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Sunday, August 21, 2011

ब्रिटेन में दंगा

हरिराम पाण्डेय
11 अगस्त 2011
ब्रिटेन में इन दिनों भयानक दंगे हो रहे हैं और उसकी लपटें लंदन के अलावा कई अन्य शहरों में भी फैल गयी हैं। लंदन और दुनिया के अन्य स्थानों पर बैठे वामपंथी उदारवादी चिंतकों और लेखकों ने इसका जो भी विश्लेषण किया है वह दर असल उनका बुद्धि विलास है और उसका जमीनी हकीकतों से कुछ लेना- देना नहीं है। पहली बात कि इन दंगों में शामिल लोग मिलीजुली आबादी के नहीं हैं बल्कि अश्वेत हैं और ज्यादातर किशोर हैं। ये अश्वेत अधिकतर एशियाई और अफ्रीकी मुस्लिम बहुल समाज के लोग हैं। ये लड़के दुकानों, घरों और मोटर कारों को फूंक रहे हैं तथा इनके हाथों जो भी लग जाता है उसे लूट रहे हैं। इनमें फ्लैटस्क्रीन टी वी सेट्स, मोबाइल फोन, स्नीकर्स और महंगी शराब के प्रति ज्यादा आकर्षण दिख रहा है। इन घटनाओं के बारे में जो भी विश्लेषण आ रहे हैं वे एक तरह से गुमराह करने वाले हैं। कोई भुी ठीक से यह बताने का प्रयास करता हुआ नहीं देखा- सुना गया कि आखिर लंदन और उसके आस- पास के कई शहर इस गुस्से का शिकार हो कैसे गये? इनका इरादा अधिकारियों के ध्यान को दूसरी तरफ मोडऩा है ताकि असली अपराधी गिरफ्त में ना आ सके। जो सवाल सहज होते हैं उनके जवाब भी सरल होने चाहिये। ऐसा नहीं कि ज्ञान के जोश में लहीम- शहीम दलीलों को लोगों के गले में उतार दिया जाय। दंगे को देख कर ब्रिटिश अधिकारी हैरत में हैं और दंगाई शांत होने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में उन दंगों के कारणों के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं कहा जायेगा। ऐसी स्थिति में इसके कारणों के बारे में जानकारी के लिये प्रतीक्षा करना ही उचित होगा। इस संबंध में फिलहाल जो कुछ भी कहा जायेगा वह उपलब्ध वास्तविकताओं के आधार पर ही कहा जायेगा। चूंकि दंगाई अश्वेत हैं , प्रवासी हैं और किसी की निजी सम्पत्ति के प्रति उनमें कोई विचार नहीं है, उल्टे उन सम्पत्तियों के प्रति उनमें रोष है। ये हालात बताते हैं कि उनकी यह कार्रवाई विरोध प्रदर्शन नहीं है बल्कि स्पष्टï रूप से दंगा है। दूसरी बात कि दंगे का इस तरह बेइख्तियार भड़कना और उसे काबू करने में पुलिस तथा अन्य सम्बद्ध एजेंसियों की नाकामयाबी यह बताती है कि वहां की पुलिस भी भारत की तरह समाज से जुड़ी नहीं है। अभी हाल में इंग्लैंड में पुलिस और अन्य सम्बद्ध एजेंसियों के खर्च को घटा दिया गया और यह दंगा बता रहा है कि पुलिस की ट्रेनिंग में कोताही कितनी महंगी पड़ सकती है। पुलिस बलों की कम संख्या का मतलब है मौके पर नाकामयाबी। भारत में नीति बनाने वालों के लिये यह एक सबक है। उन्हें यह सोचना चाहिये कि टे्रनिंग में कमी के कारण लंदन की मेट्रोपॉलिटन पुलिस दंगे को काबू करने में फिसड्डïी साबित हुई है। तीसरी बात कि इंग्लैंड में वोट बैंक की सियासत के कारण बहुसंस्कृतिवाद को बढ़ावा और प्रवासियों के अपराध को वंचितों के बदले की कार्रवाई की संज्ञा देकर सियासत की रोटी सेंकना अब महंगा पड़ेगा। उदारता और व्यावहारिकता के उपदेश की घुट्टïी पिलाने वाले ब्रिटिश राजनीतिज्ञों को अब सोचना होगा कि अपराधियों , आतंकियों और वांछितों को शरण देना कितना महंगा पड़ेगा। तुष्टीकरण की नीति ने जिस तरह भारतीय समाज में द्वेष का सूत्रपात किया है उसी तरह वहां भी हो रहा है। ब्रिटेन अब अपनी गलतियों का नतीजा भोग रहा है।

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