CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Sunday, February 18, 2018

कांग्रेस को मिला झुनझुना

कांग्रेस को मिला झुनझुना

मुंबई की पंजाब नेशनल बैंक की एक शाखा से 11,308  करोड़ रुपयों की धोखाधड़ी ने देश को सकते में डाल दिया है। यह देश की अब तक की सबसे बड़ी बैंक धोखाधड़ी है । साथ ही  यह बताती है कि हीरा उद्योग में कितनी बड़ी गड़बड़ी चल रही है। जबकि, भारत विश्व हीरा उद्योग का एक छोटा सा हिस्सा है । यह बड़ा अजीब लगता है कि भारत में हीरे पर जो टैक्स लगाया जाता है वह पॉलिश किए हुए हीरे पर होता है और कारोबार पर होता है न कि मुनाफे पर । अब ये शातिर व्यापारी   निर्यात को बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं  और इससे जो लाभ होता है वह दूसरे उद्योगों या कारोबार   में डाल देते हैं ।  खासकर रियल स्टेट में यह रुपया चला जाता है, हीरा व्यापार में रहता नहीं है कि कारोबार में दिखे। 

  यू पी ए -2 सरकार ने 2011 में इस पर नकेल कसने की कोशिश की थी।  शातिर भारतीय हीरा व्यापारियों ने उस वर्ष   28. 22 अरब डॉलर का दिखाया था जबकि दुनिया भर में 2010 में हीरो का कारोबार 18.2 अरब डॉलर था । सरकार ने 2011 में इस पर 2% छूट की योजना लागू कर दी । नतीजा हुआ इससे ड्यूटी प्रभावित हुई और हीरा का कारोबार खासकर के निर्यात कारोबार गिरने लगा। यह 20 अरब डालर से घटकर 5.8 अरब डॉलर हो गया।    

  इस तरह के कारोबार  में निर्यात के नाम पर लाभ की राउंड ट्रिपिंग होती है। यहां राउंड ट्रिपिंग को समझना थोड़ा जरूरी है । यह विदेशों में कमाया धन होता है और भारतीय कंपनियों में और भारतीय कारोबार में लगाए जाने के नाम पर विदेश से आता है । पंजाब नेशनल बैंक  वाले मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा। अभी यह तो जांच का विषय है । यह मसला पिछले 5 वर्षों से चल रहा था और अब जाकर फूटा है । इस घोटाले को देख कर लगता है भारतीय बैंकिंग प्रणाली में जो सड़न  वर्षो से कायम थी वह अभी भी कायम है और बड़े लोग इसका लाभ उठा रहे हैं। विजय माल्या का मामला अभी लोगों के मन में ताजा ही था  कि पंजाब नेशनल बैंक  का यह भांडा फूट गया। यह सोचने वाली बात है कि देश में होने वाले जितने भी बैंक घोटाले हैं उनका 83 प्रतिशत सरकारी बैंकों में है होता है।  सरकार इस पर नकेल कसने के लिए कुछ नहीं कर पाती है । गरीब करदाताओं का पैसा इसी तरह लुटता रहता है। जब बैंक घाटे में आते हैं तुम के लिए अलग से कोष  बनाए जाते हैं । आज के  इन बैंक घोटालेबाजों ने हर्षद मेहता से सबक सीखी है। लगभग 20 वर्ष पहले हर्षद मेहता ने  इसी तरह का घोटाला किया था लेकिन पकड़ा गया क्योंकि वह देश में ही था, जबकि विजय माल्या जैसे घोटालेबाज हाल के पंजाब नेशनल बैंक मामले का हीरो नीरव मोदी विदेश में आराम कर रहे हैं और सरकार की पकड़ से बाहर है।     

