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Thursday, August 6, 2015

लोकतंत्र बचाओ अभियान चलाने की जरूरत

लोकतंत्र बचाओ अभियान चलाने की जरूरत
देश की सबसे बड़ी पंचायत , संसद , इन दिनों बेचैन है। जो हो रहा है उसे सांसद के माननीय लोकतंत्र पर काला धब्बा बता रहे हैं। लेकिन आप गौर करें तो लोकतंत्र और काला धब्बा दो ऐसे शब्द हैं जिनसे आप उलझ जाएंगे। सबसे पहली बात कि लोकतंत्र का स्वाभाविक विकास अपने देश में नहीं हुआ। यह अंग्रेजों की विरासत है। आयात की हुई चीजों का जो हश्र होता है, सो लोकतंत्र का हो रहा है। यह हमारे मानस में न कभी था, न रहा और न इसे विकसित कराने की कोई पहल हुई। हमारा आदर्श कभी लिच्छवी गणतंत्र नहीं रहा, बल्कि रामराज्य रहा है, जो लोकतांत्रिक नहीं है। रामराज्य माने राजतंत्र और राजा राम मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान यानी राजा सर्वोपरि। हमने रामराज्य को प्रचारित किया। लिच्छवी गणतंत्र यहां के जनमानस में वो स्थान नहीं बना सका, जो स्थान रामराज्य ने बनाया। रघुकुल रीति है। जनता सर्वोपरि नहीं है। जनता सर्वोपरि यूरोप में है, भारत में नहीं।
1649 में इंलैंड में वहां के अन्यायी और अत्याचारी राजा चार्ल्स प्रथम को वहां की पार्लियामेंट ने फांसी दे दी। संसदीय लोकतंत्र की पहली हवा यहीं से चली, इसी से इसे मदर ऑफ पार्लियामेंट कहा जाता है। 1688 में इंलैंड की क्रांति के बाद वहां लोकतंत्र का दरवाजा खुला। संसदीय लोकतंत्र की शुरुआत यहीं से मानी जाती है। 1776 में अमरीकी स्वाधीनता संग्राम और डिक्लेयरेशन ऑफ द राइट्स ऑफ मैन, लाइफ, लिबर्टी और पर्स्यूट ऑफ हैपीनस की अवधारणा का उदय हुआ। सन् 1889 में फ्रांस की क्रांति हुई। लिबर्टी, ईक्वलिटी और फ्रटर्निटी (स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व) के विचार उत्पन्न हुए। दूसरा शब्द है काला धब्बा। लोकतंत्र का काला धब्बा किसे कहते हैं और यह कब और कैसे लगता है। क्या आप यह मानते हैं कि हमारा लोकतंत्र एक सफेद बोर्ड की तरह है। जिस पर कभी कभार काला धब्बा पड़ जाता है। आप कैसे तय करते हैं कि आपातकाल वाला काला धब्बा बड़ा है या बाबरी मस्जिद के ध्वंस वाला काला धब्बा। 2008 में लोकसभा के पटल पर नोटों की गड्डी रखने से पड़ा काला धब्बा बड़ा है या 1984 के दंगे वाला काला धब्बा। भ्रष्टाचार, जातिवाद और धनबल की राजनीति से लगने वाले काले धब्बे को मिला लें तो लोकतंत्र का पूरा बोर्ड ही ब्लैक लगने लगता है। इस बार कांग्रेस कह रही है कि सुषमा स्वराज पहले इस्तीफा दें फिर सदन चलेगा। आम लोग तब भी दु:खी थे, जब बीजेपी विपक्ष में रहते हुए सदन नहीं चलने देती थी और अब भी दु:खी है' जब कांग्रेस सदन चलने नहीं दे रही है। 2012 में कोयला खदानों के मामले को लेकर 19 दिन का मॉनसून सत्र सिर्फ 25 घंटे चला था। 2009 से 2014 के बीच 900 घंटे बर्बाद हुए थे। तब राहुल गांधी और कांग्रेस के सांसदों ने संसद परिसर में लगी गांधी की मूर्ति के सामने प्रदर्शन किया था। आज कांग्रेस उग्र हो गई है। राहुल गांधी ने कहा कि हमे संसद के बाहर फेंक दें, हमारे लिए पूरा देश पड़ा है, लेकिन इस्तीफे की मांग से पीछे नहीं हटेंगे। निलंबन के कारण कई विपक्षी दल कांग्रेस के साथ हो गए हैं। इस्तीफे की मांग से किनारा करने वाली समाजवादी पार्टी के सांसद मुलायम सिंह यादव ने स्पीकर से निलंबन वापस लेने की गुजारिश की और बाहर आकर कांग्रेस का साथ भी दिया। काला धब्बा हमारी राजनीति के अलोकतांत्रिक होने का प्रतीक माना जाता है। लोकसभा से कांग्रेस के 25 सांसदों को निलंबित किया गया तो इसे लोकतंत्र की हत्या से लेकर काला धब्बा तक कहा गया। मॉनसून सत्र में संसद के दोनों सदन हर दिन एक ही मुद्दे पर स्थगित होते जा रहे हैं। सदन में कांग्रेस के अलावा भी कई दल अपनी मांगों को लेकर आवाज उठा रहे हैं, वेल तक जा रहे हैं और बैनर भी दिखा रहे हैं। बाद में खबर आई कि मुलायम सिंह यादव बीच का रास्ता निकालने का प्रयास करने लगे। इसी सत्र में कांग्रेस के सांसद अधीर रंजन चौधरी को एक दिन के लिए निलंबित किया गया था। जब वे स्पीकर की मेज तक जा पहुंचे तब सरकार इनके खिलाफ कार्रवाई ले आई, जिस पर मतदान होते होते रह गया। 25 सांसदों के निलंबन के लिए सरकार प्रस्ताव लेकर नहीं आई थी। मंगलवार को बीजेपी संसदीय दल की बैठक में कांग्रेस की रणनीति के ख़िलाफ प्रस्ताव पास किया गया। सीपीएम के राज्यसभा सांसद सीताराम येचुरी ने कहा है कि इस मामले में स्पीकर ने भेदभाव किया है। सरकार संसद का मखौल उड़ा रही है। स्पीकर महाजन ने कहा है कि 25 सांसदों का निलंबन भलाई के लिए किया गया है। जब पूछा गया कि बीजेपी भी तो विपक्ष में रहते हुए यही रणनीति अपनाती थी तो स्पीकर ने कहा कि सही है कि पिछली संसद में बीजेपी ने किया, लेकिन उससे पहले कांग्रेस ने किया था। ऐसा इसलिए हो रहा है कि सभी राजनीतिक दलों का एक ही काम रह गया है, चुनाव लड़ना और जीतना। किसी के पास सामाजिक कार्यक्रम नहीं है। संपूर्ण देश में सामाजिक कार्यक्रमों के जरिये एक जागरूकता अभियान चलाया जाए कि राजनीति में निचले तबके के राजनीतिक कार्यकर्ता कैसे नेता, मंत्री बने और सत्ता में आए। इस पर बिना किसी आग्रह-दुराग्रह और पूर्वग्रह के हर दल के लोगों को विचार-विमर्श करना चाहिए कि राजनीति में पैसे वालों का जोर-खत्म हो और जमीन से जुड़े, धन-संसाधनों के अभाव वाले सच्चे-ईमानदार राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए सत्ता के द्वार कैसे खुलें। हमारा लोकतंत्र कैसे बचे? देश में लोकतंत्र बचाओ अभियान चलाने की जरूरत है।

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