की मुहर लगती है। ताजपोशी के बाद वे भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष बन जायेगे। यह तो सभी जानते हैं कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विकल्प बनने के लिये संघर्ष कर रही है। अलबत्ता राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाये जाने के वक्त की बड़ी अहमियत है। 2014 के चुनाब्में भारी पराजय गे बाद  कांग्रेस राहुल गांधी को सर्वोच्च पद पर भेजने के पक्ष में नहीं थी। इसका मतलब यह था कि पार्टी को मालूम था कि मोदी से इनका कोई मुकाबला नहीं हो सकता है। मोदी जी का बढ़िया वक्त चल रहा था। सोनिया जी ने अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद वे राहुल जी को अध्यक्ष बनाने की जल्दीबाजी में नहीं थीं। वे गुजरात विधान सभा चुनाव को संभाले हुये थे। गुजरान में 1985 के बाद पार्टी को कभी विजय नहीं हासिल हुई थी। इस जिम्मेदारी से ही लगने लगा था कि पार्टी में कोई बड़ा रद्दोबदल होने वाला है। अब राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ा काम कांग्रेस नेतृतव हासिल करना नहीं है बल्कि खुद को नरेंद्र  मोदी की राह में दीवार के रूप में  खड़ा करना  है। उस समय जब सोनिया जी ने खुद के लिये  प्रधानमंत्री पद का दावा पेश नहीं किया और  मनमोहन सिंह को आमंत्रित किया तब उनका मानना था कि सामने सभी नौजवान और अनुभवहीन लोगों की जमात खड़ी है।  उसके बाद से वर्षों गुजर गये राहुल गांधी ने एक बार भी ऐसा साबित करने की कोशिश नहीं की कि वे सरकार का हिस्सा बनना चाहते हैं। वह घड़ी सबके मन में ताजा होगी जब उन्होंने अपनी ही पार्टी द्वारा लाये गये एक अध्यादेश को सरेआम फाड़ दिया। इससे क्या संदेश गया कि यह प्रधानमंत्री के खिलाफ " युवराज का  अक्खड़पन " है। पर इन दिनों राहुल गांधी ने थोड़ी परिपक्वता दिखायी है और सोशल मीडिया में उनके खिलाफ " मोदी पंथियों " की बदजुबानियों के आगे झुके नहीं और मोदी  सरकार की नीतियों  के खिलाफ लगातार बोलते रहे। नतीजा यफह हुआ कि जनता में उनके पक्ष में भी बात चलने लगी है। ऐसा इसलिये नहीं कि देश के लोग विकल्प की तलाश में हैं बल्कि इसलिफये कि उनके भाषण ज्यादाा असरकारक महसूस हो रहे हैं। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और इसका प्रभाव सोशल मीडिया में दिखने लगेगा। यह एक तरह से मुकाबला है। भाजपा ने अपनी नीतियों और नेताओं के प्रछाार के लिये सोशल मीडिया कना जम कर प्रयोग है ओर कर रही है। यही कारण है कि पिछले महीने भाजपा अध्यक्ष ने गुजरात के नौजवानों को सचेत किया कि वे सोशल मीडिया में कांग्रेस के प्रचार के झांसे में ना आयें। उन्हें केवल चुनाव नहीं जीतना है बल्कि कुछ पहल भी करनी होगी तथा बड़े मसलों के बारे में सोचना भी होगा। उन्हें संसद में भी, जहां वे अक्सर चुप रहते हैं,  खुद को साबित करना होगा। उन्हें संसद में खद को सबसे अलग और विशिष्ट प्रमाणित करना होगा। इसके लिये अर्थ व्यवस्था, विदेश नीति ओर अन्य मसलों को उठाना होगा। परिवार या विरासत ने बेशक राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बना दिया पर अगर वे भारत जैसे देश का नेता बनना चाहते हैं तो उन्हें कुछ नीतियां तैयार करनी पड़ेंगी जिसे देश के लोग मानें। अब उस दिन का इंतजार करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं कि मोदी कब गड़बड़ायेंगे ओर हम धक्का देंगे। उन्हें साबित करना होगा कि वे देश के प्रधानमंत्री बनने के योग्य हैं ओर इसके लिये केवल भाजपा ओर मोदी की आलोचना करना जरूरी नहीं है बल्कि देश को अपनी नीतियों के बारे में समझाना ​और मुतमईन करना जरूरी है कि वे कुछ नया करेंगे। यही नहीं उन्हें अन्य दलों से भी करनी होगी क्योंकि 2019 में उनकी इन्हें जरूरत पड़ेगी। मोदी जी के सहड़े तीन साल के काम से जनता में असंतोष पनपने लगा हे। यह राहुल जी के लिये अच्छा मौका है। वे इसका लाभ उठा सकते हैं।  

