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Monday, September 18, 2017

त्योहारों को आनंदायी बनाना समाज का कर्तव्य है

त्योहारों को आनंदायी बनाना समाज का कर्तव्य है

कल के बाद नवरात्री  का आरम्भ हो जाएगा. देवी पक्ष का आगमन. वर्ष  का यह एक ऐसा समय है जब देश के लगभग हर बड़े शहर का एक हिस्सा अलग दुनिया में बदल जाता है. वैसे तो साल भर इन इलाकों में या तो गरीब कामगार लोग रहते हैं या छोटी मोटी  दुकानें, फुटपाथी बाज़ार होते हैं या मोटरों का शोर भरा रहता है. पर जैसे ही देवी  पक्ष के आगमन की बात आरम्भ होती है ये इलाके  रचनाशीलता  के ख़ास दौर से गुजरने लगते हैं. महालय के कुछ पहले तो माँ दुर्गा की मूर्तियाँ निर्माण और समय के बदलते दौर कि प्रतिछवि बन जाती हैं. बांस के ढाँचे और पुआल की देह से आरम्भ हो कर माटी  और रंगों से सजती दुर्गा की प्रतिमाएं हर हिन्दू को हाथ जोड़ने के लिए विवश कर देती हैं. सबसे बड़ी बात है कि फूटपाथ पर निर्माण के विभिन्न चरणों में खड़ी इन मूर्तियों की  शारीरिक बनावट देख कर किसी को ऊब नहीं होती ना किसी को कोई आपत्ति. अगर इसपर कोई सवाल उठाने की कोशिश भी करता है तो उसे डपट कर चुप कर दिया जाता है. किसी भी संप्रदाय की किसी भी धार्मिक भावना को इन मूर्तियों की  मौजूदगी से कोई दिक्कत नहीं होती.ना हिंदू  धर्मावलम्बी नज़रें झुकाते हैं ना मुस्लिम समुदाय के लोग कोई टिपण्णी करते. सब उन प्रतिमाओं को समान आदर देते हैं.

   लेकिन इससे अलग जब भी कोई बात होती है तो देविओं और लड़कियों को अलग अलग खांचे में रख कर देखा जाने लगता है. इसका मतलब है कि कहीं न कहीं हमारी नज़र या दिमाग में कुछ न कुछ गड़बड़ है. आप संग्रहालयों में नग्न मूर्तियाँ देखिये, खजुराहो के भित्तिचित्रों को देखिये कहीं नहीं महसूस होता है कि हम न्यूड विग्रह  देख रहे हैं.  इतिहासकार चम्पक्लक्ष्मी ने दक्षिण भारत की  कांस्य चित्रकारियों में  भिक्षतना को माहेश्वर  शिव के नग्न स्वरुप से परिभाषित किया है.इसका उल्लेख आगमों और पुराणों में भी है. किसी को कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि ऐसा नज़रिया हमारे पारंपरिक जीवन का अंग रहा है.

        पर अचानक क्या हो गया इस देश में कि कहीं पहलु खान कि ह्त्या होती है तो कारवां ए मुहब्बत कारवां निकलता है, कहीं झूठे आरोपों में पुजारी राजेन्द्र पंडित को सरे बाज़ार नंगा कर घुमाया जाता है और न्याय की मांग होती है , कहीं लड़कियों के लिबासों पर फब्तियां कासी जाती हैं तो कहीं असहिष्णुता के बड़े बड़े नारे लगते हैं. लगता है कि नफरत और भेदभाव हमारे देश के वर्तमान की सामान्य बात हो गयी है.

ऐसा क्यों?

