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Sunday, February 21, 2010

'जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास।'

वह कौन रोता है वहां
वह कौन रोता है वहां,
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है,
नौजवानों के लहू का मोल है!
भारत में लोकतंत्र की सबसे बड़ी पैरोकार माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के अत्यंत परिपक्व नेता और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने ई एफ आर के स्पेशल आई जी को फकत इसलिये सस्पेंड करने का हुक्म दे दिया कि उन्होंने मुख्य मंत्री की व्यवस्था के खिलाफ जबान खोली थी। हैरानी तो तब होती है जब दुनिया की सबसे ताकतवर ब्यूरोक्रेसी में से एक भारतीय अफसरशाही के किसी भी सदस्य ने इसका विरोध नहीं किया। ई एफ आर के स्पेशल आई जी ने केवल यही तो कहा था कि शिल्दा में, जहां ई एफ आर के कैम्प पर माओवादियों ने हमला कर 24 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था, कैम्प गैरपेशेवराना तरीके से लगाया गया था और उनकी आपत्ति नजरअंदाज कर दी गयी।
पुलिस अफसर पर इस तरह की दमनात्मक कार्रवाई दरअसल माओवादियों को प्रोत्साहन है। नक्सलवाद को लेकर सरकार अब तक जिस तरह राजनैतिक रोटी सेंकती रही है वह आम जनता समझती है । नौकरशाह यानी वास्तविक नीति नियंताओं के बीच जनता के कितने हितैषी हैं, ऐसे चेहरों को भी आज जनता पहचानती है। उन्हें समय पर सबक सिखाना भी जानती है पर नक्सलवाद का सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि उसके परिणाम में केवल गरीब, निर्दोष, आदिवासी और कमजोर व्यक्ति ही मारा जा रहा है । इसमें राजनैतिक हत्याओं को भी नकारा नहीं जा सकता जिन्हें कई बार इनकाउंटर घोषित कर दिया जाता है।
जो आप तो लड़ता नहीं ,
कटवा किशोरों को मगर
आश्वस्त होकर सोचता ,
शोणित बहा, पर गयी बच लाज सारे देश की।
इन दिनों देश के कथित जन अधिकारवादी संगठन और प्रखर बुद्धिजीवी प्रमाणित और असंदिग्ध गिरफ्तारियों को मानव अधिकार का हनन साबित करने के लिए जिस तरह हो हल्ला मचा रहे हैं उसे या तो मानसिक रुग्णता कहा जा सकता है या फिर प्रतिभा संपन्न लोगों की विपन्नता भी जो भाड़े में अपनी आवाज भी बेचा करते हैं । इससे प्रत्यक्षत: भले ही नक्सलियों या वाममार्गी चरमपंथियों के हौसले बुलंद नहीं होते हों पर इससे भारतीय मनीषा पर गंभीर शक तो जरूर होता है कि कहीं वे ही तो समाज और देश को फासीवाद की ओर धकेलना नहीं चाह रहे हैं? वातानुकूलित विमानों पर लादे उन्हें कौन देश भर में घुमा रहा है ? यह बुद्धिजीवी वर्ग किस गरीब का हिमायती है और वे किसी एक व्यक्ति, जो अपनी अनैतिक और अलोकतांत्रिक गतिविधियों से संदेहास्पद हो चुका हो, के लिए ही क्यों चिल्लपों मचा रहे हैं? समाज और जनता को दिग्भ्रम करने का यह कौन सा बौद्धिक अनुशासन है? और जिससे शांतिप्रिय समाज के समक्ष कानून एवं व्यवस्था का प्रश्न खड़ा कर रहे हैं।
समाज भी चुप है। भारत को आजादी केवल गांधी या सुभाष या अन्य आजादी के सिपाहियों के प्रयास से ही नहीं मिली बल्कि आमजन के संघर्ष की भूमिका भी रही है। आज वह समुदाय चुप है। 'पाप का भागी नहीं है केवल व्याध, जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास।'

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