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Thursday, April 28, 2016

इंसाफ में देरी नाइंसाफी है

एक बहुत पुरानी कहावत है ‘जस्टिस डिलेड , जस्टिस डिनायड’ यानी न्याय में विलम्ब का अर्थ होता है न्याय से इंकारअथवा इंसाफ में देरी नाइंसाफी है। इस विलम्ब पर रविवार को देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस ठाकुर बात कहते कहते रो पड़े थे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि न्याय और विकास में अन्योन्याश्रय सम्बंध है। लेकिन , बड़े आदर के साथ यहां कहा जा रह है कि न्यायमूर्ति ठाकुर ने अदालतों में जजों की कमी का जो करण बताया है वही एक मात्र कारण नहीं है इस विलम्ब का। इसके अलावा भी कई कारण हैं। दरअसल, हमारी समाज व्यवस्था जो है उसके अनुरूप हम लोकतंत्र का विकास नहीं कर पाये। हमें जो 1947 के बाद मिला वह ब्रिटिश उपनिवेशवाद का जूठन था। सबसे महत्वपूर्ण विंदु तो यह है कि आम आदमी जो फरियाद लेकर अदालत में जाता है वह अदालत के तिकड़म और उसकी भाषा नहीं समझता है। अपने हक , अपनी रोजी रोटी को गवां देने वाला एक मजदूर या जमीन छिन जाने के बाद बिलखता हुआ दर दर की ठोकरें खाने वाला एक किसान आई पी सी और सी आर पी सी के दांव पेंच संे वाकिफ नहीं होता, वकीलों की बहस समझ नहीं सकता। न्यायमूर्ति ठाकुर ने जजों की संख्या बढ़ाने की बात की लेकिन उससे क्या बुनियादी समस्या दूर हो सकेगी। न्याय तो पीड़ित जन की भाषा में मिलता नहीं है और जिस भाषा में वह उसके हाथ में आता है उसके पेचोखम और नुक्तों मुहावरों के मायने उसकी समझ में नहीं आते।आज की और पिछली सभी सरकारों को कठघरे में खड़ा करते हुए जस्टिस ठाकुर ने कहा है कि 1987 में लॉ कमीशन ने जजों की संख्या बढ़ाने की बात कही थी, लेकिन आजतक ऐसा नहीं हो पाया है। आज भी देश में 10 लाख लोगों पर सिर्फ 15 जज हैं। जस्टिस ठाकुर का कहना बिल्कुल सही है। आपको जानकर हैरत होगी कि 1950 में सुप्रीम कोर्ट की शुरूआत 8 जजों से हुई थी। तब मात्र 1215 केस थे। हमने एक जज पर 100 मुकदमों से अपनी शुरुआत की थी। एक दशक के भीतर जजों की संख्या 14 हुई और केस हो गए 3247। 1986 में सुप्रीम कोर्ट में 26 जज हो गए और केस की संख्या हो गई 27,881। इस वक्त हमारी क्षमता 31 है और मुकदमों की संख्या 77,151 2014 तक 31 जजों के ऊपर लंबित मुकदमों की संख्या 81,583 थी जिसे हमने कम करके 60,260 पर ला दिया है। अमरीका के सुप्रीम कोर्ट में 9 जज हैं। सबको मिलाकर एक साल में 81 केसों में फैसला देना होता है। भारत में एक जज औसत 2600 मुकदमों को सुनता है, फैसला देता है। चीफ जस्टिस ने कहा कि जब बाहर से जज आते हैं तो हमें देखकर हैरान होते हैं। एक गैर सरकारी अध्ययन के अनुसार हाई कोर्ट के जज के पास एक मुकदमे के लिए बस पांच या छह मिनट ही होते हैं। पहली बार ऐसा अध्ययन हुआ है। जो सबसे व्यस्त जज हैं यानी जिसके पास बहुत केस हैं उसके पास एक केस को सुनने के लिए सिर्फ ढाई मिनट हैं। जो सबसे कम व्यस्त है उसके पास मात्र 15 से 16 मिनट हैं। पांच से छह मिनट में उन्हें फैसला देना होता है। मिसाल के तौर पर कोलकाता हाई कोर्ट में हर दिन एक जज के पास 163 मुकदमे सुनवाई के लिए आते हैं। एक केस के लिए दो मिनट जितना ही समय होता है। पटना, हैदराबाद, झारखंड, राजस्थान के जजों के पास हर दिन एक केस के लिए दो से तीन मिनट मिलता है। क्या एक अरब 25 करोड़ की आबादी के लिए उच्च और उच्चतम न्यालयों के 619 जज पर्याप्त है। । न्यायपालिका की दुनिया का एक जुमला घिसते घिसते इतना घिस गया है कि इसका कोई मतलब नहीं रह गया। आप जानते भी हैं। जस्टिस डिलेड जस्टिस डिनाइड। इंसाफ में देरी नाइंसाफी है। अब बतायें उस नाइंसाफी की सजा किसे मिले। इंसाफ मांगने वाले को या इंसाफ देने वाले को।

यही नहीं कुछ दिन पहले इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की एक रिपोर्ट आयी थी जिसमें कहा गया था कि भारत में क्रिटिकल केयर के लिए 50,000 डॉक्टर चाहिए, ताकि जान जाने की स्थिति में कम से कम डॉक्टरों की कमी का सामना न करना पड़े, लेकिन भारत में सिर्फ 8350 डॉक्टर हैं। क्या 50,000 डॉक्टरों की कमी ये 8350 डॉक्टर पूरी कर सकते हैं। यही कारण है कि आप कई साल से सुनते आ रहे हैं कि फलां सरकारी अस्तपाल में ऑपरेशन की डेट छह माह से एक साल बाद मिलती है। सितंबर 2015 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने नेशनल हेल्थ प्रोफाइल जारी की थी जिसके अनुसार हर सरकारी अस्पताल कम से कम 61,000 मरीजों का इलाज करता है। 1833 लोगों पर एक बेड है और हरेक सरकारी डॉक्टर 11,000 लोगों का उपचार करता है। जो नर्सिग होम में इलाज नहीं करा सकते उनकी जान भगवान के हाथ में। यानी ना समय से इलाज और ना समय से इंसाफ और तब भी मेरा देश महान।

 

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