Wednesday, November 22, 2017

बदलते संकेत

बदलते संकेत

यूनान के एक प्राचीन  दार्शनिक हेराक्लाइटस ने कहा हे कि " आप एक ही नदी में कभी दो बार नहीं जा सकते। " यानी कहने का अर्थ है कि जस नदी में आप पहली बार गये वह बदल चुकी है , उसका पहले वाला पानी जा चुका है और अभी जो पानी दिख रहा हे वह नया पानी है और यह भी कुछ क्षणों में बदल जायेगा। यह शाश्वत परिवर्तन की चेतावनी है। किसी भी को आप नि​िश्चत तौर पर नहीं कह सकते कि ऐसा ही होगा। वर्तमान अतीत का एक्सटेंशन है इसलिये भविष्य का भी निर्देशक है। आज जो हमारा वर्तमान है वही तो अतीत का भविष्य था। यह एक सबक है जिसे 2019 के लिये बाजपा को अपने दिमाग में रखना होगा। 15 अगस्त तक नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति पर वर्चस्व कायम करते हुये प्रतीत होते हैं , लेकिन 2019 यह प्रश्न लेकर आयेगा कि उनका , मोदी जी का , बहुमत कितना बढ़ेगा। क्योंकि बादल धीरे- धीरे गहरे होते जा रहे हैं। राम रहीम के पतन के बाद से ही बादल गहराने लगे जो मनोहर लाल खट्टर द्वारा हरियाणा में  अपनी जनता की हिफाजत में नाकामयाबी से  और भी दूर तक फेल गये। बाद में योगी आदित्यनाथ ने कुछ ऐसा समां बांधा मानों अगले 6 महीनों में वही मुख्यमंत्री हो जायेगे। लेकिन इन राज्यों में 2019 के पहले चुनाव नहीं होने वाले। नरेंद्र मोदी चाहे जब चुनाव करायें यह अबसे आम चुनाव तक का सफर है और इस सफर पर बहुत सावधानी से नजर रखनी होगी।राह में कई खतरे हैं। बात गुजरात से ही शुरू करें। नरेंद्र मोदी द्वारा विगत तीन चुनावों में बेहतरीन रेकार्ड कायम  किये जाने के बाद इसबार उसे बनाये रखना भाजपा के लिये सरल नहीं होगा। वहां विडम्बना यह है कि मुख्यमंत्री अनजान हैं , कहीं उनके दर्शन नहीं हो रहे हैं ओर सारा प्रचार मोदी और अमित शाह संभाले हुये हैं। 2015 का दिल्ली चुनाव याद करें। मंचों से लेकर पोस्टर तक मोदी छा गये थे। इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। अब पद्मावती को लेकर चल रहा आंदोलन। भाजपा नेता अगर यह समझते हैं कि इसे रिलीज करने में विलम्ब से कुछ लाभ होगा तो वे भूल कर रहे हैं। यह 21 वीं सदी है। लोग उसके गाने सुन चुके हैं और किसी दिन कोई मनचला उसकी पाईरेटेड प्रति ऑन लाईन  डाल देगा तो सेंसर बोर्ड अपनी डफली बजाता रह जायेगा। अब वह  जमाना लद चुका है जब सरकार सूचनाओं रोक देती थी। वैसे यह आंदोलन मतदाताओं को भड़काने के उद्देश्य से किया जा रहा है। लेकिन यह दोधारी तलवार है क्योंकि इसके जो शिकार होंगे उन्हें भी तो काबू नहीं किया जा सकता है। गुजरात में राहुल गांधी को सबनेश् देख लिया , कम से कम अब लगने लगा हे कि वे कुछ कर सकते हैं। राहुल गांधी का बर्कले बाषण जिसने सुना उसे लगा कि यह कोई अलग आदमी है। तबसे राहुल गांधी बहुत आगे आ चुके हैं। ऐसा लगने लगा है कि उनके पास अच्चे सलाहकार जमा हो गये हैं और वे उनकी छवि को सुधारने की कोशिश में हैं। उनके ट्वीट्स तूफान खड़े कर दे रहे हैं क्योंकि पहले वे मोदी जी का विरोध करते थे और उनहें खारिज करने में लगे रहते थे पर अब वे उनकी खिल्ली उड़ाते हैं। अभी यह कहना बहुत जल्दीबाजी होगी कि यह सब कितना लाभ पहुंचायेगा पर यह तो तय है कि गुजरात में पहले वाली बात नहीं रहेगी। भाजपा को अतनी कामयाबी नहीं मिलेगी जितनी 2012 में मिली थी साथ ही राहुल गांधी कहें या कांग्रेस को उतनी असफलता भी नहीं मिलेगी। दोनों पक्षों के लिये सबसे कठिन परीक्षा 2080 में होगी। मध्य प्रदेश में वर्तमान शासन की वापसी मुश्किल लगती है ओर उधर कांग्रेस अपने पत्ते खोल चुकी है। कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया है। इससे लग रहा है कि धीरे धीरे नौजवान पीड़ी कांग्रेस को अपने कब्जे में ले रही है। भाजपा को इसपर ध्यान देना चाहिये। 

