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Sunday, December 10, 2017

चुप्पी खतरनाक है

चुप्पी खतरनाक है

हमारे प्रधानमंत्री जी बेहद क्षुब्ध हो गये जब विपक्ष के एक नेता ने उनके संदर्भ में "नीच " शब्द का प्रयोग किया। कांग्रेस पार्टी खास कर राहुल गांधी साहब क्षुब्ध हो गये कि उनकी पार्टी के एक नेता ने प्रधानमंत्री के लिये नीच का सम्बोधन किया। प्रधानमंत्री जी ढोल प​ीट - पीट कर नीच शब्द का मतलब समझात चल रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने उस नेता को पार्टी से ​निलंबित कर दिया कि नीच शब्द का उपयोग बर्दाेत के काबिल नहीं है। देश के सारे चैनल और प्राइम टाइम टी वी  के जुझारू एंकर इस लिये दुखी हैं कि प्रधानमंत्री शालीनता को भंग करने की कोशिश की गयी। मनुष्यता और नैतिकता कह खून समझा गया इस शब्द के उपयोग को। हम बड़े संवेदनशील लोग हैं। कवि केदारनाथ सिंह ने कहा है कि " वो क्यों चुप हैं जिन्हें आती है भाषा।" बेशक एशिया के सबसे बड़े हिंदी के कवि को मौन की चीख  सुन पाने का मौका नहीं मिला होगा। संवेदनशीलता की इस शस्य श्यामला भूमि पर असंवेदनशीलता की चीख कोई सुन नहीं पा रहा है।  हॉरर फिल्मों की मानिंद एक  आदमी को सरे राह  जिंदा जला दिया गया और उसके जलाये जाने को कैमरे फिल्माया गया। यह घटना उस संवेदनशील राज्य की है जहां पद्रमावति की कल्पित कथा में मामूली हेर फेर से जियाले राजपूतों की संवेदनशीलता को आाघत लगा और वे लोग फिल्म के रिलीज रोकवाने पर तुले हैं। लेकिन उस समय कोई आहत नहीं हुआ जब धार्मिक कट्टरवाद शब्द का प्रयोग राजस्थान में दित दहाड़े हत्या का औचित्य बताने के लिये किया गया। यह हत्यारा कौन है ? हमने इसे कई बार देखा है ओर हरबार नजरअंदाज कर दिया है। क्यों कि हमने यह सोचा यह हमारे साथ नहीं होने वाला। हमने इस पर सोचना , इसपर चिंतित होना, हसमें दखल देना या इसे रोकना इसी लिये छोड़ दिया। हमने इसे उस वक्त देखा है जब कांवड़िये के रूप में बसो पर हमले किये। हमने उस वक्त देखा जब दूध बेचने वालों पर हमले हुये। हमने इसे गौ रक्षकों के रूप में देखा है, दलितों कपिीटनेवाले रूप में देखा है , हमने बिना हेलमेट के हाथ में तिरंगा लिये हमने इसे ट्रेनों में ईद की खरीदारी करने वालों सेतेज मोटर सायकिल चलाते हुये महिलाओं को छेड़ने वाले के रूप में देखा है।  हमने इसे ईद की खरीदारी कर  ट्रेनों में सवार लोगों से मारपीट करने वालों के रूप में देखा है। हमने उसे अभक्ष्य खाने वाले को मारने वालों के रूप में देखा है। 

हम भारत के लोग आदर्श और धर्म के नाम पर हिंसा को पाल पोस रहे हैं। यह एक दंगे से ज्यादा खतरनाक और खराब है। दंगा सुनियोजित होता है और दंगाई भीड़ में शामिल होते हैं। इससे पूरी भीड़ को कोई लाभ नहीं है , लाभ वही उठाते हैं जिनहोंने इसकी योजना बनायी है। भावना और आस्था भीड़ को पागल बना देती है। गौ रक्षकों के  अपराध  और अभी हाल में राजस्थान के राजसमंद में जो कुछ हुआ वह सब एक दंगे से ज्यादा खतरनाक हैं। क्याोंकि यह एक समूह द्वारा अंजाम दिया जाता है औष्र वह समूह इसमें शामिल नहीं होता और ना हिंसा की जिम्मेदारी लेता है। ये ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि जो हुआ वह कहीं हो सकता है क्याोंकि इसके खिलाफ आवाज के मौके उन्होंने छोड़े नहीं हैं। हिंसा का औचित्य इसके शिकार और इसके वगेधियों के डर के रूप में शामिल होता है। यह ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि इसके स्वरूपको बदलना आसाान नहीं है।ऐसी ​िस्थति में इक राष्ट्र के तौर पर हमारे पास कोई ऐसी संस्था नहीं है जो इसके खिलाफ खड़ी होकर हमारे बुनियादी सामाजिक ताने बाने को बचा सके। इंसानी खून से नहाने वाली भीड़ राष्ट्रवाग्द और बहुलता वाद की धारा में अपने गुनाह धो देती है। राष्ट्रवाद और हिंदूवाद का कवच उनकी हिंसा को ढंक देता है। इसमें निहित स्वार्थ ही सक्रिय है और समाज मुंह के बल गिरा है। राजसमंद की घटना बहुत गंम्भीर है। इसपर जनता , राजनीतिज्ञों और सरकार की  चुप्पी और गंभीर है। यह चुप्पी चीख रही है और यह चीख कह रही है -  