     यह जो घोटाला हुआ है उसे देखकर यह प्रबल संभावना है कि  पंजाब नेशनल बैंक  की अन्य शाखाओं में  भी कुछ हुआ होगा जिसकी अभी खबर आनी बाकी है सरकार ने सभी बैंकों से कहा है इस मामले से संबंधित रिपोर्ट इस हफ्ते के अंत तक भेजें। इसका मतलब है कि कहीं ना कहीं सड़ांध की दुर्गंध आ रही है। बैंक अधिकारियों  की मिलीभगत से कारोबारी इस तरह के घोटाले बड़े आराम से कर सकते हैं। यह लघु अवधि के क्रेडिट के नाम पर पहला कदम आगे बढ़ाते हैं जैसे  नीरव मोदी ने शुरू किया। मोदी ने  लेटर ऑफ अंडरटेकिंग के आधार पर यह शुरू किया। लेटर ऑफ अंडरटेकिंग किसी भी अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय बैंक द्वारा जारी किया जा सकता है। इस लेटर के आधार पर बैंक 90 से 120 दिन के लिए कंपनियों को कर्ज देता है और यह रुपया कंपनियां दुनिया के किसी भाग से निकाल सकती हैं। इस तरह के धंधे आमतौर पर निर्यात  आधारित कंपनियां करती हैं। लेटर ऑफ अंडरटेकिंग स्थानीय बैंक द्वारा लेटर ऑफ कंफर्ट के आधार पर जारी होता है। यह लेटर ऑफ कंफर्ट स्थानीय बैंक देते हैं। 2001 में केतन पारेख ने माधवपुरा मर्केंटाइल को ऑपरेटिव  बैंक से इंटर बैंक क्रेडिट ऑर्डर लिया था और इसे मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के बैंक ऑफ इंडिया शाखा भुना लिया था। सीबीआई की एफ आई आर के अनुसार नीरव मोदी के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। क्योंकि, मोदी को जिन कंपनियों को लेटर ऑफ अंडरटेकिंग दिया गया था उन कंपनियों के खाते खाली हैं। इस मामले में जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य दिखाई पड़ रहा है वह है समय का।  लेटर ऑफ अंडरटेकिंग के जरिए जारी कर्ज  लघु अवधि के लिए होता है लेकिन पंजाब नेशनल बैंक के अधिकारी नहीं बता पा रहे हैं या फिर उन्होंने एक अज्ञात अवधि तक इस मामले को क्यों लटका कर रखा था। यही नहीं   नीरव मोदी ने लघु अवधि के इंटरबैंक इतने चैनल्स कैसे खोले हैं। 

 दरअसल आम आदमी इस तरह के घोटालों ताने बाने को समझता नहीं है। केवल सुनी सुनाई बात पर निर्णय करता है और उसी पर कहानी आगे बढ़ती है । अब यह मसला मोदी सरकार के लिए भी वैसा ही हो सकता है। चुनाव सिर पर हैं और नीरव मोदी के इस मामले को कांग्रेस बखूबी भुना सकती है। इस घोटाले का राजनीतिक प्रभाव पता नहीं क्या होगा। लेकिन भारत जैसे देश में जहां सुनी सुनाई बातों पर 2जी घोटाले में अदालतें फैसले दे सकती हैं और लोगों को जेल भेजा जा सकता है वहां इतना बड़ा घोटाला क्या राजनीतिक रंग लाएगा यह तो आने वाला समय बताएगा।

