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Thursday, October 19, 2017

सूर्यांश संभवो दीपः

सूर्यांश संभवो दीपः

भारतीय ज्ञान खंड में सर्वाधिक वृहद् आकार वेदों का है. वेड ज्ञान के पर्याय माने जाते हैं.ऋगवेद मनुष्य के अध्यात्मिक ज्ञान का तूर्य है और इस वेद में सृष्टिकर्ता विरंची के बाद अगर सबसे ज्यादा वर्णन नही तो वह अग्नि का है. अग्नि व्याप्त है अंतरिक्ष में सूर्य और धरती पर प्रकाश के रूप में. विज्ञान भी मानता है कि प्रकाश ऊर्जा का रूपाकार है जो अग्नि दीप्त करता है और सूर्य अग्नि और प्रकाश का एकाकार है. ऋग्वेद में माना गया है कि भृगु ऋषि ने अग्नि की खोज की। वहीं से अग्नि संस्था का जन्म हुआ - इंद्र ज्योतिः अमृतं मर्तेषु. ''सूर्यांश संभवो दीपः'' अर्थात सूर्य के अंश से दीप की उत्पत्ति हुई। जीवन की पवित्रता, भक्ति, अर्चना और आशीर्वाद का दीप एक शुभ लक्षण माना जाता है। सूर्य के अंश से पृथ्वी की अग्नि को जिस पात्र में स्थापित किया गया वह आज सर्वशक्तिमान दीपक के रूप में हमारे घरों में है । कहते हैं यह शरीर पञ्च महाभूतों से बना है. वे महाभूत हैं – मिटटी, जल , अग्नि, वायु और आकाश. दीपक की रचना भी इन्ही महाभूतों से हुई है. दीपक एक प्रतीक है पिंड से ब्रह्माण्ड के संयोजन का. प्रकाश हमें देखने की शक्ति देता है। वस्तु की सही पहचान के लिये ज्योति आवश्यक है। बृहद आरण्यक उपनिषद में इसी लिये अंधकार से ज्योति की ओर जाने की कामना की गई है।
असतो मा सद्गमय
तमसो मां ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतं गमय

अमावस्या की रात दीपावली का भी एक खास वैदिक महत्व है। दीपक अंधकार को पराजित करता है और उसी दिन से प्रकाश बढ़ने लकाता है। अंधकार पराजित होने लगता है। अंधकार प्रतिदिन पराजित होता  है। हर रात प्रकाश की विजय होती है। यह क्रम पूर्णिमा तक चलता है। हमारे अंदर अंधकार को पराजित करने की प्रेरणा देकर चांद धीरे से चला जाता है। एक पखवाड़े के लिये। फिर चांद आता है हमारे प्रयास को देखने। हर साल दिवाली हमारे प्रयास की सफलता का पर्व है। साल दर साल सफलता। सफलता ही लक्ष्मी है। लक्ष्मी जो कमल पर विराजती हैं। कमल यानी पंकज। पंक यानी अकर्मण्यता से अछूते रह कर कर्म करना और उससे धन की प्राप्ति ही तो लक्ष्मी का संकेत है। लक्ष्मी कोई देवी नहीं हैं दर्शन के अनुसार। उनके एक हाथ में धान्य जो धन है और दूसरे हाथ से निकलती मुद्राएं। मुद्रा खुद धन का प्रतीक है और धान्य परलोक में नहीं इसी लोक में होता है। लक्ष्म इसी लोक की देवी हैं। जहां-जहां तम वहां-वहां उसे पराजित करने के लिये दीप है।  दीपोत्सव मनुष्य की कर्मशक्ति का गढ़ा तेजोमय प्रतीक है। छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया  है किसमस्त  प्रकृति सर्वोत्तम प्रकाश रूपा है। प्रकाश दीप्ति एक विशेष अनुभूति देती है हमारे भीतर। अर्जुन ने विराट रूप देखा। उसके मुख से निकला-दिव्य सूर्य सहस्त्रांणि। हजारों सूर्य की दीप्ति एक साथ। भारतीय अनुभूति का ‘विराट’ प्रकाशरूपा ही है। पूर्वजों ने प्रकाश अनुभूति को दिव्यता कहा। बगैर परिवर्तन के नई आभा नहीं रची जा सकती। यदि बड़े परिवर्तन न संभव हो सकें, तो छोटे-छोटे बदलाव सृजन की दीपावली ला सकते हैं। हमें यहाँ निस बदलाव का सही अर्थ समझना होगा. यहाँ आकर भाषा असमर्थ हो जाती है और हम अध्यात्म की और मुड़ते हैं.  भाषा वह बताने में असमर्थ है, जिसका वह दावा करती है. आज जो भाषा है या साहित्य है वह मूल अर्थों को स्थगित करता है प्राप्त नहीं करता.  अर्थों को प्राप्त करने की यह अभीप्सा ही अन्धकार से प्रकाश की और महाभिनिष्क्रमण है- “तमसोमाज्योतिर्गमयः .” जो प्रकाश वाले में जाकर सत्य को जान लेता है उसे मृत्यु का भय नहीं होता – “ म्रितोर्माअम्रित्गमय ”.  दीपावलीबिम्बों के रूप में अर्थों की तहों में जाने का प्रयत्न है। सत्य को जानने का प्रयास है – “असतोमासद्गमयः ”. दीपक  कर्मशक्ति का गढ़ा  प्रकाश मका बिम्ब  है.  प्रकाश यानी ज्ञान , प्रकाश यानी समृद्धि , प्रकाश यानी जीवन. हमारे मनीषियों ने कर्म साधना  के बल पर इस रात को  ‘‘दिव्य प्रकाश की शिखा’ बना दिया है. दीपावली परिवर्तन, सौंदर्य और ज्ञान का समन्वय एक साथ स्थापित करती है। दिया लघुता का भी प्रतिक है और इस दिन वह लघुता भी सम्मानित होती है. दिया संवेदना को संवाद  देता है और उसे सम्प्रेषण की स्थिति तक ले जाता है. उस सम्प्रेषण को जब हम समझेंगे तो हमें दिवाली का डिस्कोर्स समझ में आयेगा . दीवाली  हमें समझाती है कि तम से मानव के संघर्ष की जिजीविषा क्या है?