जो आाज इसे मारने आये थे,

 कल तुम्हारे लिये आयेंगे, 

तुम्हारी बेटियों के लिये आायेंगे 

और तब भी तुम चुप रहोगे।

Wednesday, December 6, 2017

बढ़ते अपराध और पुलिस 

बढ़ते अपराध और पुलिस 

शहर के बड़े स्कूल में एक बच्ची से बलात्कार की घटना को यदि पुलिस प्रशासन के निगाह से देखें तो लगता है कि पुलस व्यापक तौर पर अपराध की रोकथाम की मानसिकता पैदा करने में असफल रही है लिहाजा , अपराधी व्यापक रूप में कानून के भय से मुक्त होते जा रहे हैं। मुक्ति का यह भाव कुछ ऐसा हो चुका है कि कुछ भी करने से अब डरते नहीं हैं। बच्ची से कुकर्म वाली घटना तो महज अभिव्यक्ति है समाज के संवेदनशील वर्ग में भी अपराध के प्रति नजरिया बदलने की। इसी कड़ी में देखें एक पॉश और निजी अस्पताल में जीवित बच्चे को मृत कह कर उसे पलास्टिक के थैले में लपेट कर अभिभावकों सौंप देने की, बैंक से कर्ज लेकर विदेश भाग जाने की, संसद की बैठक लगातार टलते जानें की, पुलिस सुधार को राजनीति का शिकार बनाया जाना। ऐसी कई घटनाएं हैं। सभी घटनाओं के चरित्र अलग- अलग हैं पर सबका भाव एक ही है कि उच्च वर्ग में विहित नियमों के प्रति असम्मान, नियमों की अवहेलना। इसका कारण है कि बदलते जमाने के साथ हमारी सरकारें आपरा​धिक प्रशासन का पुनर्गठन नहीं कर सकीं। हाल में जारी हुये एन सी आर बी के 2016 के आंकड़े  बताते हैं कि देश में महज 47 प्रतिशत अपराधों में ही सच्जा हो की है। यानी अपराधों की निष्पत्ति और निष्कर्ष में व्यवस्था नाकाम हो ऱ्ही है। हर बात में सियासत को दोषी बना देना इन दिनों एक फैशन सा हो गया है। हां, सियासत भी एक कारण जरूर है पर वही एकमात्र कारण नहीं है। इसके लिये एक बड़ा दिलचस्प उदाहरण दिल्ली का है। दिल्ली में पुलिस प्रशासन में सियासत की व्यवहारिक दखलंदाजी नहीं के बराबर है। क्योंकि वहां पुलिस कमिश्नर लेफ्टीनेंट गवर्नर को रिपोर्ट करते हैं क्योंकि मुख्यमंत्री नहीं होते हैं। आबादी में मुम्बई से छोटे इस शहर में मुम्बई से दोगुनी पुलिस है। अब गत वर्ष 1 लाख 90 हजार 876 लोगों पर आरोप लगे और उनहें अदालत में पेश किया गया सुनवाई के लिये। जबकि आलोच्य वर्ष में आई पी सी के तहत 9837 लोगों को ही सजा सुनायी जा सकी। दिल्ली में इन गिरफ्तार लोगों में से 58 पतिशत मामलों में ही चार्जशीट दाखिल किये जा सके। दिल्ली