Friday, February 16, 2018

नोटबंदी के बाद अब वोटबंदी की तैयारी

नोटबंदी के बाद अब वोटबंदी की तैयारी
अब से 68 साल पहले 26 जनवरी 1950 को बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था कि "हम अब आज से एक व्यक्ति एक वोट और एक वोट की एक कीमत के नए अध्याय में प्रवेश कर रहे हैं । " इस वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हमारे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा "हमारा गणतंत्र अपने लोगों से बना है। नागरिक सिर्फ एक गणराज्य को ही नहीं बनाते बल्कि उसके अंतिम हितधारक और खंभे हैं। " लेकिन, इसके विपरीत प्रधानमंत्री जी ने लोक सभा और विधानसभा चुनाव एक साथ  कराने को लेकर एक राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।  एक साथ चुनाव का मतलब लोगों को मताधिकार से वंचित रखना। मताधिकार लोकतंत्र का सबसे बड़ा मूल्य है । आखिर क्या कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ करा कर लोगों को अलग अलग समय पर होने वाले चुनाव से वंचित करना चाहते हैं ? 
आप भारत देश के निवासी हैं । आपने कई चुनाव देखे होंगे। चुनाव खुद में एक बेहद सशक्त  अनुभव है। लोग मतदान प्रक्रिया में भाग लेते हैं और जहां तक मालूम है भाग लेने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती । इसके बाद उनके अंदर एक एहसास पैदा होता  है कि वह 1 वोट से सरकार बना देते हैं या गिरा देते हैं। रोमन ऐतिहासिक कथाओं की तरह एक मामूली डेविड ताकतवर गोलीयथ को पराजित कर देता है । शायद यही कारण है कि मतदान के आसपास सबसे गरीब आदमी सबसे ज्यादा खुश दिखता है और सरकार को एक तरह से चेतावनी देता रहता है । यहां उन लोगों की बात नहीं की जा रही है जो मतदान प्रक्रिया में शामिल ही नहीं होते। कभी मतदान के बाद उंगली पर लगी स्याही के निशान दिखाते हुए लोगों के चेहरे देखने का मौका मिला होगा। उन्हें महसूस होता होगा कि जैसे लोग एक युद्ध जीत गए । इतनी खुशी जाहिर करते हैं लोग।
  अब हमारे प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि बार-बार मतदान कराने से सरकारी खजाने का नुकसान होता है और सक्षम अधिकारियों का दुरुपयोग होता है तथा शिक्षक इत्यादि जो इसमें नियुक्त किए जाते हैं उनका समय बर्बाद होता है। सही नहीं है। मौलिक अधिकारों के पालन- संरक्षण के लिए सार्वजनिक खर्च कोई दलील नहीं है। जिन्होंने राजनीतिक इतिहास पढ़ा होगा वे जानते होंगे इंदिरा गांधी को अपनी मनमानी का परिणाम केंद्र में ही नहीं राज्यों में भी भुगतना पड़ा था। 1970 में कांग्रेस की सरकार उत्तर प्रदेश और बिहार में बुरी तरह पराजित हो गई थी। इसका मतलब यह है इमरजेंसी के विपरीत लोगों ने इंदिरा जी को राज्यों में भी पराजित  करने के लिए लंबा इंतजार नहीं किया। मौजूदा समय में गुजरात , दिल्ली और बिहार विधानसभा के चुनाव इसके उदाहरण हैं। 2014 के चुनाव में भाजपा ने इन राज्यों में भारी विजय हासिल की थी। लेकिन दो ही वर्ष में इसी जनता ने इन राज्यों में उन्हें सबक सिखा दिया। गुजरात में बीजेपी हारते- हारते बची ।गुजरात में जहां 2014 में भाजपा ने सारी 26 सीटें जीती थी उसी राज्य में  3 वर्षों में उसके कई कट्टर समर्थक  खिलाफ हो गये। राज्यसभा में अभी भी भाजपा का बहुमत नहीं है। लोकसभा  चुनाव और विधानसभा चुनाव का अलग-अलग समय पर होना राज्यसभा को एक पृथक पहचान देता है । जो लोकसभा से अलग भी हो सकता है। दोनों सदनों में एक ही पार्टी का अंकुश रखना लोकतंत्र के लिए हानिकारक होता है । केंद्र और राज्यों में एक साथ मतदान कराने से दोनों जगह एक ही पार्टी की सरकार बनने की प्रबल संभावना रहती है। खासकर 2014 जैसे लहर में। अगर लोकसभा और राज्यसभा एक ही पक्ष  वर्चस्व में आता है तो मनमानी तरीके से कानून को बदला जा सकता है। संविधान के बुनियादी ढांचे में बदलाव जैसे खतरनाक कदम भी उठाए जा सकते हैं। खासकर ऐसे मौके पर जब भाजपा के सांसद ताल ठोक कर कहते हैं कि संविधान बदलने के लिए ही पार्टी सत्ता में आई है। ऐसे में मतदाताओं को बार-बार अवसर नहीं मिलते तो उनके मौलिक मतदान अधिकार का हनन होता है।  अलग-अलग चुनाव के मामले में  हर चुनाव के साथ लोकतंत्र मजबूत और मतदाता ज्यादा समझदार खुद होता जाता है। उसे किसी नेता को उसकी गलती सजा देने के लिए 5 साल तक इंतजार करने की जरूरत नहीं रहती। जनता अपने मताधिकार का राज्य चुनाव में प्रयोग कर केंद्र के प्रति गुस्से का इजहार कर सकती है। मोदी जी ने गत वर्ष नोटबंदी कर दिया था। अब "एक देश एक बार मतदान " की व्यवस्था कर जनता के हक को 5 साल तक छीन लेने की साजिश की जा रही है। धन और समय की बचत के आड़ में इसे पेश करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लागू होने से लाखों-करोड़ों लोगों की हक प्रभावित होगा और यह एक तरह से लोकतंत्र पर आघात होगा। लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाले लोग इसके बारे में ठीक से सोचें।