केवल इस लिए कि लोकतंत्र की तरफदारी के लिए भावनाओं को आघात पहुंचाने के अभ्यास ने मानवता की सीमाओं को लांघ दिया है तथा पारंपरिक धार्मिक परिवृतों के आसपास मंडरा रहा है. यही कारण है जब दोनों समुदाय के पर्व एक दिन आते हैं तो ख़ास किस्म का डर चरों तरफ कायम हो जाता है.  ध्यान रखें आज केवल वही पवित्र है जो पूजा घर में या मंदिर के गर्भगृह में है या पीपल के नीचे है बाकी कहीं कुछ नहीं है. कोई भी ऐसी प्रतिमा जो धार्मिक रीति रिवाजों से अलग है वह पवित्र नहीं है. सोचें कि पूजा के वक़्त कोलकता  के अखबारों में दुर्गा कि प्रतिकृति के साथ तरह तरह के विज्ञापन या, दक्षिण भारत में गणेश बीडी का रैपर या इस तरह की  ढेर सारी वस्तुएं किसी तरह की धार्मिकता का संचार नहीं करती. इसपर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती. पर इससे अलग ज़रा सी धार्मिक तरफदारी पर क्यों तन जा रहीं हैं मुट्ठियाँ? इसका कारण है धर्मं का राजनीति के लिए इस्तेमाल. यह आज हमारे देश में धीरे धीरे भयानक होता जा रहा है जो देश के विकास के लिए खतरनाक है और अगर इसे नहीं रोका गया तो यह शीघ्र ही हमारे पारंपरिक प्रतीकों कि ओर भी मुड़ सकता है. यह मान  कर चलें कि सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है. देश में पारम्परिक त्योहारों को अगर आनंददायी बनाना है तो धर्म और सियासत के इस मेल को रोकना होगा. चाहे आदमी  किसी सम्प्रदाय का हो अपने  समाज और परिवारों को बचाना उसका सबसे पुनीत कर्तव्य है. हुकूमत को इसमें दखलंदाजी ना करने दें.

तवाइफ़ कि तरह अपनी गलतकारी  के चेहरे पे

हुकूमत मंदिर और मस्जिद का पर्दा डाल देती है. 

Sunday, September 17, 2017

विकास के नाम पर यह शोषण क्यों?

विकास के नाम पर यह शोषण क्यों?