में इस अवधि में महिलाओं के खिलाफ 13,803 अपराध दर्ज किये गये जिसमें 4371 मामलों में चर्जशीट नहीं लगी। मुम्बई में इसी अवधि में महिलाओं के खिलाफ 5128 मामले दर्ज हुये जिनें 15 प्रतिशत मामलों में ही फाइनल रिपोर्ट लगी। पुलिस के कामकाज करने की प्रमुख पहचान अपराध दर्ज करते समय सही रिपोर्टिंग ही नहीं है बल्कि यह भी है कितने मामलों में चार्जशीट भी गयी। इसका भी असर आपराधिक आचरण पर  पड़ता है। आधुनिक अपराध अन्वेषण में  डी एन ए परीक्षा और अन्य फोरेंसिक जांच अन्वेषण में मदद पहुच्चते हैं पर इसके लिये कोई आग्रह नहीं दिखता। दिल्ली में इतने अपराध दर्ज हो रहे हैं ओर केवल एक फोरेंसिक जांच लेबोरेटरी है जहां 9 हजार नमूने पेंडिंग पड़े हैं। 5000 डी एन ए नमूने पड़े हैं। महत्वपूर्ण सबूतों के निष्पादन में विलम्ब के कारण एक तरफ न्याया प्रक्रिया अपना काम नहीं कर सकती दूसरी तरफ सबूतों के नमूने नष्ट होते जाते हैं। यही कारण है कि दिलली में अपहरण, बलात्कार और हत्या  की घटनाओं में क्रमश: 21, 24 और 30 प्रतिशत ही फैसले हो पाये हैं। दिलली पुलिस की वेबसाइट के मुताबिक यह दीनया की सबसे बड़ी मेट्रोपोलिटन पुलिस है और उसके  पास बेहतरीन स्पष्टीकरण है कि अपराधी बाहर के लोग हैं इसलिये जांच मुकम्मल नहीं हो पाती। दिलली में मुम्बई से 5 गुना ज्यादा अपराध होते हैं। अपराधों की रोकथाम के लिये दंड निर्णय जरूरी है ओर दूसरी सबसे जरूरी चीज है पुलिस का परस्पर तालमेल। यहां सबसे ज्यादा जरूरी है कि पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही और कामकाजी जिम्मेदारी में फर्क करने की। मसलन , लंदन के मेयर तय करते हैं कि पुलिस प्राथमिकता क्या हो और इसे लागू करने के लिये पुलिस कमिशनर जवाबदेह होते हैं। अपने देश में भी ऑपरेशनल निर्णय का काम पुलिस कमिशनर कों सौंपा जाना चाहिये। यही नहीं हमारी पुलिस व्यवस्था में रोजमर्रा के काम के लिये और जांच के लिये अलग विभाग नहीं हैं। यहां एक समस्या है कि जांच् के हुनर पर आधारित एक कामकाजी व्यवस्था है पुलिस या एक ऐसा बल है जो अपनी सकि1यता का असर दिखाता है। एक और विवाद है कि किस तरह के आचरण को आपराधिक कानून के नियंत्रित किया जाय। पुलिस प्रशासन का मुख्य उद्देश्य अपराध नियंत्रण होना चाहिये। पुलिस को सामाजिक परिवर्तन का कारक नहीं होना चाहिये।      