Thursday, February 15, 2018

पाकिस्तान की जमकर ठुकाई की जरूरत

पाकिस्तान की जमकर ठुकाई की जरूरत

जम्मू के शुंजवान में पाकिस्तान के जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने सोमवार को भारतीय सेना के एक केंद्र और उनके पारिवारिक आवासों पर हमला कर 5 सैनिकों को मौत के घाट के उतार दिया और एक असैनिक को भी मार डाला। इस हमले पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि" इसका मुंहतोड़ उत्तर दिया जाएगा।" लेकिन क्या ऐसा होगा?
    नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जवाबी फायरिंग के बावजूद पाकिस्तान की गोलीबारी और मोर्टार  से गोले दागना यहां तक कि एंटी टैंक मिसाइल से फायर करने की कार्रवाई नहीं बंद हुई है। वह लगातार भारतीय सेना के शिविरों पर तथा उनके  आवासों पर गोलीबारी करने में  लगा  है साथ ही  जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों को भारत में घुसाने की कार्रवाई भी धीमी नहीं की है। पहले तो यह सब घाटी में हुआ करता था अब जम्मू में भी हो रहा है। अब जम्मू में भी भारतीय फौजी शिविर और उनके परिजन सुरक्षित नहीं हैं। भारत ने 29 सितंबर 2016 को पाकिस्तानी आतंकी शिविरों पर सर्जिकल स्ट्राइक किया था। लेकिन उसके बाद से ही पाकिस्तानी सेना ने  युद्ध विराम का लगातार उल्लंघन करना शुरू कर दिया। भारतीय स्पेशल फोर्स द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक किए जाने पर पाकिस्तान की दुनिया भर में जो किरकिरी हुई उसको उसे देखते हुए पाकिस्तानी जनरलों ने दोहरी रणनीति अपनानी शुरू कर दी है। पाकिस्तानी सेना और रेजंर्स ने नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी बढ़ा दी है। साथ ही उसने लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों को कश्मीर घाटी में घुसाने की प्रक्रिया भी तेज कर दी है। भारतीय सेना, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और जम्मू -कश्मीर पुलिस लगातार आतंकियों को मार रही है। पाकिस्तान के लिए ये मरे हुए आतंकी सस्ते माल हैं। आतंकियों के परिजनों को थोड़ा सा मुआवजा दे दिया जाता है और जमीन दे दी जाती है बस वे खुश हो जाते हैं। साथ में इस की देखादेखी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में नए लड़के भी मिल जाते हैं। उन्हें थोड़ी बहुत ट्रेनिंग देकर भारत में भेज दिया जाता है, तयशुदा टार्गेटस पर हमला करने के लिए। पाकिस्तान का आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्र दुनिया में सबसे बड़ा है और बड़े आराम से काम करता है। आतंकियों को मारे जाने से पाकिस्तान को कोई फर्क नहीं पड़ता बशर्ते पाकिस्तानी सेना ,रेंजर्स और बॉर्डर एक्शन टीम के लोग नहीं मारे जाते हैं। ये काफी बर्बर हैं।  ये भारतीय फौजियों को मारते हैं तो उनके सिर काट लेते हैं ,उनके शव को तहस नहस कर देते हैं । यही कारण है सर्जिकल स्ट्राइक से पाकिस्तान को बहुत आघात लगा। क्योंकि जिस शिविर पर हमला किया गया उसमे पाकिस्तानी सेना के जवान बड़े मजे में सो रहे थे। उस समय कुछ लोगों ने कहा था कि सर्जिकल स्ट्राइक गलत हुआ है ?  