CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Monday, December 11, 2017

धर्म , अध्यात्म और पत्रकारिता

धर्म , अध्यात्म और पत्रकारिता

हरिराम पाण्डेय

धर्म , अध्यात्म और पत्रकारिता अंतस्सम्बंद्धों का विश्लेषण और व्याख्या के पूर्व हमें इन तीनों के अर्थ समझने होंगे। आज के हमारे साइबर युग में ऐसे रुढ़िगत शब्दों की परिभाषा उद्दश्य से विचलित हो जाती है। आगे बढ़ने से पूर्व हम इन तीनों इकाइयों को समझ लें। सबसे पहले धर्म। अलग- अलग संस्कृतियों में धर्म अलग अलग स्वरूपों तथा मिथकों से परिभाषित हुआ है। अरस्तु से लेकर अबतक के लगभग सभी दार्शनिकों ने धर्म की अलग परिभाषा की पड़ताल करने की कोशिश की है। जहां तक सनातन धर्म की बात है तो  उसकी परिभाषा अंतर्मुखी है और एक धामिैक आदमी संस्थानों से पृथक होने के बाद भी आत्मरिक्त नहीं होता। जबकि प​श्चिम का एक आदमी संस्थानों से मुक्त हो कर भीतर से खाली हो जाता है।  इसलिये हमारी संस्कृति में हर कार्य में धर्म है या कहें कर्म ही धर्म है। यहां कर्म के साथ आत्म का जुड़ाव नहीं है , फल की लिप्सा नहीं है। जहां तक बात संवाद कर्म की है यानी पत्रकारिता की है तो यह भी धर्म से पृथक नहीं है। यहां बात थोड़ी समझनी जरूरी है। हमारे देश में आधुनिक पत्रकारिताग् पर यूरोप का प्रभाव है खास कर औद्योगिक क्रांति के बाद के प​श्चिमी जगत पर। यह वह समय था जब प​श्चिम दो दो महायुद्ध झेल चुका था और विकास के लिये एक दीवानगी पैदा हो गयी थी। इसलिये संवाद कर्म भी धर्म से ना जुड़ कर मिशन से जुड़ गया, एक जुनून से जुड़ गया। चूंकि पश्चिम की पत्रकारिता औद्योगिक क्रांति की जद्दोजहद की पैदाइश है इसलिये माध्यम की मोहताज है और इतिहासविहीन है। जबकि भारतीय पत्रकारिता का इतिहास पौराणिक काल के देवर्षि नारद से जुड़ा है। सनातन संस्कृति के अनुसार देवार्षि नारद को सृष्टि का प्रथम पत्रकार माना जाता है। पत्रकारिता धर्म समझने के लिए देवार्षि नारद को समझना होगा। इस धर्म के निर्वाह में स्वार्थ और मोह का कोई स्थान नहीं है। समाज को आइना दिखाने के लिए जरूरी है कि पत्रकार का हृदय स्वच्छ व निर्मल हो। धर्म एवं पत्रकारिता के बीच संबंध शाश्वत रहा है। नारद से लेकर तुलसी- कबीर तक धर्म के उच्चतम प्रतीक हैं और संवाद सम्प्रेषण के भी। यहां पत्रकारिता के संदर्भ में नारद को समझना होगा। पत्रकारिता की तीन प्रमुख भूमिकाएं हैं- सूचना देना, शिक्षित करना और मनोरंजन करना। इसके अलावा लोगों की भावनाएं जानना और उन्हें जाहिर करना, लोगों में जरूरी भावनाएं पैदा करना, यदि लोगों में दोष है तो किसी भी कीमत पर बेधड़क होकर उनको बताना , दिखाना। भारतीय परम्पराओं में भरोसा करने वाले विद्वान मानते हैं कि देवर्षि नारद की पत्रकारिता ऐसी ही थी। देवर्षि नारद सम्पूर्ण और आदर्श पत्रकारिता के संवाहक थे। वे महज सूचनाएं देने का ही कार्य नहीं बल्कि सार्थक संवाद का सृजन करते थे। देवताओं, दानवों और मनुष्यों, सबकी भावनाएं जानने का उपक्रम किया करते थे। जिन भावनाओं से लोकमंगल होता हो, ऐसी ही भावनाओं को जगजाहिर किया करते थे। इससे भी आगे बढ़कर देवर्षि नारद घोर उदासीन वातावरण में भी लोगों को सद्कार्य के लिए उत्प्रेरित करने वाली भावनाएं जागृत करने का अनूठा कार्य किया करते थे। 'कृष्णार्जुन युद्ध' कथा पढऩे पर ज्ञात होता है कि किसी निर्दोष के खिलाफ अन्याय हो रहा हो तो फिर नारद अपने आराध्य भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण और उनके प्रिय अर्जुन के बीच भी युद्ध की स्थिति निर्मित कराने से नहीं चूकते। उनके इस प्रयास से एक निर्दोष यक्ष के प्राण बच गए। यानी पत्रकारिता के सबसे बड़े धर्म और साहसिक कार्य, किसी भी कीमत पर समाज को सच से रू-ब-रू कराने से वे भी पीछे नहीं हटते थे। सच का साथ उन्होंने अपने आराध्य के विरुद्ध जाकर भी दिया। यही तो है सच्ची पत्रकारिता, निष्पक्ष पत्रकारिता।  किसी के दबाव या प्रभाव में न आकर अपनी बात कहना। देवर्षि नारद के चरित्र का बारीकी से अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि उनका प्रत्येक संवाद लोक कल्याण के लिए था। नारद तो धर्माचरण की स्थापना के लिए सभी लोकों में विचरण करते थे। उनसे जुड़े सभी प्रसंगों के अंत में शांति, सत्य और धर्म की स्थापना का जिक्र आता है। स्वयं के सुख और आनंद के लिए वे सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं करते थे, बल्कि वे तो प्राणी-मात्र के आनंद का ध्यान रखते थे।