Tuesday, December 5, 2017

बच्चों को बचायें

बच्चों को बचायें

शहर के एक बड़े स्कूल में चार वर्ष की एक बच्ची के साथ उसके शिक्षक ने बलात्कार किया। बच्ची के साथ क्या हुआ वह खुद नहीं बता सकती क्योंकि उसे अभी तक ये सब बातें मालूम ही नहीं हैं कि उसके साथ क्या हुआ? एक अबोध बच्ची के साथ ऐसी हरकत से मानवता शर्मसार है।  यह कोई ऐसी घटना नहीं है जो पहली बार हुई हो। पिछले कुछ सालों से हमारे देश भारत में जहां कहा जाता था किन यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमंति देवता: , वहां अचानक नारियों - ब​िच्चयों से लेकर बुजुर्ग महिला तक - से बलात्कार की खबरें रोजाना आ रहीं हैं। कुकर्म के इन मामलों का अगर अध्ययन करे तो लगता है कि यह हवस मिटाने के लिये नहीं किया गया है। यह एक अजीब मानसिक प्रक्रिया बनती जा रही है जहां मोह, माया, ममता ,नफासत सबकुछ समाप्त होता जा रहा है। कई ऐसे मामले सुने जाते हैं कि इस तरह की हैवानियत की शिकार बच्ची या लड़की चीखते चिल्लाते दम तोड़ देती है। ऐसा नहीं कि इस तरह की घटना अबे 20या 25 साल पहले नहींी होती थी। यह एक मनोवैज्ञानिक रोग हे जो हर काल में रहा है। फ्रायड ने इसे मूलगत पाप कहा है। सेक्स की यह भूख कभी मिटती नहीं है पर इसकी अभिव्य​क्ति इतने अमानुषिक ढंग से होनी शुरू हुई है यह एक चिंता जनक लक्षण है। यह हर क्षेत्र में हर समाज में हो रहा है।  ऐसा क्यों यह सवाल हर समझदार आदमी के जहन में अठता है। ऐसी हर घटना के बाद यही सोचने पर हम मजबूर हो जाते हैं कि आखिर इंसान इतना क्रूर क्यों हो जाते है? क्या हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां मानुष के वेश में अमानुष बढ़ते जा रहे हैं? यहां सबसे बड़ी बात हे कि हम अपनी ब​िच्चयों को ऐसे अमानुषों से कैसे बचायें? जिस स्कूल में यह घटना घटी वहां चारों तरफ सी सी टीवी कैमरे लग गये ओर सुरक्षा के कई व्यापक बंदोबस्त कर दिये गये हैं। पर क्या यह गारंटी दी जा सकती है कि ऐसा नहीं होगा। 

फोरेंसिक मनोविज्ञान के मुताबिक इक बलात्कारी चाहे वह शिक्षक हो या मजदूर, चाहे वह रिश्तेदार हो या कोई ओर करीबी जो इस तरह के कुकर्म करते हैं वे फोरेंसिक मनोविज्ञान के अनुसार घृ​णित अपराधी होते हैं। किसी बैंक को लूटने के बारे में सोचना और किसी बच्ची से बलात्कार के बारे में साचने की प्रक्रिया इक ही होती है केवल टार्गेट में फर्क होता है। अपराधी पहले योजना बनाता है ओर इक मोडस ऑपरेंडी विकसित करता है। हर चरण मे एक उत्तेजना होती है। अपराध की​ योजना बनाते वक्त , उसे अमल में लाने के दौरान ओर फिर उसके बाद भी।पुलिस से बचने की क्रिया इसे और उत्तेजक बनाती है। अगर वह पकड़ा भी जाता है तो इससे उत्तेजना कम नहीं होती ओर अगर जेल हो भी जाती है तो कई लोगों के लिये वह आगे की योजना बनाने के लिये मुफीद जगह हो जाती है। यही बलात्कारी के साथ भी होता है। बलात्कार को अंजाम देने के पहले वह टागेंट को चुनता है उसकी आदतों पर गौर करता है और फिर हमले की योजना बनाता है, अपराध के बाद बच कर निकल जाने की योजना बनाता है तब कहीं अपराध को अंजाम देता हे। इसमें भी चुनौतियां वैसी ही होती हैं जो एक बैंक लुटेरे के साथ होती हैं। बच्ची के साथ बलात्कार करने वाला अपराधी बेहद शातिर होता है , वह अपने शिकार के मानस का अध्ययन करता है ओर उसकी मानसिक ​स्थिति  का लाभ उठाकर उसके करीब जाता है। छोटी छोटी ब​च्चियां अक्सर इसकी शिकार हो जाती हैं। बच्चे असहाय हो जाते हैं क्योंकि वे बता नहीं पाते कि क्या हुआ उनके साथ। कुकर्मी इसलिये बच जाते हें। इसके लिये जरूरी है कि बच्चें की स्नेह की भूख को मां बाप मिटायें। ये कुकर्मी किसी दूसरे ग्रह के लोग नहीं हैं बल्कि हमारे आपके बीच के ही लोग हैं। बच्चें के स्वभाव में बदलाव को बरीकी से देखें, वह किसकी बात करता है कि शिक्षक या मित्र के अभिभावक  की प्रशंसा करता है। बच्चों के आचरण में बदलाव, उनके शरीर पर कोई निशान , उनका अक्सर डरा डरा सा होना या किसी खास आदमी के आने पर बच्चे का डर जाना इत्यादि कुछ लक्षण है जिसका विश्लेषण जरूरी है। 

Sunday, December 3, 2017

इसकी क्या जरूरत है? 

इसकी क्या जरूरत है? 

