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Thursday, November 24, 2016

भय की सियासत

भय की सियासत
महान दार्शनिक अरस्तू ने कहा था जो भय मुक्त हो गया वस्तुत: स्वतंत्र है। हम जब से पैदा लेते हैं तबसे हमारा समाज हमें सिखाना शुरू कर देता हे कि हमें क्या करना चाहिये। विख्यात मनोविज्ञानी फ्रायड ने भय और संत्रास को हथियार की संज्ञा देते हुये कहा है कि हमें यह सिखा जाता है कि यदि हम समाज का अनुसरण नहीं करेंगे तो मुश्किलों में पड़ जायेंगे। माता पिता हमें सिखाते हैं कि एक खास किस्म से आचरण करो। अगर हम उनके मनोनुकूल आचरण करते हैं तो वे हमें पुरस्कद्त करते हैं वरनाह दंडित होना पड़ता है। तब फितरतन बच्चा मां बाप की आज्ञाओं का पालन करता है क्योंकि यह जीवन का प्रश्न है। स्कूल में हमारे गुरू जन सिखाते हैं कि सोच की दिशा क्या हो , हम अपे सोच को विकसित कैसे करें। मजे की बात है कि सब लोग एक ही बात सिखाते हैं कि हम अगर उनके यानी शिक्षकों के बताये मार्ग का अनुसरण नहीं करते हैं तो सारे शिक्षक और साथी छात्र हमें खराब कहते हैं। परीक्षाओं में खराब ग्रेड मिलेंगे, स्कूल से निकाला भी जा सकता है। धर्म भी यही सिखाता है कि धर्म ग्रंथों को मानों वरना नर्क भुगतोगे। बात यहीं तक नहीं है जो संस्थान फर्ज कि विश्वविद्यालय हमें यह डरना सिखाते हैं वे खुद भी डरे हुये हैं। उन्हें अपनी स्वायतता को खो देने का भय है या एक ख्गास किस्म के आदर्शै के साथ जीने के लिये मजबूर होने का भय है। इन दोनों प्रकार की भीत दशाओं का सरकार ,चाहे वह राज्य हो याह केंद्र, सृजन और नियंत्रण करती है। इसलिये हम हर जगह समझौता करते हैं। यह हथकंडा रोजमर्रा की जिंदगी में भी अपनाया जाता है और हम इससे अंजान रहते हैं। 

बात बस इतनी ही है कि किसी ने कुछ नियम बना दिये हैं और आप हर इंसान से उम्मीद करते हैं कि वह उनके अनुसार जिये। यह असंभव है। लेकिन समाज को अपना सामाजिक अहम् बनाए रखने के लिये ऐसे नियमों की जरूरत होती है। समाज का अपना अहम् होता है, है कि नहीं? हर छोटी-मोटी बात को ले कर पूरा समाज क्षुब्ध हो जाता है। यह जरूरी नहीं कि वह गलत ही हो। असल में, यह एक तरह का अहम् है। और वह दूसरी तरह का अहम् है। यही सामाजिक अहम् है जो क्षुब्ध होता है और डर पैदा करता है।अपने चारो ओर ठीक से देखिये तो आप समझ लेंगे कि यहां यह कहने का अर्थ क्या है। राजनीतिज्ञ जनता को भयभीत कर अपनी बात मनवाते हैं और चुनाव जीतते हैं। आतंक , भय और संत्रास सभी प्रकार के चालबाजों का हथियार है। यह लोगों को कुछ भी करने को तैयार करा सकता है चाहे वह कार्य कितना भी अतर्कपूर्ण है। अब जैसे एक नेता ने कहा कि वह हमारे देश के हर खास ओ आमण् के खाते में 15 लाख रुपये जमा करवा देगा यह 15 लाख विदेशों जमा काले दान से लाया जायेगा। यह जुमला अत्यंत तर्कहीन था। लेकिन लेकिन गरीबी का भय और अमीरी के लाभ ने लोगों को वोट देने पर बाध्य किया। बट्रेंड रसल का कहता था कि दुनिया का कोई आदमी भय के प्रभाव में सही नहीं सोच सकता है। ऐसा इसलिये होता है कि हम बचपन से डर की अवधारणा अपने अचेतन में बैठा रखे हैं। अम्बोर्स बियर्सीं ने अपनी विख्यात पुस्तक डेविल्स डिक्शनरी में कहा है कि ‘इंसानी सोच जोखिम की अवधारणा को जन्म देती है। डर हमारे अवचेतन में रहता है और वह हमारी सोच की प्रक्रिया को निर्देशित करता रहता है और हम उस निर्देशन को जोखिम की अवधारणा के तहत परिगणित करते हैं।’  भय कोई बुरी चीज नहीं है यह हमें जीवित रखता है और सही काम करने के लिये तैयार करता है।  पर इसका एक साइड इफेक्ट है कि यह हमें सुरक्षा के मिथ्यालोभ की ओर ज्यादा ले जाता है। नोटबंदी का मामला हो या पाकिस्तानी हमले का इसमें एक खास किस्म का भय लोगों में भरा जाता है चाहे वह काले धन से बढ़ती महंगाई का हो या आतंकवाद का हो या राष्ट्रीय अखंडता का। समस्त कपट योजनाएं इस भीति की आड़ में स्वरूप ग्रहण करतीं हैं। यह आज का नहीं है और केवल भारत का नहीं है। समस्त विश्व में शासन का हथकंडा है।

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