भारतीय परम्पराओं में भरोसा नहीं करने वाले 'बुद्धिजीवी' भले ही देवर्षि नारद को प्रथम पत्रकार, संवाददाता या संचारक न मानें। लेकिन, पथ से भटक गई भारतीय पत्रकारिता के लिए आज नारद ही सही मायने में आदर्श हो सकते हैं,धर्म ही सही मायने में आधार हो सकता है। भारतीय पत्रकारिता और पत्रकारों को अपने आदर्श के रूप में नारद को देखना चाहिए, उनसे मार्गदर्शन लेना चाहिए।आयातित विचार और दर्शन के कारण पत्रकारिता मिशन बनी और   मिशन से प्रोफेशन बन गयी। इसके बाद भी उसका अवघटन होता रहा। आज की पत्रकारिता और पत्रकार नारद से सीख सकते हैं कि तमाम विपरीत परिस्थितियां होने के बाद भी कैसे प्रभावी ढंग से लोक कल्याण की बात कही जाए। पत्रकारिता का एक धर्म है-निष्पक्षता। लेखनी तब ही प्रभावी हो सकती है जब आप निष्पक्ष होकर पत्रकारिता करें। पत्रकारिता में आप पक्ष नहीं बन सकते। हां, पक्ष बन सकते हो लेकिन केवल सत्य का पक्ष। भले ही नारद देवर्षि थे लेकिन वे देवताओं के पक्ष में नहीं थे। वे प्राणी मात्र की चिंता करते थे। देवताओं की तरफ से भी कभी अन्याय होता दिखता तो राक्षसों को आगाह कर देते थे। देवता होने के बाद भी नारद बड़ी चतुराई से देवताओं की अधार्मिक गतिविधियों पर कटाक्ष करते थे, उन्हें धर्म के रास्ते पर वापस लाने के लिए प्रयत्न करते थे। नारद घटनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं, प्रत्येक घटना को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं, इसके बाद निष्कर्ष निकाल कर सत्य की स्थापना के लिए संवाद सृजन करते हैं। आज की पत्रकारिता में इसकी बहुत आवश्यकता है। सकारात्मक और सृजनात्मक पत्रकारिता के पुरोधा देवर्षि नारद को आज की मीडिया अपना आदर्श मान ले और उनसे प्रेरणा ले तो अनेक विपरीत परिस्थितियों के बाद भी श्रेष्ठ पत्रकारिता संभव है। आदि पत्रकार देवर्षि नारद ऐसी पत्रकारिता की राह दिखाते हैं, जिसमें समाज के सभी वर्गों का कल्याण निहित है। भारत जीवंत और विशालतम लोकतंत्र हैं। यह मात्र राजनीतिक दर्शन  ही नहीं है बल्कि जीवन का एक ढंग और आगे बढने के लिए लक्ष्य हैं। इसी  लोकतंत्र का त्रिनेत्र पत्रकारिता में आलोकित  है।   समाचार पत्र सिर्फ खबर ही नहीं देते, वे सोच को गढते हैं और दुनिया के लिए खिडकी खोलते है. सही मायनों में पत्रकारिता समाज को बदलने का साधन और आम जनता की ताकत है। लिहाजा, स्वतंत्र, निष्पक्ष और धर्मै की तरह की जाने वाली  पत्रकारिता आवश्यक ही नहीं  बेहद जरूरी है। धर्म को समझना और उसे आत्मसात करना ही दरअसल अध्यात्म है। धर्म को समझना और उसे आत्मसात करना ही अध्यात्म है।