लेकिन वह बिल्कुल सही हुआ था। इसके अलावा भी कुछ होना चाहिये था जो नहीं हुआ। होना चाहिए था कि ठीक  इस हमले के बाद  कायम अस्थायी शांति  का लाभ उठाते हुये भारत को वार्ता शुरू कर दी जानी चाहिए थी। यहां यह बता देना जरूरी है कि पठानकोट हमले के बाद यानी 2 जनवरी 2016 के बाद से दोनों देशों के बीच वार्ता का क्रम बंद हो गया था। उस समय वार्ता की शुरुआत होती तो दोनों देशों के शांतिप्रिय लोग इसका स्वागत करते। पाकिस्तान की सरकार भी इसमें शामिल होती है क्योंकि वह तो चाहती है कि बातचीत भी चलती रहे और आतंकवाद चलता भी चलता रहे।  भारत से बातचीत को पाकिस्तान सम्मान का मुलम्मा लगा देता और पाकिस्तान की सियासत तथा समाज पर  सेना का वर्चस्व कायम रहता दूसरी तरफ वह आतंकवाद के लिए बढ़ावा देती रहती।  रावलपिंडी में बैठे जनरल चाहते हैं कि भारत से बातचीत चलती रहे और अगर वार्ता भंग होती है तो आतंकवाद चलता रहेगा।  रुक रुक कर चलती हुई बातचीत पाकिस्तान को माफिक आती है। भारत के पास एक और  विकल्प था कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारत पाकिस्तान के आतंकी शिविरों पर जबरदस्त हमला करता और अपनी ताकत को स्थापित कर देता। लेकिन भारत सरकार इस विकल्प को भी नहीं अपना सकी। इसका  नतीजा सही नहीं हो सका। क्योंकि , पाकिस्तान चाहता है हल्की-फुल्की लड़ाई और भारतीय  सैन्य शिविर पर हमले और उसके परिणाम स्वरुप कुछ सैनिकों की मौत उसके लिए आसान जंग है और तदर्थ जवाबी कार्रवाई कुछ ऐसी है जिसकी बात अक्सर हमारे गृह मंत्री करते हैं उनको अक्सर सुना जाता है कि "पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देंगे " ,लेकिन यह  बेअसर होता जा रहा है ।  घोषित युद्ध ना होते हुए भी युद्ध पिछले 18 महीनों चल रहा है। इसमें पाकिस्तानी गोलीबारी और आतंकी हमलों में भारत के 80 जवान शहीद हुए है। अघोषित युद्ध प्रति कार्रवाई नहीं है। पाकिस्तान पर दबाव बनाने और हिंसा रोकने के लिये दिल्ली में पूर्णरूपेण पाकिस्तानी हाई कमीशन एक तरह से आईएसआई के एजेंटों का अड्डा है और यह भारतीय राजनीतिज्ञों ,अफसरों ,पत्रकारों तथा अवकाशप्राप्त सेना अधिकारियों को और एन जी ओ के कार्यकर्ताओं को भ्रष्ट करते हैं या फिर विभिन्न तरीकों से उन्हें  विचलित करते हैं। यही नहीं पाकिस्तान के साथ तिजारत ही बंद कर देनी चाहिए और उसको दिया हुआ "मोस्ट फेवर्ड नेशन" का दर्जा रद्द कर दिया जाना चाहिए । एक ऐसा देश जो  आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और भारत जैसा देश उसे बर्दाश्त कर रहा है तब भी कोई इसे गंभीरता से नहीं ले रहा है।  सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ भी लगाई जाए जिसमें बिजली दौड़ती रहे  तथा सेना के शिविर के आसपास सेंसर लगाए जाएं।  कंटीले तारों की बाड़ तो पठानकोट हमले के बाद ही यानी 2 साल पहले लगाई जाने वाली थी पर अब जाकर कहीं रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषणा की है कि 1,487 करोड़ रुपयों की लागत से बाड़ लगायी जायेगी। इस अघोषित युद्ध में भारतीय सेना के कई जवान शहीद हुए हैं। भारत को भी चाहिए कि पाकिस्तानी सैनिकों के ठिकानों पर हमला कर उन्हें तहस-नहस कर दे। ध्यान रहे, भारत के पास भी परमाणु बम है और पाकिस्तान के पास तो यह मात्र छद्म है ,मात्र छद्म। कुल मिलाकर जवाबी कार्रवाई काम नहीं कर रही है, बातचीत हो नहीं रही है क्योंकि वह  इसके अलावा आतंकवाद को भी बढ़ावा देना चाहता है इसलिए सीमा पर कटीले तारों की बाड़, जिसमें हाई वोल्टेज करंट दौड़ता रहे या जम कर उसकी ठुकाई की जाय , इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं है भारत के पास।