 शहर कोलकाता में इस हफ्ते पेट्रोल 73 रूपए प्रति लीटर से ऊपर मूल्य पर बिका , खबर है कि मुंबई में यह 79 रूपए से ज्यादा महँगा मिला और दिल्ली में इसका मूल्य 70 रूपए प्रति लीटर था. तेल एक ऐसी ज़रुरत है जो विकास कि धमनियों  में बहता है और उपभोक्ता मूल्य इससे निर्देशित होते हैं. यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि हम भारतवासी इतने महंगे तेल का उपयोग करते हैं. लेकिन आप पूछेंगे कि यह गर्व का विषय क्यों है? अब सोचिये कि अगस्त 2014 में जब पेट्रोल का मूल्य 70रूपए से ऊपर था तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल का मूल्य 103.86 डॉलर यानि 6326.11 रूपए था और आज सितम्बर 2017 में कच्चे तेल का मूल्य 53.39 डॉलर यानि 3418 रूपए है. हल में पेट्रोलियम मंत्री धरमेंद्र प्रधान ने कहा था कि “ तेल की कीमतों में रोजाना समीक्षा  - संशोधन उपभोक्ताओं के हित में है.” अब यह कैसा हित है कि भारतीय नागरिक लगभग उतना ही मूल्य चुका रहे हैं जितना 2014 में चुका रहे थे. जबकि कच्चे तेल का मूल्य 85 प्रतिशत कम हो चुका है. नरेन्द्र मोदी के राज में विगत डो दशकों का आर्थिक सुधार राष्ट्रवादी के कर्तव्य जैसे मुहावरों में शामिल हो गया है.इस राज में मध्यम वर्गसे  राष्ट्र हित में  सब्सीडी त्यागने कि अपेक्षा की जा रही है. सरकार का यह मानना है कि क्व्हुंकी मध्य वर्ग को सब्सीडी दी जा राही है इसलिए देश विकसित  नहीं हो पा रहा है. अब भगवान् बचाए भारतीय मध्य वर्ग को आज घुटी घुटी आवाज में सब्सीडी कि मांग कर रहे हैं. क्योंकि येही लोग भारत को विकसित नहीं होने देने के जिम्मेदार हैं. यह बात दूसरी है कि हमारी सब्सीडी बमुश्किल ग्लोबल स्टैण्डर्ड से बराबरी कर पाती है. आज ये “ सब्सीडी के भूखे , मुफ्तखोर राष्ट्रविरोधी ”  मध्यवर्गीय लोग जब अपनी स्कूटी में सरकारी पेट्रोल पम्प से तेल डलवाते हैं तो एक सवाल पूछ ही सकते हैं कि जब सरकार 31 रुपये लीटर तेल खरीदती है तो हम उसी तेल के लिए 73 रूपए या 79 रूपए क्यों दें? कच्चा तेल जो सरकारी रिफाइनरीज में जाता है उसपर लागत ( सितम्बर 2017 के मूल्य के आधार पर)  आती है महज 21.50रूपए, टैक्स , दुलाई , कमीशन इत्यादि मिलाकारे 9.34 रूपए आते हैं. इसका मतलब है कि सब मिलाकर पेट्रोल की बेसिक कीमत 30.84 रूपए आती है. बाकी सब टैक्स है. वाह रे भारत का गौरव शाली मध्य वर्ग जो पेट्रोल के हर लीटर पर 48.30 रूपए टैक्स देता है. नवम्बर 2014 से अबतक सरकार ने फकत आबकारी शुल्क में 126 प्रतिशत इजाफा किया है. हालांकि यह लाखों किसानों द्वारा उपयोग में लाये  जाने वाले  डीजल के 374% डियूटी से कम ही है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस साल के अपने बजट भाषण में कहा था कि “ हम लोग व्यापक रूप से टैक्स का नहीं अनुपालन करने वाले लोग हैं .” ये उन लोगों के बारे में बोल रहे थे जो प्रत्यक्ष कर नहीं चुकाते. अब कौन लोग उनके दिमाग में थे यह कहना मुश्किल है. लेकिन यकीनन  वह मध्य वर्ग तो नहीं होगा. क्योकि मध्ज्य वर्ग बहुत बड़ा हिस्सा तो वेतन भोगी है. उसके वेतन से ही टैक्स ले लिया जाता है. लेकिन अगर हम जेटली कि बात का भरोसा करे भी लें तो अब वह समस्या सुलझ गयी. क्योंकि नोट बंदी  के बाद तो नगदी को छिपा लेने कि समस्या ख़त्म हो गयी. अगस्त में इनकम टैक्स फ़ाइल करने वालो कि संख्या में 25 प्रतिशत वृद्धि हुई है और अग्रिम कर भुगतान 41% बढ़ गया है. मध्य वर्ग को तो जेटली कि बात पर पूरा भरोसा है लेकिन सवाल है कि सकल ग्फ्हरेलू उत्पाद कि डर क्यों घट रही है. अब इस मामले में अमित शाह बताते हैं कि यह टेक्नीकल कारण है. अब भारत का मध्य वर्ग डरपोक है उसे दोनों तरफ से डर लगता है वह ना सरकार से कठिन प्रश्न पूछ सकता है और ना अपने समाज में खुल कर बोल सकता है. मुह खुला नहीं कि मोदी भक्त गलियों कि बौछार कर देंगे. लेकिन ज़रा सोचिये कि लोग जब प्रत्यक्ष टैक्स देने लगे हैं, काला धन का  उत्पादन नहीं के बराबर है और कारोबार डिजिटल हो गया है तो क्या सरकार को इंधन की कीमत पर 79 प्रतिशत तक टैक्स लगाने का नैतिक अधिकार है? सरकार का कहना है कि विगत तीन वर्षों में अर्थ व्यवस्था कि सारी समस्याएं हल कर ली गयी हैं तो एक बाप सुबह सुबह अपनी बेटी को जब मोटर साइकिल से स्कूल पहुंचाने जाता है तो पेट्रोल 79% टैक्स क्यों दे? एक किसान जो रबी कि बुवाई के पहले नोट बंदी कि घोषणा से आयी मुश्किलों  से निपटने के लिए जूझ रहा है तो वह ट्रैक्टर के उप्य्तोग के लीयते डीजल क्यों महँगा खरीदे? अमीरों कि एस यू वी और लाइमोजिन की कीमतें घट  रहीं हैं और गरीबों के ट्रैक्टर या मोटर साईकिल में डाला जाने वाला तेल महँगा हो रहा है. सरकार  को विकास के नाम पर एक वर्ग के शोषण का नैतिक अधिकार नहीं है. जबसे यह सरका सत्ता में आयी है इसकी हर नीति गरीबों पर प्रहार कर रही है.             