Sunday, December 10, 2017

चुप्पी खतरनाक है

चुप्पी खतरनाक है

हमारे प्रधानमंत्री जी बेहद क्षुब्ध हो गये जब विपक्ष के एक नेता ने उनके संदर्भ में "नीच " शब्द का प्रयोग किया। कांग्रेस पार्टी खास कर राहुल गांधी साहब क्षुब्ध हो गये कि उनकी पार्टी के एक नेता ने प्रधानमंत्री के लिये नीच का सम्बोधन किया। प्रधानमंत्री जी ढोल प​ीट - पीट कर नीच शब्द का मतलब समझात चल रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने उस नेता को पार्टी से ​निलंबित कर दिया कि नीच शब्द का उपयोग बर्दाेत के काबिल नहीं है। देश के सारे चैनल और प्राइम टाइम टी वी  के जुझारू एंकर इस लिये दुखी हैं कि प्रधानमंत्री शालीनता को भंग करने की कोशिश की गयी। मनुष्यता और नैतिकता कह खून समझा गया इस शब्द के उपयोग को। हम बड़े संवेदनशील लोग हैं। कवि केदारनाथ सिंह ने कहा है कि " वो क्यों चुप हैं जिन्हें आती है भाषा।" बेशक एशिया के सबसे बड़े हिंदी के कवि को मौन की चीख  सुन पाने का मौका नहीं मिला होगा। संवेदनशीलता की इस शस्य श्यामला भूमि पर असंवेदनशीलता की चीख कोई सुन नहीं पा रहा है।  हॉरर फिल्मों की मानिंद एक  आदमी को सरे राह  जिंदा जला दिया गया और उसके जलाये जाने को कैमरे फिल्माया गया। यह घटना उस संवेदनशील राज्य की है जहां पद्रमावति की कल्पित कथा में मामूली हेर फेर से जियाले राजपूतों की संवेदनशीलता को आाघत लगा और वे लोग फिल्म के रिलीज रोकवाने पर तुले हैं। लेकिन उस समय कोई आहत नहीं हुआ जब धार्मिक कट्टरवाद शब्द का प्रयोग राजस्थान में दित दहाड़े हत्या का औचित्य बताने के लिये किया गया। यह हत्यारा कौन है ? हमने इसे कई बार देखा है ओर हरबार नजरअंदाज कर दिया है। क्यों कि हमने यह सोचा यह हमारे साथ नहीं होने वाला। हमने इस पर सोचना , इसपर चिंतित होना, हसमें दखल देना या इसे रोकना इसी लिये छोड़ दिया। हमने इसे उस वक्त देखा है जब कांवड़िये के रूप में बसो पर हमले किये। हमने उस वक्त देखा जब दूध बेचने वालों पर हमले हुये। हमने इसे गौ रक्षकों के रूप में देखा है, दलितों कपिीटनेवाले रूप में देखा है , हमने बिना हेलमेट के हाथ में तिरंगा लिये हमने इसे ट्रेनों में ईद की खरीदारी करने वालों सेतेज मोटर सायकिल चलाते हुये महिलाओं को छेड़ने वाले के रूप में देखा है।  हमने इसे ईद की खरीदारी कर  ट्रेनों में सवार लोगों से मारपीट करने वालों के रूप में देखा है। हमने उसे अभक्ष्य खाने वाले को मारने वालों के रूप में देखा है। 