Wednesday, February 14, 2018

मालदीव मसले में भारत को सचेत रहना होगा 

मालदीव मसले में भारत को सचेत रहना होगा 

मालदीव में राजनीतिक उथल -पुथल और तदंतर वहां के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भारत एक अजीब दुविधा में फंस गया है। मालदीव में राजनीतिक उथल- पुथल के बीच सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद  सहित विपक्ष के नेताओं को रिहा कर दिया जाए । इससे उत्पन्न नई परिस्थिति  से इस  निपटने के लिए  मालदीव ने भारत से मदद मांगी है। अब भारत यह सोच नहीं पा रहा है कि एक संप्रभु राष्ट्र को कैसे और किस तरह से मदद पहुंचाए। भारत सदा से जरूरत में मालदेव का मददगार रहा है। भारत की सेना ने 2008 में एक बार वहां तख्ता पलट की कोशिश में हस्तक्षेप कर उसे रोका था। नौसेना वहां 2009 तक मौजूद थी।  अब वह देश फिर से भारत की तरफ देख रहा है । भारत के लिए एक मौका है  कि वह दक्षिण एशियायी क्षेत्रीय सहयोग को पुनर्परिभाषित करे। दक्षिण एशियाई क्षेत्र में चीन अपनी बढ़त बनाने के  प्रयास में लगा हुआ है और ऐसे में  स्पष्ट है चीन भारत के दखल को रोकना चाहेगा। चूंकि यह मालदीव का अंदरुनी राजनीतिक मामला है और भारत को निर्णायक   कदम उठाना चाहिए।  इसमें ना केवल मालदीव की जनता का हित है बल्कि उसे अपना भी हित  देखना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक किसी भी संप्रभु राष्ट्र के अंदरूनी मामले में दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। राष्ट्र संघ के इस नियम को भारत आजादी के बाद से मानता आया है। राष्ट्र संघ के नियमानुसार कोई भी  राष्ट्र या राष्ट्रों का समूह किसी भी देश के अंदरुनी या वैदेशिक मामले में दखल नहीं दे सकता है। किसी भी तरह का दखल चाहे वह राजनीतिक हो, आर्थिक हो या सांस्कृतिक अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जाएगा ।  लेकिन ऐसे में जब किसी   देश का विधिक शासन और वहां की जनता के अधिकार संकट में हों तो  हस्तक्षेप कानून का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। अतः मालदीव में भारत का हस्तक्षेप कानून का उल्लंघन नहीं होगा। दुनिया जानती है कि भारत किसी भी देश के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है ।  क्षेत्रीय तथा विश्व स्तर पर किसी भी झगड़े को शांतिपूर्ण तरीके से निपटाने का समर्थक है। संविधान की धारा 51 के अंतर्गत साफ कहा गया है भारत अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा ,दो देशों के बीच  सम्मानपूर्ण संबंध को मजबूत करेगा और अंतर्राष्ट्रीय झगड़ों को बातचीत से सुलझाने की कोशिश करेगा। भारत का किसी भी देश के प्रति यही दृष्टिकोण  रहा है । भारत  इंसानी चिंताओं और संकट के दौर में भी उस देश में विकास के सकारात्मक सोच के साथ हस्तक्षेप कर इंसानी  विपदाओं को दूर करने की कोशिश करता है।  इसने कभी भी किसी पड़ोसी देश पर रौब जमाने की कोशिश नहीं की।  अगर कोई अन्य देश ऐसा करता हुआ पाया भी जाता है तो भारत उसने उसके प्रति चिंता जाहिर करता है। एशिया में आर्थिक विकास , सुरक्षा  और शक्ति संतुलन के लिए भारत की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। यह बातचीत के जरिए किसी भी देश के भीतर व्याप्त संकट को  समाप्त करने की कोशिश करता  है।
अब मालदीव के संकट के मद्देनजर भारत को कूटनीतिक कदम उठाना चाहिए ताकि चीन की आर्थिक और राजनीतिक कूटनीति रोक सके। नेपाल का ही उदाहरण लें , भारत ने वहां से पैर खींच लिये लेकिन चीन लगा रहा। नतीजा यह हुआ चीन को भारत नहीं रोक सका। जबकि भारत और नेपाल की आर्थिक तथा सांस्कृतिक संबंध ज्यादा प्रगाढ़ थे। लेकिन अब नेपाल चीन की तरफ झुक गया  है।  चीन ने उसके लिए अपने बंदरगाहों की राह खोल दी तथा संयुक्त रेल पटरी बिछाने  की बात चल रही है। भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज काठमांडू गयीं  लेकिन नयी सरकार बनने से पहले , और तब तक देर हो चुकी थी। भारत को चाहिए था कि वह नेपाल और चीन के संबंधों से सावधान रहे और उससे होने वाले खतरे का  पहले से अंदाजा लगा  ले, लेकिन ऐसा नहीं हो सका ।अगर मोदी सरकार दक्षिण एशिया में तथा हमलावर चीन  से संतुलन बनाए रखना चाहती है उसे मालदीव संकट पर चुप नहीं रहना चाहिए और ना ही इस मामले को हाथ से निकलने देना चाहिए ।जैसा कि नेपाल में हुआ नेपाल के साथ हुआ।