  

दीपावली : शुभम करोति कल्याणं

दीपावली : शुभम करोति कल्याणं

आज दीवाली  है. अंतरिक्ष में विद्युत् और गगन में सूर्य का प्रतीक और काल के संघर्ष  मंथन से उत्पन्न  ज्योति प्रकाश का आह्वान करती है. ऋग्वेद उसे इसीलिए चिर पुरोहित कहता है, “ अग्निमीले  पुरोहितः .” इसी ज्योति की आराधना में करोडो हाथ आज जुड़ गए हैं – शुभम करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा.”इस पर्व का व्यक्तिगत जीवन में भी काफी महत्व है. इस दिन हम दीप जलाकर अन्याय, असत्य और अंधेरे को दूर भगाने के साथ ही मन के मलिन पक्ष को भी स्वयं से दूर करते हैं. उजाला हमारे अंदर सत्य, न्याय और अच्छे गुणों का समावेश करता है. कहते हैं कि लंका पर विजय के बाद जब श्री राम अयोध्या लौटे तो पुर वासियों ने दीप प्रज्वलित कर हर्ष की अभिव्यक्ति की और उस दिन से उस विशेष को दिवाली मनाई जाने लगी. यहाँ एक बात स्पष्ट हो गयी कि अन्धकार को दूर करने के अलावा हर्ष की अभिव्यक्ति के लिए भी दीपक जलाना हमारी संस्कृति का अंश रहा है. यही नहीं दीप ज्योति हमारे भों  दीप ज्योति हमारे भावों द्योतक और अनागत का  संकेत भी है-

रुक्षेर्लक्ष्मी विनाश: स्यात श्वेतेरन्नक्ष्यो भवेत

अति रक्तेशु युद्धानि मृत्यु: कृष्ण शिखीशु च

हमारे पौराणिक ग्रंथों में कई स्थानों पर दीवाली के दर्शन की व्याख्या करते हुए कहा गया है – तमसो मा ज्योतिर्गमयः. यह अन्धकार से प्रकाश की ओर की यात्रा है , अज्ञानता से ज्ञान की उपलब्धि का द्योतक है और बुराई पर  अच्छाई  के विजय का प्रतीक है.  हम इतने खुश क्यों होते हैं? क्योकि मनुष्य का विकास गहन तामस में हुआ है. मनुष्य जब मां के गर्भ में होता है तो वहां  अंधकर होता है . हम अंधकार से उगते हैं, व्यक्त जगत में आते हैं. आंखों को प्रकाश देखने का अनुभव नहीं होता. तमस हमारी यथास्थिति है, और प्रकाश हमारी नियति. सो, ज्योतिर्मयता हमारी चिरन्तन प्यास है. उजाला सामूहिक रूप में प्रसारित हो तो जैसे फूल खिल जाते हैं, उसी तरह दीप की पंक्तियां, जिनमें दीप की निष्ठाएं हैं, दीपावली की आभा रच देती हैं. पंक्तिबद्ध होने में जो लय है, वही तो पृथ्वी की उजास है. एक-एक का लालित्य एवं समूह का लालित्य.समूह जब अनुशासन की ज्यामिति हो तो वह भीड़ नहीं होती. दीपावली समाज व व्यक्ति के जीवन के कुरूप पाठों को नया रूपांकन देती है. कृषि संस्कृति में पीड़ाओं व दु:खों के बावजूद उल्लास व उजास के इतने शेड हैं कि देखते ही बनते हैं.