हम भारत के लोग आदर्श और धर्म के नाम पर हिंसा को पाल पोस रहे हैं। यह एक दंगे से ज्यादा खतरनाक और खराब है। दंगा सुनियोजित होता है और दंगाई भीड़ में शामिल होते हैं। इससे पूरी भीड़ को कोई लाभ नहीं है , लाभ वही उठाते हैं जिनहोंने इसकी योजना बनायी है। भावना और आस्था भीड़ को पागल बना देती है। गौ रक्षकों के  अपराध  और अभी हाल में राजस्थान के राजसमंद में जो कुछ हुआ वह सब एक दंगे से ज्यादा खतरनाक हैं। क्याोंकि यह एक समूह द्वारा अंजाम दिया जाता है औष्र वह समूह इसमें शामिल नहीं होता और ना हिंसा की जिम्मेदारी लेता है। ये ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि जो हुआ वह कहीं हो सकता है क्याोंकि इसके खिलाफ आवाज के मौके उन्होंने छोड़े नहीं हैं। हिंसा का औचित्य इसके शिकार और इसके वगेधियों के डर के रूप में शामिल होता है। यह ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि इसके स्वरूपको बदलना आसाान नहीं है।ऐसी ​िस्थति में इक राष्ट्र के तौर पर हमारे पास कोई ऐसी संस्था नहीं है जो इसके खिलाफ खड़ी होकर हमारे बुनियादी सामाजिक ताने बाने को बचा सके। इंसानी खून से नहाने वाली भीड़ राष्ट्रवाग्द और बहुलता वाद की धारा में अपने गुनाह धो देती है। राष्ट्रवाद और हिंदूवाद का कवच उनकी हिंसा को ढंक देता है। इसमें निहित स्वार्थ ही सक्रिय है और समाज मुंह के बल गिरा है। राजसमंद की घटना बहुत गंम्भीर है। इसपर जनता , राजनीतिज्ञों और सरकार की  चुप्पी और गंभीर है। यह चुप्पी चीख रही है और यह चीख कह रही है -  