Tuesday, February 13, 2018

खालिदा जिया की सजा का मतलब

खालिदा जिया की सजा का मतलब

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया को ढाका की अदालत ने 5 साल की सजा सुनाई है और इस सजा में बांग्लादेश को एक गंभीर राजनीतिक संकट में डाल दिया है । इसके बाद  से कुछ भी हो रहा है उसके बड़े दिलचस्प परिणाम हो सकते हैं भविष्य में। क्योंकि इस साल के आखिर तक बांग्लादेश में संसदीय चुनाव होने वाले हैं । इस घटना पर सत्तारूढ़ अवामी लीग पार्टी के समर्थकों ने जश्न मनाया।  बांग्लादेश का इतिहास देखते हुए इस घटना की , खास करके इसके राजनीतिक परिदृश्य की एवं प्रतिफल की गंभीर समीक्षा की जरूरत है।   जो भी हो रहा है वह सब चुनाव के कुछ ही पहले हो रहा है । 

     भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के इतिहास को देखते हुए ऐसा लगता है कि कैद के बाद  राजनीतिक नेताओं की लोकप्रियता बढ़ जाती है । इंदिरा गांधी, बेनजीर भुट्टो, शेख हसीना के उदाहरण सबके सामने हैं।  इसी कारण खालिदा जिया एकदम खारिज नहीं किया जा सकता या  मामले को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वह और उनकी पार्टी हो सकता है चुनाव में जीत की जाए। यह दूसरी बात है ,उसे बहुत ज्यादा बहुमत नहीं मिलेगा लेकिन अच्छी उपस्थिति तो दिखेगी ही। इस उपस्थिति से अवामी लीग के लिए संकट भी पैदा हो जाए।  संक्षेप में कहें तो हाल के इस फैसले ने खालिदा जिया को एक तरह से हीरो बना दिया है। इसका उदाहरण फैसले के समय अदालत में जमा उनके समर्थकों भारी भीड़ और 2 महीने पहले विदेश से लौटने पर हवाई अड्डे पर उनके समर्थकों का जमघट से मिल सकता है। यह उनका व्यक्तिगत करिश्मा ही कहा जा सकता है।  करिश्मा अब  धीरे-धीरे छीज रहा है पर खत्म नहीं हुआ है । उनके समर्थकों में गुस्सा साफ झलक रहा है । फैसले के बाद के दो-तीन  दिनों में बांग्लादेश में जो हिंसक घटनाएं हुईं, मारपीट हुआ वह  एक जमीनी हकीकत है। बांग्लादेश की राजनीति जो समझते है वे आश्वस्त  हैं कि अगर सही ढंग से चुनाव हुए तो वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद भारी मतों से विजय होंगी। इस बीच, खास करके खालिदा जिया के जेल जाने के बाद से ऐसा महसूस हो रहा है कि उन्हें राजनीति और आर्थिक तौर पर पाकिस्तान से भारी मदद मिल सकती है।   उनकी सियासत का रोड मैप पाकिस्तान स्थित ताकतें तैयार कर रही है।  खालिदा जिया भारत समर्थक नहीं है उनके सत्ता में आने के बाद भारत के दोनों तरफ पूर्वी और पश्चिमी किनारों पर विरोधी मानसिकता वाली सरकार रहेगी । ऐसी स्थिति में बांग्लादेश के राजनीतक  परिदृश्य पर सोचना जरूरी है खासकर भारत के संदर्भ में । बंगलादेश   नेशनलिस्ट पार्टी सत्ता में आती  है तो क्या ह़ो सकता है।