Friday, September 15, 2017

जापान की बुलेट ट्रेन और भारत की पटरियां   

जापान की बुलेट ट्रेन और भारत की पटरियां   

गुरुवार को भरात के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और जापान के प्रधान मंत्री शिंजो आबे  में 1 लाख 10 हज़ार करोड रूपए की लागत से बनने वाले बुलेट ट्रेन चलाने पर एक समझौता हुआ. यह ट्रेन अहमदाबाद से मुंबई के बीच चलेगी. अभी इस समझौते के हस्ताक्षर कि स्याही सूखी भी नहीं थी कि जम्मू तावी – नयी दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस पटरियों से उतर गयी. विगत 27 दिनों में यह नौवीं ट्रेन दुर्घटना थी. यह बताती है कि पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों की  संख्या और सुरक्षा स्तर में तालमेल नहीं है. भारतीय रेल दुनिया की सबसे बड़ी यातायात प्रणाली है. इससे रोजाना 2 करोड़ 30 लाख लोग सफ़र करते हैं. इस प्रणाली में 2016- 17 में 78 दुर्घटनाएं हुईं  और इसमें 193 लोग मरे गए.लोक सभा में 19 जुलाई 2017 को  एक प्रश्न के उत्तर में बताया गया कि इस वर्ष के पहले 6 महीनों में 29 दुर्घटनाएं हुईं जिनमे 20 घटनाएं पटरियों से उतरने की थीं  और इनमें से 39 लोग मारे गए और 54 घायल हो गए. विगत एक दशक में 1394 दुर्घत्र्नायें हुईं जिनमें से 51 प्रतिशत घटनाएं पटरियों से उतरने की थीं जिनमें  458 लोग मारे गए. रेलवे सुरक्षा पर स्थायी समीति कि 12वीं रिपोर्ट 14 न्दिसम्बर 2016 को लोक सभा में पेश की गयी थी. उस रिपोर्ट के मुताबिक़ दुर्घटना का सबसे बड़ा कारण ट्रेनों का पटरियों से उतरना और इसके लिए मानवीय गलतियाँ सबसे बड़ा कारण हैं. ऐसी स्थिति में जापान ने भारत को  बुलेट ट्रेन चलाने की  तकनीक साझा करने कि सहमती दी है. इससे चिढ कर चीन के प्रधान मंत्री शी जिनपिंग ने कहा है कि वह भी अपनी तेज गति वाले ट्रेन की तकनीक का विपणन कर रहा है.2022 में जब भारत अपने जन सान्खियिकी लाभ के शीर्ष पसर होगा और प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के “ मेक इन इंडिया “ के प्रचार का आर्थिक लाभ होने लगेगा तो उसी वक्त भारतीय रेल  का भविष्य अध्ययन का सबसे बड़ा विषय होगा.

भारत में ट्रेन दुर्घटनाओं के दो  कारण हैं , पहला कि पटरियों  पर ट्रेनों का आवागमन बहुत ज्यादा है और दूसरा कि उसके ढांचे पर कम से कम खर्च किया जाता है.गौर करें सवारी गाड़ियों के आवागमन में विगत 15 वर्षों में 56 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इसी अवधि में माल गाड़ियों की संख्या में 59% कि वृद्धि हुई है. लेकिन इसी अवाधि में पटरियों कि लम्बाई में महज 12 % वृद्धि हुई है. यानी 15 वर्षों में रेल पटरियों कि लम्बाई 81,865 से बढ़ कर 92081 हुई.  अभी हाल में उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक गोपाल गुप्ता ने एक रिपोर्ट में कहा कि रेल पटरिओं का ख़राब होना और उनका ज़रुरत से ज्यादा उपयोग किया जाना ही दुर्घटनाओं का कारण है ना कि विस्फोटक. यही नहीं भारत के ट्रेनों के अधिकाँश पथ गंगा के मैदान से गुजरते हैं और इन पथों पर जितनी ट्रेनें चलती हैं वह सब अगर अपने समय से चलें तो जो समन्वित भीड़ होगी उसे संभाल पाना वर्तमान व्यवस्था  के वश में नहीं है. दुर्घटना होनी ही है. रेल अधिकारी ट्रेनों को सिग्नल पर रोक कर इस समस्या का समाधान करते हैं. वैज्ञानिक पत्र “ फिजिका “ के अनुसार ट्रेनों को रोके जाने के कारण गाड़ियां विलम्ब से चलती हैं और ट्रेन के ड्राइवर से यदि सिग्नल के अनुपालन में ज़रा भी गलती हुई तो दुर्घटना निश्चित है.