जो आाज इसे मारने आये थे,

 कल तुम्हारे लिये आयेंगे, 

तुम्हारी बेटियों के लिये आायेंगे 

और तब भी तुम चुप रहोगे।

Wednesday, December 6, 2017

बढ़ते अपराध और पुलिस 

बढ़ते अपराध और पुलिस 

शहर के बड़े स्कूल में एक बच्ची से बलात्कार की घटना को यदि पुलिस प्रशासन के निगाह से देखें तो लगता है कि पुलस व्यापक तौर पर अपराध की रोकथाम की मानसिकता पैदा करने में असफल रही है लिहाजा , अपराधी व्यापक रूप में कानून के भय से मुक्त होते जा रहे हैं। मुक्ति का यह भाव कुछ ऐसा हो चुका है कि कुछ भी करने से अब डरते नहीं हैं। बच्ची से कुकर्म वाली घटना तो महज अभिव्यक्ति है समाज के संवेदनशील वर्ग में भी अपराध के प्रति नजरिया बदलने की। इसी कड़ी में देखें एक पॉश और निजी अस्पताल में जीवित बच्चे को मृत कह कर उसे पलास्टिक के थैले में लपेट कर अभिभावकों सौंप देने की, बैंक से कर्ज लेकर विदेश भाग जाने की, संसद की बैठक लगातार टलते जानें की, पुलिस सुधार को राजनीति का शिकार बनाया जाना। ऐसी कई घटनाएं हैं। सभी घटनाओं के चरित्र अलग- अलग हैं पर सबका भाव एक ही है कि उच्च वर्ग में विहित नियमों के प्रति असम्मान, नियमों की अवहेलना। इसका कारण है कि बदलते जमाने के साथ हमारी सरकारें आपरा​धिक प्रशासन का पुनर्गठन नहीं कर सकीं। हाल में जारी हुये एन सी आर बी के 2016 के आंकड़े  बताते हैं कि देश में महज 47 प्रतिशत अपराधों में ही सच्जा हो की है। यानी अपराधों की निष्पत्ति और निष्कर्ष में व्यवस्था नाकाम हो ऱ्ही है। हर बात में सियासत को दोषी बना देना इन दिनों एक फैशन सा हो गया है। हां, सियासत भी एक कारण जरूर है पर वही एकमात्र कारण नहीं है। इसके लिये एक बड़ा दिलचस्प उदाहरण दिल्ली का है। दिल्ली में पुलिस प्रशासन में सियासत की व्यवहारिक दखलंदाजी नहीं के बराबर है। क्योंकि वहां पुलिस कमिश्नर लेफ्टीनेंट गवर्नर को रिपोर्ट करते हैं क्योंकि मुख्यमंत्री नहीं होते हैं। आबादी में मुम्बई से छोटे इस शहर में मुम्बई से दोगुनी पुलिस है। अब गत वर्ष 1 लाख 90 हजार 876 लोगों पर आरोप लगे और उनहें अदालत में पेश किया गया सुनवाई के लिये। जबकि आलोच्य वर्ष में आई पी सी के तहत 9837 लोगों को ही सजा सुनायी जा सकी। दिल्ली में इन गिरफ्तार लोगों में से 58 पतिशत मामलों में ही चार्जशीट दाखिल किये जा सके। दिल्ली में इस अवधि में महिलाओं के खिलाफ 13,803 अपराध दर्ज किये गये जिसमें 4371 मामलों में चर्जशीट नहीं लगी। मुम्बई में इसी अवधि में महिलाओं के खिलाफ 5128 मामले दर्ज हुये जिनें 15 प्रतिशत मामलों में ही फाइनल रिपोर्ट लगी। पुलिस के कामकाज करने की प्रमुख पहचान अपराध दर्ज करते समय सही रिपोर्टिंग ही नहीं है बल्कि यह भी है कितने मामलों में चार्जशीट भी गयी। इसका भी असर आपराधिक आचरण पर  पड़ता है। आधुनिक अपराध अन्वेषण में  डी एन ए परीक्षा और अन्य फोरेंसिक जांच अन्वेषण में मदद पहुच्चते हैं पर इसके लिये कोई आग्रह नहीं दिखता। दिल्ली में इतने अपराध दर्ज हो रहे हैं ओर केवल एक फोरेंसिक जांच लेबोरेटरी है जहां 9 हजार नमूने पेंडिंग पड़े हैं। 5000 डी एन ए नमूने पड़े हैं। महत्वपूर्ण सबूतों के निष्पादन में विलम्ब के कारण एक तरफ न्याया प्रक्रिया अपना काम नहीं कर सकती दूसरी तरफ सबूतों के नमूने नष्ट होते जाते हैं। यही कारण है कि दिलली में अपहरण, बलात्कार और हत्या  की घटनाओं में क्रमश: 21, 24 और 30 प्रतिशत ही फैसले हो पाये हैं। दिलली पुलिस की वेबसाइट के मुताबिक यह दीनया की सबसे बड़ी मेट्रोपोलिटन पुलिस है और उसके  पास बेहतरीन स्पष्टीकरण है कि अपराधी बाहर के लोग हैं इसलिये जांच मुकम्मल नहीं हो पाती। दिलली में मुम्बई से 5 गुना ज्यादा अपराध होते हैं। अपराधों की रोकथाम के लिये दंड निर्णय जरूरी है ओर दूसरी सबसे जरूरी चीज है पुलिस का परस्पर तालमेल। यहां सबसे ज्यादा जरूरी है कि पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही और कामकाजी जिम्मेदारी में फर्क करने की। मसलन , लंदन के मेयर तय करते हैं कि पुलिस प्राथमिकता क्या हो और इसे लागू करने के लिये पुलिस कमिशनर जवाबदेह होते हैं। अपने देश में भी ऑपरेशनल निर्णय का काम पुलिस कमिशनर कों सौंपा जाना चाहिये। यही नहीं हमारी पुलिस व्यवस्था में रोजमर्रा के काम के लिये और जांच के लिये अलग विभाग नहीं हैं। यहां एक समस्या है कि जांच् के हुनर पर आधारित एक कामकाजी व्यवस्था है पुलिस या एक ऐसा बल है जो अपनी सकि1यता का असर दिखाता है। एक और विवाद है कि किस तरह के आचरण को आपराधिक कानून के नियंत्रित किया जाय। पुलिस प्रशासन का मुख्य उद्देश्य अपराध नियंत्रण होना चाहिये। पुलिस को सामाजिक परिवर्तन का कारक नहीं होना चाहिये।      