  

गांधी को किसने मारा ? 

गांधी को किसने मारा ? 

हत्या रिवाल्वर से हुई तो ईटली की बेरेटा पिस्तौल कैसे बरामद हुई

गोड्से अकेला नहीं था, पदें के पीछे छिपे हैं कई रहस्य

हरिराम पाण्डेय

कोलकाता : महात्मा गांधी की हत्या को लेकर इन दिनो सवाल उठने लगे हैं और मामला सुप्रीम कार्ट तक में जा चुका है। आरंभिक दिनों से ही इस हत्या के सच को सामने लाने की कोशिश में सन्मार्ग सहित कई लोग लगे हैं। सन्मार्ग द्वारा किये गये शोध से कई बातें समाने आतीं हैं। बात शुऱु होती है 30 जनवरी 1948 से जब प्रार्थना सभा में गांधी की हत्या हुई। इसके बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने दश को इसकी जानकारी दी। इसके दो दिन बाद 2 फरवरी को संविधान सभा में नेहरू ने भरे गले से कहा कि " आाज यह हकीकत है कि वह दिव्य पुरूष, जिसे हम सब बेहद प्यार देते थे और इज्जत देते थे, चला गया क्योंकि हम उसे पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे सके, यह हम सबके लज्जा का विषय है। " 

यह विषय आज भी हमारे लिये कम लज्जाजनक नहीं है। क्योंकि तकनीकी विकास , फोरेंसिक सबूतों , सैकड़ों प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, कट्टरवादियों वर्षों निगरानी की रपटें, पुलिस के रेकार्डस की सैकड़ों फाइलों ण्के बावजूद हम यह नहीं तय कर सके कि असली खूनी कौन है ओर इस बात को लेकर मसला 69 वर्ष के बाद भी जीवत है तथा उसपर शोध की जरूरत समझी जा रही है। यह गांधी की दुबारा हत्या है। पहली बार गोली से और दूसरी बार इस तरह की बहस से। 

