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Wednesday, June 1, 2016

कोई उम्मीद बर नहीं आती,कोई सूरत नजर नहीं आती

विख्यात पत्रिका इकॉनोमिस्ट  ने लिखा है कि ‘नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार ने भारत की जनता में भारी आशा का संचार किया था।’ यह सच है जिन्होंने भी मोदी जी के चुनाव प्रचार को देखा था उसने यह गौर किया होगा कि भारत की अपने बारे में अवधारणा बदल गयी है और वह अब मध्यवर्ग का मुल्क नहीं रह गया। एक नयी ऊर्जा का प्रस्फुटन हुआ है जो जीन्स ,मोबाइल फोन, टेलीविजन वाली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है। यह वह पीढ़ी है जिसे घर बनाने की चिंता नहीं है पर मोबाइल फोन और जीन्स , डेनिम उसके सपने हैं। भारत का मतदाता बदल गया है। मतदाताऔं में एक खास किस्म की भूख है और असे उस पुराने भारत की चिंता नहीं है जिसपर कांग्रेस ने शासन किया और जो भारत आर्थिक अवरोदों तथा भ्रष्टाचार में लिप्त था। विख्यात समाजशास्त्री आशीष नंदी ने लिखा है कि ‘मोदी उस दौरान उस पीढ़ी के अरमानों से सीधी तौर पर मुतस्सिर थे  जिसे अब कांग्रेस के लोकलुभावन कार्यों की फिक्र नहीं थी, जो मुफ्त में कुछ नहीं च्चहते थे। वह पीढ़ी रोजगार चाहती थी और मोदी जी ने रोजगार की उम्मीद जगायी थी। ’ एक ऐसा देश जो अब तक समाजवादी ढांचे पर चलता आया और जिसकी सरकारे मुनाफा को गलत बतातीं रहीं हैं उस देश का एक नेता मुनाफे को रुमानियत से जोड़कर सपने बुन रहा है। मोदी जी ने अपने भाषण में आत्महत्या के दंश से पीडि़त विदर्भ के कपास उगाने वाले किसानों को संदेश ​दिया था कि ‘वे नहीं चाहते कि किसानों को अपना अत्पाद बेचने के लिये दर दर की ठोकरें खानी पड़े।’ उन्होने इसके लिये एक फारमूला दिया था कि ‘फार्म टू फाइबर , फाइबर टू फेब्रिक , फेब्रिक टू फैशन और फैशन टू फॉरेन। ’ यह एक क्रांतिकारी बात थी। जबसे आर्थिक उदारी करण हुआ तबसे प्रधानमंत्री पद के लिये चुनाव लड़ने वालाकोई उम्मीदवार इतनी सरलता आर्थिक मसायल पर कुछ कहा हो। जनता ने उन्हें हाथों हाथ ले लिया। लेकिन दो वर्ष बीत गये और भारत अभी भी खुशहाली का मुन्तजिर है। समाजवादी सोच के ढांचे ने उन बातों को कार्यों में बदलने नहीं दिया। इसके बाद अब चिंता  और आशंका का वातावरण बनने लगा है। चिंता इस लिये नहीं कि अर्थव्यवस्था खस्ताहाली की ओर बढ़ रही है, इसलिये भी नहीं कि लाख कोशिशों के बावजूद ना महंगाई घटी है और ना विदेशी पूंजी देश में आयी है , इस बात की भी नहीं कि आर्थिक सुधारों से जुड़े विधेयकों को पारित कराने में सरकार नाकामयाब रही है। बल्कि चिंता इस बात की है कि मुक्त बाजार की शासन के प्रति शंकाओं को नहीं देख पा रहे हैं। दरअसल उनके दिमाग में गुजरात मॉडल है। जहां अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने लहीम- शहीम पुराने समाजवादी शासन के ढांचे को यथावत रहने दिया था और अफसरशाही को अक्षमता एवं भ्रष्चार से मुक्त कर दिया था। वे पूरे देश में ऐसा करने में लगे हैं। उन्होंने सर्वोच्च स्तर पर बेशक कुछ सुधार  भी किये हैं पर बाकी तो वैसा ही है जैसा पहले था। वही बोझिल हालात ,वही भ्रष्टाचार, वही काहिली और वही कामचोरी। कुछ नहीं बदला। इससे बहुतों में निराशा भर रही है। जिनलोगों मोदी जी से उम्मीदे की थी वे अफसोस कर रहे हैं। वाल स्ट्रीट जर्नल ने मार्च में अपने सम्पादकीय में लिखा था कि ‘मोदी जी समर्पित सुधारक नहीं,  संभवत: एक चालाक मदारी हैं।’ न्यूयार्क टाइम्स ने 28 मई के अंक में लिखा है कि ‘मोदी जी के पास सिद्धांतों और आदर्शों का जखीरा है पर उसे कार्यरूप देने वालों का अभाव है। ’ दरअसल गड़बड़ी कहां हे कि मोदी अक्सर विदेश जाते हैं वे वहां का वैभव और वहां की खुशहाली को अपने देश के रोजगार और ढांचागत विकास के रूप में देखते हैं तथा अति उत्साह में उसकी नकल करना चाहते हैं , वे पश्चिमी देशों की आर्थिक और सियासी आजादी को नहीं देख पाते। यह उनकी मनोवैज्ञानिक समस्या है। मोदी जी ने लोगों में भारी भरोसा जगाया है। अभी बी देश के किसी भी भाग में जाएं और मोदी जी के बारे में बातें करें तो लोग उम्मीद से भर दिखते हैं। यह पूछने पर कि क्या हुये वे अच्छे दिन तो जवाब मिलता है कि ‘उन्होंने वादा किया है तो आयेंगे ही अच्छे दिन’, लीकिन चहरे पर अवसाद की हल्की रेखाएं उभरने लगीं हैं। फिर चुनाव आने वाले हैं और प्रचार शुरु हो गये हैं। जहां विधानसभा चुनाव हुये वहां के नतीजों को भी , खासकर बंगाल और केरल के नतीजों को, सकारात्मक करके पेश किया जा रहा है। इसका मतलब है कि जनता को संदेश दिया जा रहा है कि सरकार को दुबारा मौका मिलना चाहिये। भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिये कि कांग्रेस पुराने समाजवादी प्रणाली से मोहभंग के कारण उत्पन्न आवेग ने मोदी जी को यहां पहुंचाया है और वह आवेग अब धीमे सुधार की मांग नहीं करता बल्कि जमीनी स्तर से ऊपर तक सुधारने की उम्मीद करता है। टिके रहने के लिये देश के मन में उम्मीद को कायम रखना होगा। फिलहाल तो आर्थिक आशाएं चकनाचूर होती दिखहिं हैं और रोष भी बढ़ रहा है देश के हृदय में, हालांकि अभी वह केवल सुगबुगाहट के स्तर पर है।

कोई उम्मीद बर नहीं आती

कोई सूरत नजर नहीं आती

आगे आती थी हाले दिल पर हंसी

अब किसी बात पर नहीं आती

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