Tuesday, December 5, 2017

बच्चों को बचायें

बच्चों को बचायें

शहर के एक बड़े स्कूल में चार वर्ष की एक बच्ची के साथ उसके शिक्षक ने बलात्कार किया। बच्ची के साथ क्या हुआ वह खुद नहीं बता सकती क्योंकि उसे अभी तक ये सब बातें मालूम ही नहीं हैं कि उसके साथ क्या हुआ? एक अबोध बच्ची के साथ ऐसी हरकत से मानवता शर्मसार है।  यह कोई ऐसी घटना नहीं है जो पहली बार हुई हो। पिछले कुछ सालों से हमारे देश भारत में जहां कहा जाता था किन यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमंति देवता: , वहां अचानक नारियों - ब​िच्चयों से लेकर बुजुर्ग महिला तक - से बलात्कार की खबरें रोजाना आ रहीं हैं। कुकर्म के इन मामलों का अगर अध्ययन करे तो लगता है कि यह हवस मिटाने के लिये नहीं किया गया है। यह एक अजीब मानसिक प्रक्रिया बनती जा रही है जहां मोह, माया, ममता ,नफासत सबकुछ समाप्त होता जा रहा है। कई ऐसे मामले सुने जाते हैं कि इस तरह की हैवानियत की शिकार बच्ची या लड़की चीखते चिल्लाते दम तोड़ देती है। ऐसा नहीं कि इस तरह की घटना अबे 20या 25 साल पहले नहींी होती थी। यह एक मनोवैज्ञानिक रोग हे जो हर काल में रहा है। फ्रायड ने इसे मूलगत पाप कहा है। सेक्स की यह भूख कभी मिटती नहीं है पर इसकी अभिव्य​क्ति इतने अमानुषिक ढंग से होनी शुरू हुई है यह एक चिंता जनक लक्षण है। यह हर क्षेत्र में हर समाज में हो रहा है।  ऐसा क्यों यह सवाल हर समझदार आदमी के जहन में अठता है। ऐसी हर घटना के बाद यही सोचने पर हम मजबूर हो जाते हैं कि आखिर इंसान इतना क्रूर क्यों हो जाते है? क्या हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां मानुष के वेश में अमानुष बढ़ते जा रहे हैं? यहां सबसे बड़ी बात हे कि हम अपनी ब​िच्चयों को ऐसे अमानुषों से कैसे बचायें? जिस स्कूल में यह घटना घटी वहां चारों तरफ सी सी टीवी कैमरे लग गये ओर सुरक्षा के कई व्यापक बंदोबस्त कर दिये गये हैं। पर क्या यह गारंटी दी जा सकती है कि ऐसा नहीं होगा। 