 गांधी जी के भौतिक शरीर की हत्या पर पहले बात करते हैं। सबको मालूम है कि नाथूराम गोड्से ने गांधी जी को मारा। अपराध शास्त्र के मुताबिक किसी भी अपराध के पीछे चार पहलू होते हैं। उनमें है कर्ता यानी जिसने वह कर्म किया, सहयोगी , प्रेरक ओर अनुमोदक। अपराध शास्त्र इन चारों को सजा देने की सिफारिश करता है। लेकन इस मामले में दो कत्ताऔं को मुक्त कर दिया गया, उनके बारे में कोई सूचना नहीं है। इसके अलावा तीन पहलुओं पर ध्यान ही नहीं दिया गया। ब्रिटिश शासको ने कभी नहीं चाहा कि अपराध कर्म में शा​्मिल होने से आगे बात बढ़े। क्योंकि वे सबसे बड़े अपराधी थे। उन्होंने अपराधी गिरोह इस्ट इंडिया कम्पनी को नजर अंदाज किया और कम्पनी ने भारतीयों को लूटना ओर मारना जारी रखा। वे नहीं चाहते थे कि भारत का कोई शासक उनसे यह ना पूछे कि अन्होंने भारत को क्यों लूटा और लूट की दौलत विदेश क्यों ले गये?इसीलिये उनहोंने ऐसे कानून बनाये जिससे केवल अपराधकर्मी ही दंडित हो। आजादी के बाद भी उसमें बदलाव नहीं आया। एकबार फिर नहरू के बयान पर गौर करें। उनहोंने कहा कि " हम उनहें पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे सके।" चूंकि बापू से सब प्यार करते थे तो सवाल उठता है कि बापू को किससे सुरक्षित रखने की जरूरत थी या किससे खतरा था उन्हें ? क्या वे हिन्दू कट्टरपंथी थे या मुस्लिम कट्टरवादी या ब्रिटिश सरकार जो 100 वर्षों में एक ऐसे आदमी से हार गयी जिसने कभी एक गोली नहीं चलायी या फिर सबके मिले जुले स्वरूप से। गांधी की हत्या 31 जनवरी 1948 को हुई। 20 जनवरी को उनकी प्राथंना सबा में बम फटा, जिसमें मदनलाल को दोषी बनाया गय। इसके पूर्व , इंटेलिजेंस की रिकार्ड में साफ दर्ज है कि महाराष्ट्र के गृमंत्री मोरारजी देसाई ने गांधी हत्या की साजिश की सूचना भारत सरकार को दी थी। इस सूचना के बावजूद उनकी प्रार्थना सभा में 20 जनवरी 1948 को बम फटा। दिलली पुलिस को इसकी खबर थी पर उसने कुछ नहीं किया और तबतक हाथ पर हाथ धरे बैठी रही जबतक "हे राम " के बम से दुनिया ना दहल उठी। एक पूर्ववर्ती इंटेलिजेंस अफसर की निजी डायरी के फटे पननों में लिखा है कि 20 जनवरी के एक माह पहले दिल्ली में नये पुलिस प्रमुख की तैनाती हुई थी और एक हफ्ते के बाद ही वे बीमारी के कारण लम्बी छुट्टी पर चले गये। बिड़ला हाउस में 20 जनवरी को प्रार्थना सभा में बम फटा। चूंकि वह देसी था और थोड़े में ही फुस्स हो गय। इस मामले में मदनलाल, नाथू राम एवं अन्य 6 लोगों दिल्ली पुलिस ने पिस्तौल , चाकू इत्यादि के साथ गिरफ्तार किया और 22 जनवरी को उन्हें यह कह कर रिहा कर दिया गया कि वे हदिायार उनके नहीं थे। क्या आज के भारत में ऐसा हो सकता हे कि एक आदमी खून के अभियोग में पकड़ाा जय और उसके पास हथियार भी पकड़ा जाय ओर केवल इसलिये रिहा कर दिया जाय कि वह हथियार उसका था यह साबित नहीं हो सका। बम विस्फोट के बाद पुलिस ने ऐसा ढीला ढाला रवैया क्यों अपनाया यह समझ से परे है। इससे भी ज्यादा उलझन इस बात से होती है कि मदनलाल ने 20 जनवरी की रात दिलली पुलिस को उन  सबके नाम बताये थे जिन्होंने इसकी योजना बनायी​ थी, इसके लिये धन दिया था और जिन्होंने इनकी मदद की थी। यह भी बड़ा रहस्यमय है कि  दिलली पुलिस ने 21 जनवरी को यह रिपोर्ट बम्बई  पुलिस को भेज दिया था।  तत्कालीन गृहसचिव आर एन बनर्जी के अनुसार " आप्टे और गोड्से को 23 तारिख को बम्बई में पकड़ा जा सकता था पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। यहां तक कि दिल्ली पुलिस ने बम्बई पुलिस को डस बात को याद दिलाया।" यहां यह जानना उचित होगा कि फकत 6 महीने पहले ही देश आजा हुआ था और इसके पूर्व देश में व्यापक पैमाने पर लूट, हत्या, बलात्कार जैसी कई घटनाएं ााटीं थीं और भारत सरकार ने लार्ड माउंटबेटन से अनुरोध किया था कि हालात के सामान्य होने तक सेना और पुलस को वह संबालें। यानी गांधी की हत्या जब हुई तो पुलिस और खुफिया तंत्र अंग्रेजों के हाथ में थे। अब ऐसे में कहें कि दिल्ली पुलिस और बम्बई पुलिस में को ऑर्डिनेशन नहीं है तो लगता है कि यह सब जानबूझ कर कहा जा रहा है और यह कहा जाय ​्कि संवाद हीनता है तो यह साजिश कही जायेगी। यहां तक गृह सचिव और गृहमंत्री को भी नहीं बताये जाने का मतलब है कि  अंग्रेजो ने एक मिर्म खूनी दस्ता बना रखा था जो कि भारत में अंग्रेजों की विदेश नीति के अनुरूप थी और वह दस्ता चाहे वह मुसलमानों का गुट हो या हिंदुओं का अंग्रेजों के उद्देश्य को पूरा करने के लिये काम करता था। अतएव माउंटबेटन प्रशान के सर्वोच्च स्तर के अनुमोदन के बगैर इस तरह के काम हो ही नहीं सकते। दुर्भाग्य यह है कि इस साजिश को उन्होंने हिंदू या मुसलमान का जामा पहना दिया। अंग्रेजो को डर था कि गांधी आजादी के बाद भी उनके द्वारा किये गये बंटवारे को खत्म करा सकते थे। इसके पहले लगभग 100 वषोंं में ब्रिटिश पहली बार गांधी के हाथों पराजित हो चुके थे। 