परन्तु यहाँ एक तथ्य संभवतः गौण सा दिखता है. वह है प्रकाश में किसी भौतिक अस्तित्व की उपस्थिति से निर्मित उसकी छाया. छाया न प्रकाश है और ना उसकी गैरहाजिरी से उत्पन्न  अन्धकार ना अच्छाई का उल्लास है ना बुराई की निवीड़ता.राम के अयोध्या आगमन पर जब पुर नगर प्रकाश पुंज बन गया होगा और ऐसे में जब जब राम , लखन और वैदेही ने नगर में प्रवेश किया होगा तब भी भूमि पर उनकी छाया बनी होगी. उसपर यकीनन किसी ने ध्यान नहीं दिया होगा पर छाया तो होगी ही. चाहे कितना भी प्रकाश हो भौतिक अस्तित्व की उपस्थिति छाया का निर्माण करती ही है और छाया प्रकाश में भी अन्धकार मौजूद् है.यहां एक दर्शन है. अंधकार का कोई रूप  नहीं होता लेकिन छाया ऐसी नहीं है. छाया का अर्थ प्रकाश के मार्ग में कोई बाधा आ गयी है. उस बाधा की पृष्ठभूमि में प्रकाश उपस्थित रहता है. उसकी किरणें उस वस्तु को न भेद कर उसके इधर-उधर बिखर गयी हैं. इस छाया को पहचानना बहुत ही कठिन है, जब तक कि उस वस्तु को पहले न देखा हो. छाया मेंस्पष्टता नहीं होती है. यह प्रकाश के बीच ठोस अवरोध का प्रतिफल है. यही छाया दर्शन में ज्ञान की द्युति में ठोस अहंकार की उपस्थिति का अहसास है. यह छाया तभी दूर होई सकती है जब हम प्रकाश के वृत्त के मध्य खड़े हों , रेखागणित के 360 डिग्री के वाले के मध्य हों.यह केवल ज्ञान के प्रकाश से ही संभव है.  इसीलिए हमारे ऋषियों ने बड़े स्पष्ट शब्दों में प्रार्थना की- “ तमसो मा ज्योतिर्गमय: ” इन साधारण से लगने वाले शब्दों में अत्यंत गंभीर भाव छिपे है. इसमें भौतिक अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने की प्रार्थना तो है ही,साथ ही हमें अविद्यान्धकार से छुड़ाकर विद्यारूपी प्रकाश वृत्त  को प्राप्त कराने की भावना और प्रार्थना अंतर्निहित है. हमारे पूर्वज वैदिक ऋषियों ने सभी प्रकार की सामाजिक समस्याओं को तीन श्रेणियों में बांटा-ये है अज्ञान, अन्याय और अभाव. चाहे कोई भी देश हो, कैसा भी समाज हो, सब जगह ये समस्याएं रहेंगी ही. इन तीनों समस्याओं में भी अज्ञान की समस्या सबसे बड़ी है. यदि ये कहा जाए कि अन्य दोनों-अन्याय और अभाव की समस्याएं भी अज्ञान के कारण ही जन्म लेती है, तो अनुचित नहीं होगा.

छान्दोग्य उपनिषद् के ऋषि ने बताया है कि प्रकृति समस्त सर्वोत्तम प्रकाश रूपा है. जहां-जहां खिलता है प्रकृति का सर्वोत्तम, वहां वहां प्रकाश, हम धन्य हो जाते हैं. प्रकाश दीप्ति एक विशेष अनुभूति देती है हमारे भीतर. अर्जुन ने विराट रूप देखा. उसके मुख से निकला-दिव्य सूर्य सहस्त्रांणि. हजारों सूर्य की दीप्ति एक साथ. भारतीय अनुभूति का ‘विराट’ प्रकाशरूपा ही है. पूर्वजों ने प्रकाश अनुभूति को दिव्यता कहा. यही दिव्यता ही तो परिवर्तन है.  बगैर परिवर्तन के नई आभा नहीं रची जा सकती.