फोरेंसिक मनोविज्ञान के मुताबिक इक बलात्कारी चाहे वह शिक्षक हो या मजदूर, चाहे वह रिश्तेदार हो या कोई ओर करीबी जो इस तरह के कुकर्म करते हैं वे फोरेंसिक मनोविज्ञान के अनुसार घृ​णित अपराधी होते हैं। किसी बैंक को लूटने के बारे में सोचना और किसी बच्ची से बलात्कार के बारे में साचने की प्रक्रिया इक ही होती है केवल टार्गेट में फर्क होता है। अपराधी पहले योजना बनाता है ओर इक मोडस ऑपरेंडी विकसित करता है। हर चरण मे एक उत्तेजना होती है। अपराध की​ योजना बनाते वक्त , उसे अमल में लाने के दौरान ओर फिर उसके बाद भी।पुलिस से बचने की क्रिया इसे और उत्तेजक बनाती है। अगर वह पकड़ा भी जाता है तो इससे उत्तेजना कम नहीं होती ओर अगर जेल हो भी जाती है तो कई लोगों के लिये वह आगे की योजना बनाने के लिये मुफीद जगह हो जाती है। यही बलात्कारी के साथ भी होता है। बलात्कार को अंजाम देने के पहले वह टागेंट को चुनता है उसकी आदतों पर गौर करता है और फिर हमले की योजना बनाता है, अपराध के बाद बच कर निकल जाने की योजना बनाता है तब कहीं अपराध को अंजाम देता हे। इसमें भी चुनौतियां वैसी ही होती हैं जो एक बैंक लुटेरे के साथ होती हैं। बच्ची के साथ बलात्कार करने वाला अपराधी बेहद शातिर होता है , वह अपने शिकार के मानस का अध्ययन करता है ओर उसकी मानसिक ​स्थिति  का लाभ उठाकर उसके करीब जाता है। छोटी छोटी ब​च्चियां अक्सर इसकी शिकार हो जाती हैं। बच्चे असहाय हो जाते हैं क्योंकि वे बता नहीं पाते कि क्या हुआ उनके साथ। कुकर्मी इसलिये बच जाते हें। इसके लिये जरूरी है कि बच्चें की स्नेह की भूख को मां बाप मिटायें। ये कुकर्मी किसी दूसरे ग्रह के लोग नहीं हैं बल्कि हमारे आपके बीच के ही लोग हैं। बच्चें के स्वभाव में बदलाव को बरीकी से देखें, वह किसकी बात करता है कि शिक्षक या मित्र के अभिभावक  की प्रशंसा करता है। बच्चों के आचरण में बदलाव, उनके शरीर पर कोई निशान , उनका अक्सर डरा डरा सा होना या किसी खास आदमी के आने पर बच्चे का डर जाना इत्यादि कुछ लक्षण है जिसका विश्लेषण जरूरी है। 

Sunday, December 3, 2017

इसकी क्या जरूरत है? 

इसकी क्या जरूरत है? 