 गोड्से और आप्टे को फांसी दे दी गयी पर मदन लाल का क्या हुआ? कोई नहीं जानता। क्या यह जानने की जरूरत नहीं है? यानी गांधी को मारने दो दल गये थे। एक ने 20 जनवरी को कोशिश की पर नाकामयाब रहे और दूसरी टीम 31 जनवरी को सफल हो गयी। गांधी जी की ह्तया की कितनी कोशिशें की गयीं? 6 बार उन्हें मारने का प्रयास किया गया और हम अबी यह कहते हैं कि ​आजादी के बाद पाकिस्तान को 51 करोड़ रुपये दिये जाने के कारण गुस्साये लोगों ने यह किया। यह बात जमती नहीं है क्योंकि गांधी जी से गुस्सा होने के पहले वे अंग्रजों पर गुससा होगे क्योकि उन्होने कत्लेआम किया था। जैसे जलियांवाला बाग कांड के लिये उधम सिंह जेनरल डायर को मारने गये थे ना कि पंजाब गंग्रेस को अध्यक्ष को जिनहोंने जलियांवाला बाग में मीटिंग बुलायी थी। उनका गुस्सा अंग्रेजों पब्र होना चाहिये जो देश से हजारों करोड़ ले गये। लेकिन गुस्सा उसपर हुआ जिसने कथित तौर पर 51 करोड़ दिलवाये। गृहमंत्रालय के जिस पत्र के आधार पर यह कहा जा रहा है उसकी प्रमाणिकता भी संदेहास्पद है। 

