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Thursday, November 11, 2010

चलो पहला कदम तो उठा



कारण चाहे जो हो सरकार ने भ्रष्टाचार और घोटालों के दो बड़े आरोपियों को बाहर का रास्ता दिखा कर लगता है दांडिक नीति को लागू करने की दिशा में कदम उठाया है। पार्टी ने विवादों में घिरे अपने मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण का इस्तीफा दिलवाने के साथ-साथ राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण का पर्याय बन चुके सुरेश कलमाड़ी को भी संसदीय दल के सचिव पद से हटा दिया है। जाहिरा तौर पर आदर्श को-ऑपरेटिव घोटाले में न तो चह्वाण अकेले पापी हैं, न राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले में कलमाड़ी।

उम्मीद करनी चाहिए कि विवादों में आए बाकी नामों के बारे में भी जल्दी फैसला आएगा। अदालती फैसला आने में तो समय लगेगा तथा उसमें कैद और दंड वसूली जैसे कदम भी उठाए जाते हैं, पर राजनीतिक और सार्वजनिक फैसला तो पार्टी और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के कारण होता है। देश के प्रधानमंत्री बहुत सज्जन व्यक्ति भले हों, पर आज देश में अपने गठजोड़ के कलंकित सदस्यों के प्रति उनकी उदासीनता को उनकी दार्शनिक गहराई का प्रमाण मानकर संतुष्ट होने वाले बहुत लोग नहीं मिलेंगे। हमारी तरक्की की फोर्ब्स सूची से लेकर जिनेवा तक अमीरों की दुनिया में भले ही कितने चर्चे क्यों न हो रहे हों, नेतृत्व में भ्रष्टाचारनिरोध की इच्छा या क्षमता को लेकर आज एक घोर निराशा पूरे देश में व्याप्त है। जनता को लग रहा है कि फिलहाल स्वयं उसके लिए परिस्थिति को खुद बदलने के सब रास्ते बंद हैं। मजबूत विकल्प के अभाव में कांग्रेस को ठुकराकर देश मध्यावधि चुनाव से नई पार्टी को नहीं चुन सकता और कांग्रेस स्पष्टत: मझधार में अपने गठजोड़ के घोड़े बदलने की इच्छुक नहीं दीखती, अश्वमेध तो दूर की बात है।

लोकतांत्रिक राजनीति के दायरे के बाहर हर समय लुआठी लिए अरुंधती राय या गिलानी सरीखे लोगों के घर फूंक विकल्प भी कोई समझदार लोकतंत्र स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि सारे रास्ते बंद हैं और अगला आम चुनाव अभी दूर है। घूम-फिरकर इस उम्मीद पर भारत की जनता कायम है कि मनमोहन सिंह की सरकार ही कुछ कठोर फैसले लेगी। अशोक चह्वाण और कलमाड़ी को बाहर का रास्ता दिखा कर लगता है सरकार ओर पार्टी ने इस दिशा में कदम उठाया है।
गेम्स घोटाला और आदर्श सोसायटी प्रकरण वर्तमान शासन की दो बड़ी खामियों के प्रतीक हैं। जनता के बीच गेम्स घोटाले की जांच की अविश्सनीयता साबित करती है कि जांच बिठाने वाले नेतृत्व का निजी तौर से ईमानदार होना ही काफी नहीं है। उसे अपने जांच तंत्र में भी पारदर्शी नैतिकता कायम रखने के लिए प्रामाणिक तौर से दृढ़ दिखना होगा। आज लगभग पूरा तंत्र भ्रष्टाचारी नेताओं, बाबुओं तथा ठेकेदारों के गिरोहों के कब्जे में है और भ्रष्टाचार हटाने के लिए कोई भी दूरगामी सुसंगत योजना बनाना और फिर उसे ईमानदारी से लागू करना नामुमकिन हो गया है। दोनों खामियां अलग - थलग भी नहीं हैं।

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