यदि बड़े परिवर्तन न संभव हो सकें,तो छोटे-छोटे बदलाव सृजन की दीपावली ला सकते हैं. राजनीति,इतिहास से परे ही अब नई दुनिया सृजित होगी. यहां 'राजनीति' का अर्थ सिर्फ राज पाने के लिए बनी नीति से है. जो सृजनधर्मी वृहत्तरता के सापेक्ष नीति होगी, वह समाज, राज व व्यक्ति सबसे सकारात्मक रूप से जुड़ी होगी. यहां 'इतिहास' का अर्थ अपने वर्चस्व को घटना-रूप देना है. राम का अयोध्या लौटना बुराई पर अच्छाई का वर्चास्व है पर अयोध्यावासियों का उसे प्रकाश रूप देना वर्चास्वा को घटना का स्वरुप देना है.  'लघु मानव'अपनी आत्मा में 'वृहत' होता है. उसे पता है कि नव-इतिहास के नाम पर चल रहा सांस्कृतिक भौतिकवाद,जाति, लिंग, वर्गवाद सबकुछ अब धूमिल पड़ने लगे हैं. दीपावली परिवर्तन, सौंदर्य, निजता, स्वायत्तता,ज्योति व लघु अंधकार का समन्वयन एक साथ स्थापित करती है. लघुता को सम्मान देती है यह. छोटा दीया आत्म का संपूर्ण विस्तार करता है. वह संवेदना, संवाद व संप्रेषण की स्थिति की ओर ले जाता है. हमें निचले दर्जे की राजनीतिक स्पर्द्धा,संवादहीनता व विद्वेष की भावनाओं से परे जाना है, तभी दीपावली का असली डिस्कोर्स समझ में आएगा.