गांधी जी की हत्या का एफ आई आर उदूं ओर फारसी में लिखा गया। इसका 1999 में किरण बेदी ने अनुवाद किया। गांधी जी की हत्या का इक गवाह थाने में आया और असने बयान दिया कि उनपर रिवाल्वर से तीन गोलियां चलायीं गयीं थीं। गांधी जी की मौत के बाद वहां बारी शोर शराबा हो गया। कोई डाक्टर नहीं था आस पास उनके शव का पोस्टमार्टम भी नहीं हुआ। यहां सवाल उठता है कि एक अैनिक आदमी दूर से ही कैसे समझ लिया कि गोली रिवाल्वर से चली है और दिल्ली पुलिस ने इसे एफ आई आर में दर्ज भी कर लिया। उस आदमी को बिड़ला हाउस भेज दिया गया ओर बाद में पुलिस बी गयी। पुलिस ने जांच के बदले कुीछ घंटे उस आदमी को गोजने में बिताया। फिर फारसी में एफ आाई आर लिखा गया और उसे पढ़ कर सुनाया गया तथा उसका दस्तखत लेकर पुलिस लौट आयी। यानी, बगैर फोरेंसिक सबूगें का इकट्ठा किये और बिना अपराधी को पकड़े पुलिस ने मान लिया कि रिवाल्वर से तीन गोलियां चलायीं गयीं। लेकन मजे की बात हे कि जिस हथियार से हत्या हुई बताया गया और पेश किया गया वह इटली की बनी बेरेटा पिस्तौल थी , 0.9 मिलीमीटर की पिस्तौल। यही नहीं तीन पिस्तौले पेश की गयीं और गांधी जी के शरीर में जो घाव थे वे उन पिस्तौलों की गोलियों के नहीं पाये गये। यहां सवाल है कि उनकी हत्या किससे हुई- पिस्तौल से या रिवाल्वर से। अगर दोनों से हुई तो दूसरा कौन था? 

  चूंकि पिछले हमले में मदनलाल नाकामयाब हो गया था अतएव जिसने भी योजना बनायी होगी उसने दोहरी व्यवस्था की होगी ताकि अगर पहला कामयाब नहीं होता है तो दूसरा एक्शन में आा जायेगा। एफ आई आर तो हुई लेकिन पंचनामा और पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहां गयी जिसके आधार पर उन्हें मृत माना गया। पिछले 64 वर्षो तक वह कहा था। 2009 में पहली बार उसे खोजा गया वह भी एक आर टी आई के जरिये। सरकार ने इसे तब खोजा जब प्रधानतमंत्री पर 26 हजार रुपये जुर्माने की बात आयी। यह पूरी कथा एक जासूसी उपन्यास की तरह काल्पनिक ओर सनसनीखेज लग रही है। अब मामला जब अदालत में खुलेगा तो देखना है कि इसपर से कितने पर्दे हटेंगे।     

Tuesday, November 21, 2017

हमारी राजनीति का भविष्य

हमारी राजनीति का भविष्य

कहते हैं कि जनता की​ याद्दाश्त बहुत ही कम होती है और हमारे राजनेता इसीका फायदा उठाते हैं। अब किसी ने चर वर्ष पहले चुनाव प्रचार में कुछ कनह दिया ओर पब्लिाक उसपर दीवानी हो दनादन वोट दे दी। अब बाद में वह वायदा जुमला निकला तो क्या जनता को अग्काले चुनाव तक यह याद ही नहीं ​कि नेताजी ने क्या कहा। इस बार गुजरात के चुनाव का ही वाकया लें। नेताओं के भाषणों, जुमलेबाजियों और तंजों में दो बातें सुनने को नहीं मिल रहीं  वे हैं गुजरात के दंगों पर पब्तियां और धर्म निरपेक्षता। अब नेताजी के भगत यह कह सकते हैं कि फाइल बंद हो चुकी है और हमारे चमत्कारिक नेताजी को सारे इल्जामात से बाइज्जत बरी कर दिया गया है। वे गंगा के धोये से सामने आ चुके हैं। लेकिन यहां एक आदमी के दोष की बात नहीं है बात है एक घटना की और ऐसी घटनाएं कैसे हमारे मन में या कहें दिलो दिमाग में बेट जाती हैं ओर हमारे आचरणों को प्रभावित करती हैं। सआदत हसन मंटो की की मशहूर कहानी "टोबा टेकसिंह" या "खोल दो"  घटनाओं के आचरण में बदलने की मिसाल है। गुजरात में जो दंगे हुये 2002 में उनकी खबरों ने देश को दहला दिया। वैसे अगर समाजविज्ञान की नजर से देखें तो यह दंगा भी बिल्कुल अलग किसम का था। इस दंगे से आम आदमी ज्यादा प्रभावित हुये थे और एक तरह से अहमदाबाद की साइकी प्रभावित  गयी थी। यह एक महाविपत्ति थी ओर जिसके बारे में बातें करनी  राजनीतिक तौर पर सही नहीं कही जायेगी। गुजरात दंगे के बाद इकॉनोमिस्ट पत्रिका ने लिखा कि " यहां के लोगों की सोच और आपसी बात चीत में मुहावरे बदल गये हैं।शायद ही अहमदाबाद की साइकी सामान्य ​िस्थति में लौट पायेगी। " लेकिन आज जो दिख रहा है वह एक सामान्यीकरण की बनावटी प्रक्रिया है और उस दंगे के शिकार लोगों को जबरन अपनी स्मृति में से उन बेहद दर्दनाक क्षणों को निकालने के लिये बाध्य किया जा रहा है। इस दंगे सबसे खतरनाक बात यह थी कि इसमें ए क जातीय समूह को दबाने की नहीं समाप्त कर देने की कोशिश की गयी थी। अब इस घटना के शिकार और गवाह दोनों को अपने कथन बदल देने के लिये बाध्य किया जा रहा है। 