राजनितिक लाभ के लिए हर साल नयी ट्रेनों को चलाने कि घोषणा  कर दी जाती है जबकि पटरियों – पथों पर दवाब पहले से बना हुआ है. नयी ट्रेनों से दबाव और बश जाता है ऐसे नयी ट्रेनों की घोषणा को रोका जाना चाहिए. भारत में ट्रेनों कि औसत रफ़्तार 60 – 70 कि मी प्रति घंटा है. शायद ही कोई ट्रेन 130 कि मी अधिकतम रफ़्तार तक पहुच पाती है. ऐसे में 300 कि मी प्रति घंटे से ज्यादा तेज चलने वाली बुलेट ट्रेन की क्या दशा होगी यह आसानी से समझा जा सकता है. यही नहीं, बुलेट ट्रेन के लिए 1 लाख 10 हज़ार  करोड़ रूपए जापान दे रहा है. इसपर 8 करोड़ रूपए मासिक व्याज लगेगा. अब एक ऐसे देश में जहां 13 करोड़ लोग 200 रूपए रोजाना कमाते हैं वहाँ व्याज की यह डर क्या व्यावहारिक है और वह भी एक ऐसी ट्रेन परियोजना के लिए जो अपनी गति का लक्ष्य कभी हासिल नहीं कर पाएगी. क्या सरकार किसी जंग की तैयारी कर रही है या दिवालिया होने की ?  ऐसे बहुत से सवाल हैं जिसका सामना मोदी सरकार को करना होगा. 