तवायफ की तरह अपनी गलतकारी के चेहरे पर,

हुकूमत मंदिर और मस्जिद का पर्दा डाल देती है। 

कैसा जमाना आ गया है , जो लोग देश को विकसित करने का जिम्मा उठाये हुये हैं या जो आम जनता को यह विश्वास दिलाने में लगे हैं कि वे जाति पांति के भेद से उपर उठे हुये इंसान हैं वही आज मुल्क में जातियों का झंडा बड़ी चालाकी से उठाये फिर रहे हैं। अभी गुजरात में चुनाव प्रचार चल रहा है ओर वक्त के हाकिम हमारे प्रधानमंत्री जी की पार्टी राहुल गांधी से पूछ रही है कि वे किस जाति के हैं- हिंदू हैं, पारसी हैं या कैथोलिक इसाई? राहुल भी नर्वस नजर आ रहे हैं। वे भूल रहे हैं और उनका भूलना आश्चर्यजनक है कि कांग्रेस की बुनियाद धर्म निरपक्षिता है। क्या कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के मायने भूल गयी? हाल के दिनों मेंजितने भी चुनाव प्रचार हुये उनमें गुजरात का चुनाव प्रचार सबसे ज्यादा उत्तेजक है। गुजरात के राजनीतिक आचरण का विश्लेषण करें तो एक बात सामने आयेगी कि साधारणतया गुजरात के राजनैतिक नेता एक ही तरह के हैं और वैचारिक रूप में भी मोटा- मोटी समान हैं। अब वे किस पार्टी में शामिल होते हैं वह इस बात पर मुन्हसर करता है कि उनके अनुमान में कौन सी पार्टी जीत रही हे। अब जबसे कांग्रेस ने 2002 के साम्प्रदायिक दंगों के लिये नरेंद्र मोदी को घेरना शुरू किया तो एक नयी तस्वीर उभरने लगी। हवालांकि बहुतों को होगा ​कि कांग्रेस ने 2007 में नरेंद्र मोदी​ के खिलाफ र्मौत का सौदागर जुमला उछाला था लेकिन वह कारगर नहीं हो सका। इसके बाद मोदी जी कि पार्टी  2012 का भी चुनाव जीत गयी। अतएव इस बार कांग्रेस हिंदुत्व का बड़ा ही नरम दांव चल रही है। राहुल गांधी हर मंदिर में जाते हैं बड़ी धूम धाम से पूजा करते हैं ऐसा किस​ी नेता ने अबतक नहीं किया। केवल उस समय को छोड़ कर जब यू पी ए के चार कैबिनेट मंत्री बाबा रामदेव को बधायी देने दिल्ली एयरपोर्ट गये थे। लेकिन गुजरात में हिंदू वोट के लिये बुरी तरह जंग छिड़ चुकी है। यही कारण है कि राहुल ​हिंदु हैं क्या , इस तरह का नकली विवाद के बगूले उठने लगे हैं।यहां एक वित्तम ण्है कि वे मंदिरों के रजिस्टरों में हिंदू या गैर हिंदू की तरह हस्ताक्षर करते हैं। हमें तो यह मालूम नहीं कि हम मुदरों में घुसने समय किसी भी रजिस्टर में हस्ताक्षर करते हैं या नहीं। यहां बात है कि कांग्रेस राहुल गांधी के गैर हिुदू के तौर पर हस्ताक्ष्रर को लेकर ​ इतना परेशान क्यों है? कांग्रेस तो जाति निरपेक्ष और धर्म निरपेक्ष पार्टी है। धर्म या पार्टी का उसके लिये अर्थ नहीं रखती। यहां कांग्रेस एक साधारण ट्रिक भूल रही है। उसे बहुत ही फख्र से एलान करना चाहिये कि वह घेषणा कर दे कि का राहुल बहुजातयिता का प्रतिनिधी है और भारत की विविधता की पहचान है। इसके खानदान को देखें, इसके दादा पारसी थे और पिता आधा ​हिंदू और आधा पारसी। उनकी शादी सोनिया जी से हुई थी जो ईसाई थीं। अतएव राहुल एक हिंदू है., पारसी हैं और ईसाई हैं।  देश मेंं शायद ही कोई पार्टी है जिसमें इतनी विविदाता है। यही नहीं धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस की नीति का आधार रही है तब उसका नर्वस होना समझ में नहीं आया। यहां एक और महत्वूर्ण बात है कि हर धर्म का उपासनास्थल लोगों को अपनी ओरकिर्षित करते हैं। देश के कई चर्च , कई गुरूद्वारे और कई मजार में सभी धर्म कें लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। जकिसी भी जगह कोई रजिस्टर नहीं रखा है। किसी भी गुरूद्वारे, चर्च , म​स्जिद या मंदिर में जाने के लिये किस ऐसे रजिस्टर की जरूरत नहीं है। यह प्रधानमंत्री का कर्तव्य है कि वह घोषणा करें कि धर्म का उल्लेख जरूरी नहीं है।  