तवायफ की तरह अपनी गलतकारी के चेहरे पर,

हुकूमत मंदिर और मस्जिद का पर्दा डाल देती है। 

कैसा जमाना आ गया है , जो लोग देश को विकसित करने का जिम्मा उठाये हुये हैं या जो आम जनता को यह विश्वास दिलाने में लगे हैं कि वे जाति पांति के भेद से उपर उठे हुये इंसान हैं वही आज मुल्क में जातियों का झंडा बड़ी चालाकी से उठाये फिर रहे हैं। अभी गुजरात में चुनाव प्रचार चल रहा है ओर वक्त के हाकिम हमारे प्रधानमंत्री जी की पार्टी राहुल गांधी से पूछ रही है कि वे किस जाति के हैं- हिंदू हैं, पारसी हैं या कैथोलिक इसाई? राहुल भी नर्वस नजर आ रहे हैं। वे भूल रहे हैं और उनका भूलना आश्चर्यजनक है कि कांग्रेस की बुनियाद धर्म निरपक्षिता है। क्या कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के मायने भूल गयी? हाल के दिनों मेंजितने भी चुनाव प्रचार हुये उनमें गुजरात का चुनाव प्रचार सबसे ज्यादा उत्तेजक है। गुजरात के राजनीतिक आचरण का विश्लेषण करें तो एक बात सामने आयेगी कि साधारणतया गुजरात के राजनैतिक नेता एक ही तरह के हैं और वैचारिक रूप में भी मोटा- मोटी समान हैं। अब वे किस पार्टी में शामिल होते हैं वह इस बात पर मुन्हसर करता है कि उनके अनुमान में कौन सी पार्टी जीत रही हे। अब जबसे कांग्रेस ने 2002 के साम्प्रदायिक दंगों के लिये नरेंद्र मोदी को घेरना शुरू किया तो एक नयी तस्वीर उभरने लगी। हवालांकि बहुतों को होगा ​कि कांग्रेस ने 2007 में नरेंद्र मोदी​ के खिलाफ र्मौत का सौदागर जुमला उछाला था लेकिन वह कारगर नहीं हो सका। इसके बाद मोदी जी कि पार्टी  2012 का भी चुनाव जीत गयी। अतएव इस बार कांग्रेस हिंदुत्व का बड़ा ही नरम दांव चल रही है। राहुल गांधी हर मंदिर में जाते हैं बड़ी धूम धाम से पूजा करते हैं ऐसा किस​ी नेता ने अबतक नहीं किया। केवल उस समय को छोड़ कर जब यू पी ए के चार कैबिनेट मंत्री बाबा रामदेव को बधायी देने दिल्ली एयरपोर्ट गये थे। लेकिन गुजरात में हिंदू वोट के लिये बुरी तरह जंग छिड़ चुकी है। यही कारण है कि राहुल ​हिंदु हैं क्या , इस तरह का नकली विवाद के बगूले उठने लगे हैं।यहां एक वित्तम ण्है कि वे मंदिरों के रजिस्टरों में हिंदू या गैर हिंदू की तरह हस्ताक्षर करते हैं। हमें तो यह मालूम नहीं कि हम मुदरों में घुसने समय किसी भी रजिस्टर में हस्ताक्षर करते हैं या नहीं। यहां बात है कि कांग्रेस राहुल गांधी के गैर हिुदू के तौर पर हस्ताक्ष्रर को लेकर ​ इतना परेशान क्यों है? कांग्रेस तो जाति निरपेक्ष और धर्म निरपेक्ष पार्टी है। धर्म या पार्टी का उसके लिये अर्थ नहीं रखती। यहां कांग्रेस एक साधारण ट्रिक भूल रही है। उसे बहुत ही फख्र से एलान करना चाहिये कि वह घेषणा कर दे कि का राहुल बहुजातयिता का प्रतिनिधी है और भारत की विविधता की पहचान है। इसके खानदान को देखें, इसके दादा पारसी थे और पिता आधा ​हिंदू और आधा पारसी। उनकी शादी सोनिया जी से हुई थी जो ईसाई थीं। अतएव राहुल एक हिंदू है., पारसी हैं और ईसाई हैं।  देश मेंं शायद ही कोई पार्टी है जिसमें इतनी विविदाता है। यही नहीं धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस की नीति का आधार रही है तब उसका नर्वस होना समझ में नहीं आया। यहां एक और महत्वूर्ण बात है कि हर धर्म का उपासनास्थल लोगों को अपनी ओरकिर्षित करते हैं। देश के कई चर्च , कई गुरूद्वारे और कई मजार में सभी धर्म कें लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं। जकिसी भी जगह कोई रजिस्टर नहीं रखा है। किसी भी गुरूद्वारे, चर्च , म​स्जिद या मंदिर में जाने के लिये किस ऐसे रजिस्टर की जरूरत नहीं है। यह प्रधानमंत्री का कर्तव्य है कि वह घोषणा करें कि धर्म का उल्लेख जरूरी नहीं है।  

बस तू मिरी आवाज़ में आवाज़ मिला दे

फिर देख कि इस शहर में क्या हो नहीं सकता