Thursday, September 14, 2017

दोष तो हमारा भी है

दोष तो हमारा भी है

पिछले कई दिनों से राम रहीम सिंह  का मसला अखबारों का मसाला बना हुआ है. इसके पहले आशाराम बापू का था. उसके पहले भी कई बाबा और साधु – साधुनिआं  भी खबर बन चुकीं हैं.   राम रहीम सिंह के बारे में सी बी आई जज जगदीप सिंह ने कहा था कि “ वह जंगली जानवर ( वाइल्ड बीस्ट ) की तरह काम करता था.” लेकिन जंगली जानवरों का एक कायदा होता है कि वह भूख लगने पर या उकसाए जाने पर ही हमला करता है. ये ना झूठ बोलते  हैं, ना कभी ठगते हैं ना शोषण करते हैं. लेकिन जैसे जैसे खबरें बहार आ रहीं हैं गुरु राम रहीम सिंह जानवर से भी ज्यादा खतरनाक दिखने लगे है. वह मनोवैज्ञानिक तौर पर रोब  गांठने  में भी गुरु था. जेल से मिल रही ख़बरों के अनुसार राम रहीम वहाँ अवसाद, चिडचिडापन , बेचैनी और दुविधा का शिकार हो गया है. डाक्टरों के अनुसार यह काम व्यसन ( सेक्स एडिक्शन ) के कारण हुआ है. इसके अलावा भी बहुत कुछ है पर उसके आश्रम स्व जो वस्तुए बरामद हो रहीं हैं जैसे कलाशिनिकोव कि मगज़ीन के खोल, अनगिनत अस्थि पंजर टनों पटाखे और बारूद का कारखाना इनके बारे में क्या सफाई हैं. बाबा या उनके दंगाई शिष्यों के पास इनके लिए कोई कैफियत है? अब हिन्दू संतों कि सर्वोच्च संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् ने सरकार से अनुरोध किया है कि इन स्वयंभू गुरुओं के खिलाफ क़ानून बनायें. परिषद् ने 14 नकली बाबाओं कि सूची भी जारी की है. इनमे गुरमीत , नारायण साईं , राधे माँ, ॐ बाबा, निर्मल बाबा इत्यादि शामिल हैं. परिषद् ने ऐसे बाबाओं से सावधान रहने को कहा है. सबसे बसी बात है कि इन अध्यात्मिक ठगों से निपटने के लिए भारत में कोई क़ानून है नहीं. भारत में ठगी के लिए क़ानून तो है पर ये उससे ज्यादा बड़ी ठगी करते हैं . इनकी ठगी में वायदे और धन के अलावा भी बहुत कुछ होता है. आध्यात्मिक ठगी का इससे कुछ नहीं किया जा सकता है. इसके अलावा बहुत से भगत तो इन गुरुओं पर स्वेच्छा से दौलत न्योछावर करते हैं और बिला शक ओ शुभा के उनकी बातों को सुनते हैं और उनपर अमल करते हैं. अब कैसे प्रमाणित होगा  कि वे ठगे गए हैं. जबतक ये गुरु ह्त्या ना करें नया बलात्कार ना करें तबतक इन्हें क़ानून के दायरे में लाना कठिन है. दरअसल भगवद्भक्ति का यह पूरा बाज़ार लोकास्था प्रणाली पर कायम और चल रहा है. बाबाओं के इस आकस्मिक बाढ़ में क़ानून केवल सावधान रहने कि हिदायत देने के अलावा कुछ नहीं कर सकता है. ये बाबा रहस्यमय सिद्धियों का दावा करते हैं और उनकी पीड़ा को दूर करने के लिए अतार्किक समाधान सुझाते हैं. इन बाबाओं ने न केवल हमारे देश के विकास की घडी को बल्कि विश्व के विज्ञान कि घडी को भी उलटा घुमा दिया है. अब राम रहीम सिंह नकी ही बात करें तो उसने क़ानून से बचने के उद्देश्य से व्यापक भक्ति और आदर के प्रसार में विगत 15 साल से लगा था. हरबार वह वह कोई घृणित अपराध करता और जनसेवा या सार्वजानिक रहत कार्य कि नाद में उसे छुपा देता. सन 2000 में खबर आयी कि उसने अपने 400 शिष्यों का जबरन बंध्याकरण किया है , 2001 में ओडिशा के तूफ़ान पीड़ितों के रहत कार्य में यह छिप , इसीतरह 2002 में एक पत्रकार से बलात्कार का मामला उठा और इसने 2003 में इतना बड़ा शिविर लगाया कि वह विश्व रिकार्ड बन गया. वह ये चक्कर चलाता रहता था.

इसमें हमारी सबसे बड़ी गलती है कि हम एक  जनसमुदाय के तौर पर इस भगवान् गिरी के झांसे में आ जाते हैं. इनके दर्शन से सुख पाने लगते हैं. बेशक हमारेव समाज के कुछ लोगों में इनके प्रति क्षोभ की अन्तर्धारा  प्रवाहित होती रहती हगे पर वे असमर्थ हो जाते हैं. पिछले महीने में डेरा को लेकर दंगे हुए. हम सवाल पूछते हैं कि सरकार क्यो नाकामयाब हुई इस राज्य में? अब कौन बताये कि वहाँ के राजनीतिग्य डेरा कि म्नादाद से ही चनाव जीतते हैं. धर्म के इस बाज़ार में जो हैसियत ये बना लेते हैं वह सामजिक क्षति तथा लोकतान्त्रिक मूल्यों का प्रतिगामी होता है. इसलिए एक समाज के रूप में हमारा दोष है कि हम आस्था में अंधे होकर इनके पीछे चलने लगते हैं. इससे समाज को बचाना जरूरी है .                       