बस तू मिरी आवाज़ में आवाज़ मिला दे

फिर देख कि इस शहर में क्या हो नहीं सकता

Friday, December 1, 2017

भारत का जी डी पी बढ़ा : चलो कुफ्र तो टूटा

भारत का जी डी पी बढ़ा : चलो कुफ्र तो टूटा

वित्त वर्ष 2017 के सितम्बर तिमाही की जी  डी पी की रिपोर्ट आ गयी है। हालांकि यह 6.3 प्रतिशत की यह वृद्धि बहुत ज्यादा नहीं है क्योंकि पिछली तिमाही में यह 5.7 थी। परंतु अब तक घटने की प्रवृत्ति थी उसमें वृद्धि हुई। राम राम करके कुफ्र तो टूटा।  जैसी कि उममीद है यह 6.5 पर जाकर सीमित हो जायेगी। यह मामूली विकास हो सकता है जुलाई में लागू जी डी पी के कारण हो वरना विकास की दर और बढ़ती। उम्मीद थी कि विकास दर 6.1 प्रतिशत होगा पर इन अनुमानों को झुठलाते हुये यह  6.3 प्रतिश्हत हो गयी। जीडीपी किसी भी देश की आर्थिक सेहत को मापने का सबसे ज़रूरी पैमाना है। केंद्रीय सोख्यिकी कार्यालय के मुख्य सांख्यिकीविद टी सी ए अनंत ने दूसरी तिमाही के विकास दर का पूरा विवरण दिया। उन्होंने विभिन्न आर्थिक पहलुओ का विवरण दिया। अनंत ने बताया कि पिछली पांच तिमाहियों से जी डी पी में लगातार गिरावट के बाद यह वृद्धि एक सकारात्मक लक्षण है साथ ही यह बी बताता है कि देश की अर्थ व्यवस्था में सुधार आ रहा है। यह दर प्रोत्साहनकारक भी कही जा सकती है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले वर्ष इसी तिमाही में जी डी पी की दर 1.7 थी और पिछली वृद्धि दर से भी  यह ज्यादा है। श्री अनंत के अनुसार ,चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में देश के जी डी  पी  की वृद्धि 5.7 प्रतिशत  था। जीडीपी का यह स्तर विगत तीन वर्षों में सबसे कम था। वहीं पिछले वित्त वर्ष में  इसी तिमाही में जीडीपी विकास दर 7.9 प्रतिशत थी।  पहली तिमाही की दर 2016-17 की चौथी तिमाही के 6.1 प्रतिशत  से घटकर 5.7 प्रतिशत  पर आ गयी थी। पिछली तिमाही (जनवरी-मार्च) में जीडीपी विकास दर  6.1 प्रतिशत थी और इससे पिछले साल जीडीपी की दर  7.9 प्रतिशत थी। विकास दर की यह घोषणा ऐसे समय में हुई जब 2017-18 के बजट अनुमानों के अनुपात में मौद्रिक घाटा 96.1 हो गया। नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ये देश की जीडीपी की सबसे खराब स्थिति थी। भारत में कृषि, उद्योग और सेवा तीन प्रमुख नियामक हैं जिनमें उत्पादन के औसत के आधार पर जीडीपी दर होती है। यानी उत्पादन घटा तो जी डी पी गिरा और बढ़ा तो बढ़ा। जीडीपी किसी विशेष  अवधि में वस्तु और सेवाओं के उत्पादन की कुल कीमत है। भारत में जीडीपी की गणना हर तीसरे महीने यानी तिमाही आधार पर होती है। इस सरकार के आरंभिक दिनों में यानी पहले  2013-14 की आख़िरी तिमाही में अर्थव्यवस्था 4.6 फ़ीसदी के दर से बढ़ रही थी। श्री अनंत ने बताया कि  "यह वृद्धि  अर्थव्यवस्था के कुछ सेक्टर्स में बेहतरी के कारण हुई है। इस वृदिृध  के पीछे निर्माण क्षेत्र में दर्ज की गई बेहतरी है जिसका प्रतिशत सात दर्ज किया गया।  बिजली , गैस और जल आपूर्ति में 7.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की   गई है। दूसरे क्षत्रों में जिन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया है वे हैं होटल, व्यापार, ट्रांसपोर्ट और संचार जिनमें 9.9 प्रतिशत के दर से बढ़े हैं।" श्री अनंत स्वीकार किया कि  कृषि के क्षेत्र में पहले की तुलना में गिरावट आई है और इससे खाद्य वस्तुओं की कीमतें और बढ़ेंगी जिससे आम आदमी का जीवन और कठिन हो जायेगा। गुजरात चुनाव के ठीक पहले आया यह आंकड़ा अर्थव्यवस्था की खराब स्थिति को लेकर  लगातार आलोचना का शिकार हो रही मोदी सरकार के घाव पर मरहम सरीखा कहा जा सकता है। इस ताजा आंकड़े के कुछ दिन पहले मूडी ने भारत के स्तर को अपग्रेड किया था। रेटिंग्स एजेंसी मूडीज ने भारत में जारी आर्थिक सुधारों को आधार मानते हुए देश की क्रेडिट रेटिंग्स में 14 साल के अंतराल के बाद सुधार किया था। इसके बाद अर्थशास्त्रियों का दावा था कि दूसरी तिमाही के आंकड़ों में जीएसटी का असर समाप्त होता दिखाई देगा और विकास दर में सुधार देखने को मिलेगा। दरअसल, यह आंकड़ा देश की आर्थिक स्थिति के बारे में बताता है। यानी, जीडीपी बढ़ा है तो आर्थिक विकास की दर बढ़ी है और अगर यह पिछली तिमाही के मुकाबले कम है तो देश खस्ताहाली की ओर बढ़ रहा है। 