Wednesday, October 18, 2017

सेना में असंतोष : खतरे की घंटी

सेना में असंतोष : खतरे की घंटी

जब मोदी सरकार आयी थी तो उनके  भक्त जनो ने जनभावनाओं को चिंतन और विवेचना से विमुख कर देश भक्ति के तिलिस्म में डालने के लिए सेना को हथियार बनाया था. सोशल मीडिया पर घायल सैनिकों की तस्वीर दिखा कर कहा जाता था कि “ जय हिन्द ” कहें. जब नोट बंदी हुई थी और लोग बैंकों के सामने कतार में खड़े होने पर रोष जाहिर करते थे तो कहा जाता था कि “ एक सैनिक आपके लिए सीमा पर खडा है और आप अपने लिए बैंको के सामने खड़े नहीं रह सकते.” लेकिन इन दिनों खबरें आ रहीं हैं कि उसी सेना में बेचैनी है, असंतोष है. इस असंतोष का सबसे बड़ा कारण है कि सिविल सर्विसेज के अफसरों के समतुल्य में उनके भी पद और आर्थिक सुविधायें. खैर यह अभी अफसर ग्रेड तक ही सिमित है और सेना की प्रभावशीलता पर इसका प्रभाव होता नहीं दिख रहा है. इसके अलावा एक और मामला है कि सेना में ख़ास कर अफसर स्तर पर भर्ती, पोस्टिंग, प्रोमोशन इत्यादि  में जड़ता. यह मामला अदालत में भी है. हालांकि यह सेना के अंदरूनी प्रबंधन का मसला है लेकिन जब मामला कोर्ट में है और इससे सेना का आत्मबल प्रभावित हो रहा है तब उस जनता को इस के प्रति जागरूक होने का अधिकार है जिसकी भावनाओं का सेना के नाम पर दोहन किया जाता था. गत 12 अक्तूबर 2017 को प्रेस सूचना कार्यालय की एक विज्ञप्ति के मुताबिक़ यह मसला आर्मी कमांडर्स कान्फ़ेरेन्स में उठाया गया है. दर असल मामला यह कि सेना में कर्नल के ऊपर प्रोमोशन का बड़ा चक्कर है. एक अफसर को ऊपर जाने के लिए बहुत जूझना होता है. हर रैंक के लिए नियत रिक्तियां होती हैं और उसके लिए तरह तरह के अनुभवों की ज़रुरत होती है. यही नहीं नियुक्तियां कई हिस्सों में बनती होती हैं. ऐसे में कई बार होता है कि एक साथ बहाल हुआ एक ही तरह का अनुभव प्राप्त अफसर प्रोन्नति पा लेता है और दूसरा टापता रह जाता है. दूसरी बात है कि हर बैच के अफसरों के प्रोमोशन का तयशुदा अनुपात होता है और रिक्तियां भी उसी अनुपात में होती हैं पर इसमी एक मुश्किल है कि इस कार्य में मेजर के रैंक तक तो सब कुछ ठीक चलता है उसके बाद प्रोमोशन में कम्बैट डिविजन या हमलावर प्रभाग  को ज्यादा तरजीह दी जाती है. यह भी ठीक चल रहा था पर 1999 में कारगिल युद्ध के बाद नियम बना कि कम्बैट में अपेक्षकृत नौजवान अफसर रखे जायेंगे. बस यहीं से असंतोष आरम्भ हो गया. क्योंकि इससे बीच की समानता ख़त्म होने लगी. एक ही बीच एक ही योग्यता का एक अफसर कहीं मेजर है तो दूसरा  कहीं कर्नल हो गया. अब इसका नतीजा यह हो गया कि सेना में विगत 25 सालों से अफसरों का अभाव है. एल ओ सी पर थल सेना के कम से कम 21 अफसरों की नियुक्ति होनी चाहिए लेकिन वहाँ 13 -14 लोगों से काम चलाया जता है. ये अफसर भी दूसरे दूसरे प्रभागों से लाये जाते हैं , यहाँ तक कि अकादमी में जिनके कोर्स पूरे नहीं हुए है उन्हें भी तैनात कर दिया जाता है. सभी अफसरों के लिए 5 से 10 साल के सेवा के बीच 30 महीने राष्ट्रीय  राइफल्स और असम राइफल्स में गुजारना होता है ताकि उन्हें आतंक्ज्वाद के मुकाबले का अनुभव हो सके. इसके बाद उन्हें इन्फैंट्री भेजे जाने का सबसे ज्यादा जोखिम हो जाता है. भारतीय सेना अनेकता में एकता का प्रतीक है लेकिन इसके अफसरों में असंतोष बढ़ता जा रहा है. इस असंतोष जन्य कुंठा के कारन सैनिकों में ख़ुदकुशी की प्रवृति बढ़ रही है. 2015 में थल सेना के 69, नौ सेना के 13 और वाऊ सेना के 11 जवानों ने आत्महत्या की. 2012 में यह संख्या और ज्यादा थी. इसका कारण भारती और प्रोमोशन में असमानता मना जा रहा है. सैनिक नाइंसाफी, समाज , सरकार और नौकरशाही की ओर से अनदेखी के कारण निराशा और अवसाद से भरते जा रहे हैं.  यहाँ सवाल है कि हालत इतने  बिगड़ने क्यों दिए गए. सेना केवल हथियारों की गुणवत्ता पर ही नहीं चलती , हथियारों के पीछे जो लोग हैं वे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. अब ऐसे लोगों  का आत्मबल यदि कम हो जाए , मोटिवेशन घट जाए तो क्या होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. सेना को आपसी परामर्श के आधार पर इस मामले को सुलझा लेना चाहिए अदालत की शरण में नहीं जाना चाहिए. 

