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Wednesday, July 13, 2016

हिंदुस्तानियत को खतरा

कश्मीर अशांत है और वहां के हालात का देश भर में मनो वैज्ञानिक प्रभाव पड़ रहा है। इसके चलते हिंदुस्तानियत को खतरे की आशंका है। यह एक आपातस्थिति है। इसके तीन पहलू हैं: पहला कश्मीर के खुद का पहलू , क्षेत्रीय पहलू और तीसरा वैश्विक। अगर इसे समझना होग कि वहां समस्या क्या है तो सबसे पहले तीनों पहलुओं को अलग अलग समझना होगा और उसके बाद यह देखना होगा कि तीनों का समन्वित प्रभाव क्या पड़ता है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में आजाद हुआ लेकिन कश्मीर में 1947 के पहले से ही अतिवादी इस्लाम का असर था और यही कारण था कि आजादी के वक्त वहां समस्याएं आयीं और वह समस्या विभिन्न तरीके से आज भी कायम है। विभिन्न रेडिकल इस्लामी दल वहां उस उस समय सक्रिय थे जो आज भी भारत के उदय काहे एक क्रूर उत्पति मानते हैं। वहां खंड खंड में लोकतांत्रिक और केंद्रीय शासन व्यवस्था चलती रही लेकिन फौज वहां सदा बैठी रही। वह लोकतंत्र की आड़ में फौजी शासन कहा जाने लगा। ीजिसने उग्रता को और बढ़ावा दिया। नतीजा हुआ कि द्विध्रुवीय उग्रता (बाई पोलर रेडिकलिज्म) की वहां सक्रियता शुरु हो गयी। दोनो ध्रुवों की डायनामिक्स ने सामाजिक विखंडन की प्रक्रिया आरंभ कर दी। एक तरफ हमारे नेता कश्मीरीयत की बात करते हैं और दूसरी तरफ दो राष्ट्र के सिद्धांत को हवा देते हैं। लिहाजा वहां कश्मीरियत और चरमपंथी इस्लाम में जोर आजमाइश शरू हो गयी। इसके नतीजे के प्रदाम चरण के रूप में वहां से कश्मीरी पंडितों का पलायन देख सकते हैं। यहीं से आरंभ होता है कश्मीर पर क्षेत्रीय प्रभाव। भारत के विभाजन के बाद एकदम पड़ोस में एक ऐसा राष्ट्र जो इस्लाम को राष्ट्रका धर्म मानता ही नहीं है बल्कि कट्टरपंथी इस्लाम की राह पर चलकर लाभ उठाने के लिये सचेष्ट रहता है। इस दौरान वहां सऊदी अरब के पैसे और सामाजिक प्रभाव का दायरा बढ़ा। वहाबी मौलवी वहां से पाकिस्तान आये तथा उसकी छूत कश्मीर को लगी। विगत कुछ सालों से यह मामारी बहुत तेजी से फैली। अबतक की सरकारों ने यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि यह अतिवाद युवकों में क्यों बढ़ रहा है। वहां के राजनीतिक दलों ने इसका लाभ उठाया। इस मामले ना दिल्ली ईमानदार रही और श्रीनगर। सब केवल नारे देते रहे। कश्मीरी नौजवानो का यह मनोवैज्ञानिक परिवर्तन सरकारे अंदाज कर गयीं। बुरहन वानी के मारे जने के बाद फैली भयावहता से समस्या स्पष्ट दिखने लगीण् और यह समझ में आने लगा कि इसमें केवल स्थनीय तत्व ही नहीं हैं। नौजवानों की साइकी का नियंत्रण कहीं और से हो रहा है। वर्तमान सामाजिक मनोवैज्ञानिक स्थिति को ‘आतंकवादी समूह’ फकत बढ़ावा दे रहे हैं और राजनीतिक विवाद इसे उत्प्रेरित कर रहा है। कश्मीरी समाज में दरारें साफ दिखने लगी हैं। वहां यह साफ दिखने लगा है कि भारत की अवधारणा और इस्लाम की अवधारणा पृथक है। इसीलिये वहां हिंदुस्तानियत , जो भारतीयता और अन्य विचारधाराओं का एक मिश्रित समूह है उसे खतरा पैदा हो गया है। यह एक खतरनाक संकेत है। क्योंकि अबसे पहले भी कश्मीर में कई घटनाएं घटी हैं लेकिन किसी में भी इतना तीखापन नहीं था। ‘विदेशी समूह’ इस हालात का लाभ उठा रहे हैं। साथ ही इस्लामी चरमपंथ पर दुनिया भर में दबाव बढ़ रहा है जिसके परिणामस्वरूप देसी आतंकियों का विभिन्न क्षेत्रों से पलायन हो रहा है और पूरी तरह प्रशिक्षित वे नौजवान अपने ‘मुल्क’ लौट रहे हैं। कश्मीर चूंकि सदा से विवादग्रस्त रहा इसलिये वहां इनकी बहुतायत है। यह पहला मौका है जब उन आगत आतंकियों को अपनी क्षमता साबित करने का मौका मिला है। यही नहीं कश्मीर और आसपास के नौजवान विदेशों में जाकर काम करते हैं और वहां से न केवल दौलत कमा कर लौटते है बल्कि वहां से मिले रेडिकल विचारों को भी लेकर लौटते हैं। इनका असर पहले ग्रामीण इलाकों पर पड़ रहा है और उन क्षेत्रों से शहरों में आये नौजवानों ने माध्यम से शहरों में पहुंचता है।  यह अतिवादी भाव की नयी नस्ल की उत्पत्ति है। इसका शमन फौजी ताकत से नहीं, वैचारिक प्रभाव से किया जा सकता है। इसके लिये सबसे जरूरी है ‘पोप पॉलिटिक्स’ यानी पॉपुलर पॉलिटिक्स या लुभावनी राजनीति का त्याग। हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता की बात तो होती है पर सियासत की नीव में धर्म का पत्थर भी लगाया जाता है। एक मामूली सी बात है कि राजनीतिक दल सहिष्णुता का शोर मचाते हैं। सामाजिक स्तर पर यह गलत है। यहीं से किसी दूसरे के कमतर होने की भावना का जन्म होता हे। अब सोचें कि एक प्रसंग में कहा जाता है कि ‘भारत में हिंदू सहिष्णु हैं। ’ इसका मनोवैज्ञानिक तजुर्मा ऐसा भी हो सकता है कि यहां की अन्य जातियां या संस्कृतियां केवल इसलिये हैं कि हिंदू सहिष्णु हैं। इसलिये ‘पोप पॉलिटिक्स’ में इस तरह के भाव की अभिव्यक्ति एक तरह की श्रष्ठता को जन्म देती है जो अन्य लोगों में गुस्सा पैदा करता है। बुद्धिजीवयों को एक राह निकालनी चाहिये और समाज की समरसता के लिये नये शब्दों को गढ़ना चाहिये।

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