Thursday, November 30, 2017

भारत ने गलती की

भारत ने गलती की

अमरीका की " प्रथम पुत्री  " और अमरीकी राष्ट्रपति की सलाहकार इवांका ट्रम्प के भारत आने को लेकर देश में  बड़ा उत्साह है। वे ग्लोबल उद्यमी सम्मेलन  में शामिल होने के लिये यहां आ रहीं हैं। इस सम्मेलन का उद्देश्य महिला सशक्तिकरण की प्रकिया को तेज करना है। इसका नारा है " अग्रणी महिला , सम्पन्नता सबके लिये। " बेशक हमारे देश को ऐसी पहल की जरूरत है। देश में विकास को अगले स्तर तक पहुंचाने के लिये उद्योगों में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना ही होगा। उद्यमता का लोकतंत्रीकरण एक आदर्श है और उसकी सार्थकता स्पष्ट दिख रही है , खासकर ऐसे वक्त में जब दुनिया पूंजीवाद के गुमराह स्वरूप में आगे बढ़ रहीं है। अगर किसी ने इस सम्मेलन का उद्घाटन टी वी वगैरह में देखा होगा तो वह सहज ही मान लेगा कि यह फोटो खिंचवाने की  नरेंद्र मोदी की भव्य स्टाडल है। इसके प्रचार के लिये पी आर तंत्र ने भी कई स्तरो पर बहुत होम वर्क किया है। इस सम्मेलन की  थीम " महिलाएं पहले और सम्पननता पीछे- पीछे " ने दुनिया में खुद को अलग दिखाना शुर कर दिया है। इस अवसर पर मोदी जी ने अपने भाषण में कहा कि " भारत में महिलाएं शक्ति का अवतार मानी जातीं हैं और हम अपने विकास के लिये महिला सशक्तिकरण पर भरोसा करते हैं।" इवांका ने भी बड़ा अच्ह भाषण दिया। उन्होंने कहा कि " महिलाएं दुनिया भर में विपरीत परिस्थतियों का मुकाबला कर रहीं हैं।" उन्होंने महिला उद्यमियों के लिये दुनिया भर में बेहतर अवसरों का आह्वान किया। गंका ट्रम्प ने कहा कि " जब महिलाएं सशक्त होंगी तभी हमारा परिवार , हमारा समाज , राष्ट्र ओर हमारी अर्थ व्यवस्था सशक्त होगी। " उन्होंने कहा कि " हमारे पिताजी के चुनाव के बाद हमने देश की सेवा के लिये , महिलाओं सहित सभी अमरीकियों को सशक्त बनाने के लिये- सफल बनाने के लिये अपना व्यवसाय छोड़ दिया। " उन्होंने कहा कि यदि भारत श्रमिक लिंग भेद को आधा भी खत्म कर दे तो अगले तीन साल में यहां की अर्थ व्यवस्था में 150 अरब डालर का विकास हो जायेगा। लगता है कि इंवांका ने सबकुछ ठीक ही कहा है पर आंकड़ों की जरा जांच कर लें तो अछच होगा। नासकॉम की रपट के मुताबिक भारत में 5000 स्टार्टअप्स में महिलाओं की भागी दारी फकत 11 प्रतिशत है। यही नहीं जिन स्टार्टअप्स को शेयर पूंजी से चलाया जा रहा है उनमें महिलाओं की भागीदारी केवल 3 प्रतिशत है। अतएव महिला उद्यमिता में ठोस परिवर्तन करने की जरूरत है। यहीं आकर महिला उद्यमियों के इस शानदार सम्मेलन में आन - बान - शान के साथ इवांका की मौजूदगी का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इस मोड़ पर आकर लगता है कि महिला