Monday, October 16, 2017

अब ज्ञान पुरानी बात हो गयी

अब ज्ञान पुरानी बात हो गयी 

पुराने जमाने में कहा जाता था कि “ स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान: सर्वत्र पूज्यते. ” यह सुभाषित शिक्षकगण छात्रों को सुना कर उन्हें ज्ञान अर्जित करने के लिए प्रेरित करते थे. पार आज के  जमाने ज्ञान पुरानी बात हो गयी और दुनिया यह मानती है कि सूचना सबसे प्रबल है  और ज्ञान दोयम दर्जे की बात है और भाषा कामकाजी यंत्र है , एक डिवाइस है. इतिहास की उम्र फकत 10 साल होती है. ग्यानी लोगों को लोग अब बेवकूफ समझने लगे हैं और वे अनुपयोगी हो गए हैं. दुनिया यह जानती है कि नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप राजनीति के नाम पर लंतरानियाँ हांकते हैं. छात्रों को यह बताया जाता है कि इतिहास केवल 10 साल पहले से शुरू होता है. अब बात है कि क्या यह ज्ञान का समाज (नालेज सोसाइटी ) है. जहां तक सूचना का प्रश्न है यह सुनाने वालों और उसे संप्रेषित करने वालों के ज्ञान और प्रतिबद्धताओं पर निर्भर करता है. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हेनरिक गोयबल्स ने मिथ्या सूचनाओं को सही साबित करने का नुस्खा बताया था और इन दिनों सोशल मीडिया में पोस्ट ट्रुथ या आवांतर सत्य से परिपोषित सूचनाओं की जंग चल रही है. मनोशास्त्री विक्टर फ्रान्कल के अनुसार “ हमारी आज़ादी उकसावे और उसके बीच में कायम दूरी पर निर्भर है.” मनुष्य का जीवन संकुचित होता जा रहा है और हमारा मन सस्ती उत्तेजनाओं की चाह और खतरे के पूर्वगृह से आक्रान्त है. विश्वास का विनाश हो रहा है. बहुत कम लोग हैं जो एक दूसरे पर भरोसा करते हैं. ऐसा महसूस हो रहा है कि हम किसी विषयासक्त युग में जी रहे हैं जहां विचार का कोई महत्त्व नहीं है , बहस के लिए कोई जगह नहीं है. यह सोचना कि विचार एक समुदाय को जन्म देता है और विवेचनात्मक ज्ञान जीवन को सुखी बनाता है. आज के किसी नौजवान छात्र से हन्ना अरेंट के राजनितिक दर्शन की बात करें या फासीवाद की चर्चा करी या स्टालिनवाद की विवेचना करें तो वह आप पर हंसेगा. आज का नौजवान समाज केवल सूचना पर निर्भर है. कांट  के सिद्धांत से ज्यादा प्यारा उसके लिए मोबाइल फोन है. यही कारण कि गांधी के हत्यारे के दस्तावेज दुबारा खोले जा रहे हैं. उनसे भारत विभाजन की बात करें तो वे बातें नहीं करेंगे. ऐसा नहीं कि वे पुरानी बातों को कुरेदना नहीं चाहते बल्कि दुखद तो यह है कि उन्हें इसकी मालूमात नहीं है. भाषा                                       संकुचित होती जा रही है. अच्छे पढ़े लिखे लोग किसी भी भाषा में 10 लाइन शुद्ध नहीं लिख पाते. बच्चे उपन्यास नहीं पढ़ते क्योंकि वे एंट्रेस की परीक्षा की तैयारी में लगे रहते हैं. ऐसे ही लोगों के बीच मोदी जी की इज्ज़त है क्योंकि वे ज्ञान को तरजीह नहीं देते. उनके लिए और उनके जैसे कई अन्य लोगों के लिए विश्वविद्यालय सर्टिफिकेट जारी करने का केंद्र है. आज तक किसी भी सरकार ने विश्वविद्यालयों की इतनी अवमानना नहीं की जितनी वर्तमान  भा ज पा सरकार कर रही है. वर्तमान सरकार या इस काल में विशेषज्ञ वहीँ तक महत्वपूर्ण हैं जहां तक नीतियों का प्रश्न है.  आज विज्ञान और मानविकी पर लोग हँसते हैं और सवाल पूछना फैशन से बाहर हो गया है तथा विवेचनात्मक प्रश्न तो राष्ट्र विरोधी हो गए  हैं. अगर यह कहा जाय कि ज्ञान के संह में यह युग दोयम दर्जे का है तो गलत नहीं होगा. इसका कारन है कि मोदी औत्रंप जैसे लोग विचारों पर बंदिश  लगना चाहते हैं. मिया चाट हो रही है, अखबार ख़त्म हो रहे हैं , इसलिए नहीं कि तकनिकी तौर पर पिछड़ रहे हैं बल्कि इसलिए कि समाचार  के रूप में उनमें विचारों का अभाव होता जा रहा है.विचार समाप्त हो रहे हैं. समाज में सुरक्षा, विकास , देशभक्ति, कालाधन  जैसे चंद सरकारी शब्दों का ही बोलबाला है . मोदी जी विदेशों में जाकर बड़ी - बड़ी बातें करते हैं और बेचैन रहते हैं बात में असर के लिए , चाहते हैं कि कोई उन्ह उर उनके देश को गंभीरता से ले पर देश में विचारशून्यता को बढ़ावा देते हैं. हमारिन दिनों सी ट्रेजेडी है कि हम अज्ञानता के उपभोक्ता हो गए हैं विचारों के रचयिता नहीं. वाम पंथ और दक्षिणपंथ की बौद्धिक बहस ख़त्म होती जा रही है यह बड़ी बात नहीं है दुखद तो यह है कि बौधिक बहसों की ज़मीन पर विचारशून्यता का कब्जा होता जा रहा है.  