Wednesday, September 13, 2017

हिंदी : एकबार वैचारिक स्वाधीनता संघर्ष ज़रूरी  

हिंदी : एकबार वैचारिक स्वाधीनता संघर्ष ज़रूरी  

आज हिंदी दिवस है. कहने को तो हिंदी हमारे देश की भाषा है पर इसे अपनाने को लेकर काफी असुविधाएं हैं. अगर अन्यथा ना लें तो कहा जा सकता है कि इस असुविधा के लिए हमारी अबतक की  सरकारें ही दोषी रहीं है और आज भी हैं. इसे तकनीकी तौर पर राजभाषा कहते हैं. शायद आपको मालूम हो कि ना हो , भाषा किसे कहते हैं? भाषा वाचिक ध्वनि से शब्दों के अवगुंठन में  विचारों की  अभिव्यक्ति का साधन है. या कह सकते हैं कि भाषिक संचार की  प्रणाली है भाषा. अब इसे राज भाषा बनाने या कहने के पीछे नकारात्मक और सकारात्मक दोनों कारण है. 60 के दशक में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया. भारत बहुभाषिक देश है और इसकी समस्त भाषाएँ कही ना कहीं संस्कृत से जुड़ी हैं या कह सकते हैं कि संस्कृत उनकी गर्भनाल है. औपनिवेशिक काल में साज़िश के तौर पर संस्कृत को क्लिष्ट और प्राचीन भाषा कह कर हाशिये पर ला कर पटक दिया गया. अंग्रेजी अर्थकरी थी , आकाओं की  भाषा थी विकसित  होती गयी. आज़ादी  के बाद जो विशिष्टावादी थे उन्होंने अंग्रेजी को कायम रखने की कोशिश की. देश में राजनितिक परिवर्तन के बाद भाषाई बवंडर खडा होने लगा. वक्त के नेताओं ने दोनों को कायम रखा जो आजतक कायम है. हिंदी अभीतक रोजगार की  भाषा नहीं बन सकी इसलिए उसकी दुरावस्था कायम है.

सोचिये कि आज़ादी के 70 वर्षों के बाद भी शिव के तीन नामों को अंग्रेजी में लिख कर कोई करोडो पीट लेता है और कोई विष्णु के सहस्त्र नाम हिंदी में लिख कर उसे प्रकाशित करने के लिए घूमता रहता है.

इस दुरावस्था की  मनोवैज्ञानिक ,समाजशास्त्रिय और दार्शनिक व्याख्याएं भी है लेकिन सबसे व्यवहारिक इसके भीतर निहित ऊर्जा है. निसंदेह हिंदी के मूल संस्कृत से जुड़े हैं जो हज़ारों वर्ष पुरानी भाषा है पर एक स्वतंत्र भाषा के तौर पर हिंदी की उम्र बहुत कम है. यह एक मात्र ऐसी भाषा है जिसने  अपनी  छोटी उम्र में ही दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य की नीव को झकझोर दिया. इतने ही कम समय में इसने भारतीय मनुष्य, उसकी मनीषा  और उसके  आत्मबोध से वह सम्बंध स्थापित कर लिया जो  राष्ट्रीय चेतना का पर्याय बन  गया। हिंदी चूँकि संस्कृत से जुड़ी है इसलिए यह केवल भाषा ना होकर एक संस्कृति की स्मृति  का स्वप्न भी है. हमारी स्मृतियाँ  पश्चिमी सभ्यता और अध्ययन विधा के अनुरूप अतीत की भांति व्यतीत नहीं है यह अतीत का आगे बढ़ता हुआ वर्तमान है. यही कारण है कि हमारी स्मृतियाँ इतिहास की झंझा से तहस नहस नहीं हुईं. हीगल और मैक्समूलर जैसे इन्डोलोजिस्ट  स्वर्णयुग के हमारे इतिहास को खंडहरों में दफन एक काल बताने की कोशिश करते रहे और वैज्ञानिक प्रमाणों ने दिखाया कि