भारत के पाकिस्तान समर्थक तत्वों को भी खालिदा जिया की पार्टी की तरफ से मदद के लिए संदेशे मिलने लगे हैं। खालिदा जिया के कार्यकाल का अगर विश्लेषण करें तो 1991-96  और 2001- 2106 के बीच उनका शासन भारत समर्थक नहीं रहा था। भारतीय आतंकवादियों को वहां शरण मिलती थी। बांग्लादेश की जमीन से भारत विरोधी कार्यवाहियां होती थीं। यही नहीं, खालिदा सरकार  धुर दक्षिणपंथी जमात-ए-इस्लामी को समर्थन देती थी जो भारत में सांप्रदायिक तत्वों को बढ़ावा देता है। इससे बांग्लादेश के भी विचारक और सुधी लोग चिंतित रहते थे। इतना ही नहीं भारत से भागे हुए आतंकवादी या पश्चिमी एशिया से भगोड़े आतंकवादियों को खालिदा के पुत्र तारिक रहमान शरण देते थे ताकि वे तत्व भारत के आर्थिक और सुरक्षा हितों को हानि पहुंचा सकें।  भारत की जनता  एवं सरकार नहीं चाहेगी कि बीएनपी या खालिदा जिया सत्ता में आए। यही नहीं अगर खालिदा सत्ता में आती हैं  या चुनाव प्रचार में जुट जाती हैं तो वे तिस्ता और गंगा बांध पर समझौता करने के लिए गुटबंदी चालू कर देंगी।  वे इस मामले में भारत को अलग-थलग करने की कोशिश करेंगी।  यहां यह स्मरणीय है कि खालिदा जिया के दिवंगत पति पूर्व राष्ट्रपति जियाउर्रहमान सार्क के गठन करने वालों में से थे। बांग्लादेश के कानून के अनुसार अगर किसी को कम से कम 2 वर्ष की सजा होती है तो वह चुनाव लड़ने के लिए अगले 5 साल तक अयोग्य घोषित हो जाएगा। खालिदा जिया पर इस समय पैंतीस मामले चल रहे हैं और सबसे गंभीर मामला है  एक अनाथालय से भारी रकम का गबन करने का है।  उनके चारों तरफ कानूनी जाल बिछा हुआ है जिस से निकलना उनके लिए कठिन है । इस बीच, अगर उन्हें चुनाव नहीं लड़ने नहीं दिया गया तो   वे अपनी जगह मिर्जा इस्लाम आलमगीर या अमीर खुसरो महमूद को पार्टी का अध्यक्ष बनाने की तैयारी में हैं। खालिदा जिया की गैरहाजिरी में अगर चुनाव होते हैं तो यकीनन बीएनपी उन्हीं रास्तों पर चलेगी जो भारत विरोधी हैं और जो खालिदा जिया ने तैयार किया  है।  बांग्लादेश की अन्य राजनीतिक पार्टियां जैसे जातीय पार्टी भी चुनाव में जोर  आजमाने और अपनी जगह बनाने की तैयारी में है। यह पार्टी पूर्व राष्ट्रपति एच एम इरशाद की है। वह भी राजनीतिक अज्ञातवास से बाहर आने के लिए कमर कस रहे हैं ।उन्हें वहां की सेना का भी समर्थन है।  हाल में जब भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी बांग्लादेश यात्रा पर आये थे तो इरशाद उनके साथ दिखाई पड़ रहे थे। इस तरह के राजनीतिक मंच भारत के लिए ना के बराबर हैं। लेकिन अगर कोई विकल्प की बात  है तो अभी  किसी भी विकल्प के बारे मे बात   करना मुश्किल है। केवल शेख हसीना और उनकी पार्टी इस लायक है कि भारत उनका समर्थन करे। क्योंकि भारत विरोधी ताकतों को हाशिए पर खड़ा करने के लिए यह मुफीद है।   फिर भी शेख हसीना के सामने कठिनाइयां तो है और दोबारा सत्ता में आने के लिए उन्हें फूंक- फूंक कर कदम रखने होंगे।