उद्यमी सम्मेलन में प्रतीक चिन्ह के तौर पर इवांका को आमंत्रित कर गलती की है भारत ने। यही नहीं इवांका ने खुद को  महिला सशक्तिकरण का चैम्पियन घोषित किया है यहां यह याद रखना होगा कि वे राष्ट्रपति की पुत्री हैं और इसी के कारण वे वर्तमान पद  कायम हैं। दुर्भाग्यवश उन्होंने महिलाओं की दशा सुधारने के लिये कुछ नहीं किया है। यही नहीं वे अमरीका की कुछ महिला विरोधी नीतियों का हिस्सा रहीं हैं। अमरीका में इस बात पर तीखी बहस है कि  अमरीका में लिंगभेद को कम करने के प्रयासों के दौरान इवांका का भाषण एक तरह से उनका दोमुंहांपन है। सितम्बर में इवांका ने एक बयान जारी कर कहा था कि नस्ल , जाति और लिंग के वेतन हासिल पाने के आड़े एकत्र करने के लिये अन्हें सौ से ज्यादा लोगों की जरूरत नहीं है। उन्होंने दावा किया कि ओबामा शासन द्वारा लागू यह योजना इच्छित परिणाम नहीं दे सकी। एक तरफ वे लिंग समानता की वकालत करलती हैं दूसरी तरफ यह महनने से इंकार कर देती हैं कि वेतन में लिंग भेद कायम है। अमीर और सफल पेशेवर के तौर पर एक ब्रांड  इवांका की सर्वोच्च प्राथमिकता है। पिता डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा कई महिला विरोधी नीतियों को लागू किये जाने पर उनकी चुप्पी सबकुछ बता चुकी है कि वे असल में क्या हैं। फॉर्चून पत्रिका ने अपने सितम्बर के अंक में लिखा था कि " इवांका ने हमें बता दिया है कि वह क्या है और बहुत दुख से हमने सीखा है कि हम उनपर विश्वास नहीं कर सकते। " न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है कि इवांका कभी भी सीधी नहीं चलने वाली। यह उनकी फितरत ही नहीं है। वे एक आदमी से ज्यादा एक प्रतीक चिन्ह हैं।

 इन सब तथ्यों से हम दो निश्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इवांका को महिला सशक्तिकरण के अपने वायदे पर भरोसा नहीं है। अतएव महिला सशक्तिकरण के सम्बंध में उनके सारे बयान व्यर्थ हैं। कई लोग कहते हैं कि वे नकली महिलावादी हैं, यह कथन सही लगता है। दूसरी तरफ अगर यह सही नहीं हे तो इवांका मे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर प्रभाव डालने और उनसे नीतियां बदलवाने की क्षमता नहीं है। अगर उनमें राष्ट्रपति से नीतियां बदलवाने की क्षमता होती या अपने आदर्श उनके मायने रखते तो वे कबका स्वतंत्र रूप में काम करना शुरू कर चुकी होतीं। राष्ट्रपति की आर्थिक सलाहकार कौंसिल के सदस्य एलन मस्क का उदाहरण सबके सामने है। अभी भी भारत का यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि ग्लोबल सममेलन में उन्होंने भारतीय उद्यमियों को क्या संदेश दिया है। लेकि एक बात तो स्पष्ट हे कि इवांका को आमंत्रित कर भारत ने महिला सशक्तिकरण को गलत संदेश दिया है।