पुरन्दर ने पवि से लिखा है , अस्थि युग का मेरा इतिहास

सिन्धु सा विस्तृत और अथाह , एक निर्वासित का उत्साह

दे रही अभी दिखाई भग्न , मग्न वह रत्नाकर में राह

हमारे पूर्वजों ने खास कर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने उन इन्डोलोजिस्टों को बताया कि हमारा भारत कोई ग्रीक या रोमन सभ्यता के अवशेष नहीं है यह एक जीवित संस्कृति है हमारी भाषा जीवित मन्त्र है और हमारी लिपि ब्रम्हांडीय प्रकाश तरंगों का दृश्यात्मक अपौरुषेय स्वरुप है. जिन संगीतमय तत्वों को हमारे ऋषियों हज़ारों साल पहले समझ लिया था उसे आज के भौतिक शास्त्री विज्ञान के माध्यम से समझ रहे हैं. विख्यात इतिहासविद ए एल बषम ने अपनी पुस्तक “ वंडर दैट वाज इंडिया” में लिखा है कि “ प्राचीन भारत की महत्तम उपलब्धियों में से एक उसकी विलक्षण वर्णमाला है.” जिस भाषा की  वर्णमाला इतनी विलक्षण है उस भाषा कि ऊर्जा का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है. हिंदी की ऊर्जा का आकलन करने के बाद आतंकित मेकॉले ने कहा था कि “ वैचारिक स्वतन्त्रता कि जडें हिंदी में निहित हैं और इसलिए ज़रूरी है कि इन जड़ों को उखाड़ कर ही अंग्रेजी को विक्सित किया जा सकता है.” हिंदी हाशिये पर चली गयी और ऐसी साजिश रची गयी कि आम भारतीय अंग्रेजी के चश्मे  से हिंदी को देखने लगा. नतीजा यह हुआ कि जब हिन्दी कि बात होती है तो हमारे विद्वान उसे संस्कृत से जोड़ कर व्याख्यायित करने लगते हैं. वक़्त के हाकिमों को बहाना मिल जाता है और हिंदी को अवरुद्ध करने के लिए तरह तरह के बहाने गधे जाने लगते हैं. इसके विपरीत सच तो यह है कि हिंदी जिसे हम कड़ी बोली कहते हैं आधुनिकतम भाषा है. अधिकांश हिदी साहित्य की रचना हुई है,  महज डेढ़ – पौने दो सौ साल पुरानी है. गुप्त जी से लेकर निराला जी तक लेखकों और  कवियों को अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने के लिये स्वयं कि काव्यात्मक भाषा खुद गढ़नी  पड़ी थी. यानि इसका इतिहास दो सौ साल से भी कम है.अब इसकी ऊर्जा का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इतनी कम अवाधि में इसने अपना संवेदनात्मक तंत्र विकसित कर लिया.इतनी समेवेदनशील और उर्जस्व भाषा पर बात करने के लिए साल में महज 15 दिन हम बहस करते हैं. आयोजन करते हैं और उसके विकास कि बात करते हैं. है। जिस भाषा ने भारतीय स्वतंत्रता चेतना का प्रतिनिधित्व किया वही भाषा  स्वतंत्रता के70 साल बाद भी गंभीर हीनभावना से मुक्त नहीं हो पायी है. भाषा सरकारी अनुदानों कि बैसाखियों पर नहीं चलती है और ना आयोजनों में आत्म प्रशासाओं के बल पर विकसिट  होती है. इसकी संजीवनी शक्ति का स्त्रोत ऊपर से नहीं नीचे से ऊपर की  ओर जाता है. इसकी शक्ति का केंद्र वहाँ है जहां समाज के संस्कार और स्मृतियां वास करती हैं. हिंदी कि उय्र्जा का यही कारण है . हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसके दसो सतह हैं. एक वह जो हम बोलते हैं ,जिसके माध्यम से हम संवाद करते हैं और दूसरा वह जो भाषा का आत्यंतिक तात्विक स्वरुप है जो सतह के नीचे वास करता है और हमारे बोले हुए शब्दों में प्रतिध्वनित होता रहता है. औपनिवेशिक काल में इसी सतह को ख़त्म कर देने की  कोशिश की गयी. हिंदी का यह सनातन स्त्रोत धीरे – धीरे सूखता चला गया. नतीजतन  हमारी शिक्षा पद्धतियों और हमारे कार्यकलापों में हिंदी भाषा गौण हो  गयी। पराधीन भारत में देश की चेतना का आज कि बौद्धिक दासता  से तुलना करें तो महसूस होगा कि  उस समय हम ज्यादा आजाद थे। हमारी भाषा में हमारा विश्वास और उससे प्यार कहीं ज्यादा गहरा था. आज जिस तरह हम हिंदी के विकास की बात करते हैं उससे लगता है कि हमें अभी वैचारिक स्वाधीनता हासिल नहीं हुई है. इस स्वाधीनता के लिए एक बार फिर संघर्ष करना होगा.