Sunday, October 15, 2017

पटाखे छोड़ने का प्रदूषण से कोई लेना देना नहीं

पटाखे छोड़ने का प्रदूषण से कोई लेना देना नहीं

आतिशबाजी का उपयोग धर्म से नहीं  रिवाज़ जुडा है

हरिराम पाण्डेय

कोलकता :  सुप्रीम कोर्ट ने  दिल्ली में दिवाली के दौरान पटाखों पर रोक लगा दी है. जबसे अदालत का यह आदेश आया है तबसे देश की जनता दो हिस्सों में बाँट गयी है. एक हिस्सा कोर्ट के आदेश के पक्ष में है और दूसरा इसके खिलाफ. जो आदेश के खिलाफ हैं उनका मानना है कि यह हिन्दू धर्म के उत्सवों में स्पष्ट दखलंदाजी है.जो लोग उसके पक्ष में हैं वे यह कह कर समर्थन कर रहे हैं कि इससे वायु में प्रदूषण बढ़ता है. देश की जनता की तरह अदालत भी इसमें एकमत नहीं है. अदालत में गत 12 सितम्बर को दिए गए एक आदेश में साफ़ कहा गया है कि “ उसके पास इस बात कोई साक्ष्य नहीं है कि पटाखों के इस्तेमाल से कितना प्रदूषण होता है.अतएव इसपर पाबंदी एक चरम उपाय है.अदालत ने आगे कहा है कि समाज में इसपर पाबन्दी की परोक्ष सहमति है  ” हालांकि  जज साहब को इस सहमती का अंदाजा कैसे लगा इस बात का कोई ज़िक्र नहीं है. मान भी लेते हैं कि       दिवाली       के    दो    दिनों में     पटाखों       के  प्रयोग से इतना प्रदूषण बढ़ जाता है कि उसपर रोक लगाना ज़रूरी है. लेकिन साल के बाकी 363 दिनों का क्या है इसपर आदरणीय अदालत प्रकाश तो डाले. वैज्ञानिक आंकड़ों से भी पता चलता है कि पटाखों के इस्तेमाल से प्रदूषण पर कोई असर पड़ता है या इतना असर पड़ता है कि इससे भारी हानि हो. प्रदूषण फैलाने वाले कार्यों के बारे में आई आई टी कानपुर द्वारा तैयार किये गए आंकड़ों में कहीं भी पटाखों का ज़िक्र नहीं है और ना ही प्रदूषण कम करने के उपायों में भी कही पटाखों पर रोक का उल्लेख नहीं है. इससे जाहिर होता है कि पटाखों के उपयोग का प्रदूषण से कोई लेना देना नहीं है.

यहाँ एक सवाल है कि क्या इस तरह का महत्वपूर्ण फैसला इतनी जल्दीबाजी  में लिया जाना चाहिए?इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला गलत समय में आया है क्योंकि उसमें यह नहीं बताया गया है कि उसे कैसे लागू किया जाएगा और इसका समाज पर  क्या प्रभाव पडेगा? इस उद्योग से जुड़े हज़ारों लोगों का क्या होगा? यह फैसला पहले लिया जाना चाहिए था और इसे लागू  करने के तरीकों और उसके प्रभाव पर विचार कर लेने चाहिए खास कर इससे जुड़े श्रमिकों और उस उद्योग के निवेशकों के भविष्य तथा इसका एक इलाके की अर्थव्यवस्था पर होने वाले प्रभावों का आकलन कर लेना चाहिए. अदालत ने जनता, कार्यपालिका और विधायिका पर होने वाले प्रभाओं पर विचा किये बगैर एक लोकप्रिय उत्सव की राह में रोड़े बिछा दिए.