 यहां कहने का मतलब यह नहीं है कि इसे भूला नहीं जाना चाहिये था बल्कि यहां तात्पर्य यह है कि इसे जबरन नजरअंदाज किया जा रहा है जो धीरे - धीरे दिमाग के अचेतन में जमा हो जायेगा और यह प्रक्रिया खतरनाक है क्योंकि इससे एक समाज ​किसी हिंसा के लाजिक और प्रसंग तत्काल स्वीकार कर लेगा। यही नहीं लोगों के मन में एक भय बोध यह भी पैदा हो रहा है कि भारतीय जनता पार्टी बेहद ताकतवर है और  विरोधी उसके सामने कुछ नहीं हैं। लेकिन , अभी भी भाजपा साम्प्रदायिक कार्ड को भूलेगी नहीं , खास कर जब विकास के वायदे पूरे नहीं हो सके। यहां राहुल गांधी बीस पड़ रहे हैं क्योंकि स्थनीय राजनीतिज्ञों के पास उपयोग करने करने लायक मुद्दे हैं। अब ऐसे में संभव है भाजपा पुराना खेल चालू कर दे। गुजरात में इस समय कई मुा्रद्दे हैं जैसे दलित मुद्दा , पाटिदार मुद्दा वगैरह वगैरह पर भाजपा अर्से से मंदिर और मंडल को चल रही हे। मंडल की चमक खत्म हो गयी अब हो सका है बाजपा फिर पुराने रंग में आ जाय। आज वहां का हर आदमी दो तरह से भयभीत है वह है कि आम आदमी ना खून खराबे के बारे में बात करना चाहता है और दूसरी तरफ हिंसा से डरा हुआ है। अब ऐसे में अगर सियासत बदलती है और वर्तमान गतिरोध खत्म होता है तो भाजपा पुराने हथकंडों को अपनाने के लिये बाध्य हो जायेगी। 

  दूसरी तरफ एक और भयानक नाकामयाबी दिख रही है। वह है धर्मनिरपेक्ष शब्द की अनुपयोगिता। इनदिनों यह भारतीय राजनीति के लिये निषिद्ध शब्द बन गया हे। यहां तक कि कांग्रेस के लिये भी जो अब तक इसी के सहारे बढ़ी है। गुजरात तो 2019 के चुनाव का एक नमूना है। आज राजनीति में जो भय और चुप्पी  दिख रही है उससे स्पष्ट हो रहा है कि 2019 में भाजपा को रोका नहीं जा सकता है। अल्पसंख्यक और मतविरोधी समूह भय जाहिर कर सकता है पर बहुत ही दबे अंदाज में और यही डर है कि यह दबा अंदाज हमारी राजनीति का भविष्य तय करेगा।