यही नहीं अदालत ने रस्म- रिवाज पर ध्यान ही नहीं दिया. दिवाली में पटाखे  बेशक हिन्दू धर्म  से नहीं जुड़े  है और ना उसका अंग हैं पर सैकड़ों वर्षों से यह हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है और धार्मिक रिवाजो से जुड़ गया है.विख्यात जर्मन भारतविद डा. गुस्ताव ओपर्ट ने लिखा है कि प्राचीन भारतमें बारूद का उपयोग हुआ करता था.“ गन पावडर , एक्सप्लोसिव एंड द स्टेट : द टेक्नोलोजिकल हिस्ट्री “ में बी जे बुकानन ने वैश्यम्पायन की नितिप्रकशिका को उधृत करते हुए “अग्नि चूर्णं” का उल्लेख किया है,जिसे बारूद बताया है. लेकिन नाओपर्ट  और ना बुकानन ने उस काल खंड का उल्लेख किया है जिसमें बारूद का उपयोग होता था. जबकि दोनों उत्तर 19वीं शताब्दी के लोग थे.कौटिल्य के अर्थशास्त्रम ( लगभग300 वर्ष ईसा पूर्व ) में भी अग्नि चूर्ण का उल्लेख है. लेकिन कहीं भी दिवाली या किसी भी सनातनधर्मी पर्व में इसके उपयोग का उल्लेख नहीं है. बारूद के उपयोग का सबसे पहला उल्लेख  चीन में 7 वीं सदी में पाया जाता है. इसके बाद वह मुस्लिम हमलावरों द्वारा भारत में लाया गया.ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार आदिल शाह ने अपनी शादी में आतिशबाजियों पर 80हज़ार रूपए खर्च किये थे. उसके बाद किसी भी  उत्सव में रजवाड़ों के लिए यह फैशन बन गया. लेकिन दिवाली में दीपक के अलावा आतिशबाजियों  का उपयोग कबसे शुरू हुआ इसका कहीऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है. 22नवम्बर 1665 को औरंगजेब ने गुजरात के सूबेदार को आदेश दिया कि शहर में दिवाली को दिए ना जलाये जाएँ. उसने भी अपने हुक्म में आतिशबाजिओं का जिक्र नहीं किया, जबकि 9 अप्रैल 1667 को उसने किसी मुस्लिम त्यौहार ( शायद शब -ए – बरात) पर आतिशबाजियों पर रोक लगाने के लिए मुनादी   करने   का हुक्म दिया था. यानी उत्तर 17 वीं  शताब्दी के बाद से रजवाड़ों की देखादेखी उत्सव में इसका उपयोग शुरू हुआ होगा पर लगभग  400 साल से यह हमारे दिवाली के उत्सव का अंग बन गया है. इसकी मौजूदगी रिवाज़ के रूप में स्थापित हो गयी . 
  अदालत ने आदेश दे दिया पर यह नहीं बताया कि आखिर उसे यह कैसे पता चला कि पटाखों से प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है. पिछले साल जब यह मसला कोर्ट के सामने आया था तो उसने केन्द्रीय पर्यावरण बोर्ड से तीन महीने के भीतर रिपोर्ट दी को कहा था  पर  उसने कुछ नहीं किया इस साल जब मामला सामने आया तो उसने यह कहते हुए पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव अर्गानाइजशन के मत्थे मढ दिया कि इस तरह की जांच उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है. यह कर्त्तत्त्त्व पालन करने में कोताही का स्पष्ट मामला है. लेकिन उनपर कोई कार्रवाई नहीं की गयी. सरकारी अफसर जब यह समझने लगते हैं कि देश की सर्वोच्च अदालत की भी वे हुक्मउदूली कर सकते हैं तो जनता का क्या होगा यह भगवान् ही बता सकता है.इन सारी बातों को ध्यान में रख कर यह कहा जा सकता है की यह अदालती तदर्थ वाद है. इस पूरे आदेश में एक अजीब बात आर दिखती है कि पटाखों की बिक्री पर रोक है पर उपयोग पर नहीं. शायद अदालत ने यह  होगा कि जब पटाखे बिकेंगे ही नहीं तो छोड़े कैसे जायेंगे! अदालत के इस आदेश से भ्रष्टाचार का एक नया रास्ता खोल दिया इसक नाजायज़ उत्पादन और बिक्री का.  अदालत की फैसला लेने की तदर्थता और इसकी वैज्ञानिक नाजानकारी का यह भी सबूत है कि कोलकता सहित देश के कई शहर उतने ही प्रदूषित हैं जितनी दिल्ली है. फिर दिल्ली के लिए ही यह क्यों हुआ? शायद जज साहेबान भूल गए होंगे कि वे देश की सबसे बड़ी अदालत  के जज हैं.  अगर इस आदेश की अपराधशास्त्रीय व्याख्या करें तो इसकी अवमानना की भरपूर आशंका है. वेस्टर्न क्रिमिनोलोजिकल रिव्यू के अनुसार “ त्योहारों से जुडी मौज मस्ती में क़ानून की अवमानना होने को रोका  नहीं जा सकता है. विख्यात अपराध शस्त्री स्कॉट के मुताबिक़ उत्सव मनोवैज्ञानिक तौर पर क़ानून तोड़ने के लिए उकसाते हैं.”