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Friday, January 20, 2017

भारत- पाक रिश्ते: बस बातें ही बातें

भारत – पाक रिश्ते : बस बातें ही बातें

 भारत और पाकिस्तान में अमन को लेकर बहस चल पड़ी है। बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के मसायल पर इशारा करते हुये कहा कि पाकिस्तान को भी अमन की राह पर चलना होगा और  हम अकेले या एकतरफा कुछ नहीं कर सकते हैं। उधर दावोस में पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख रहील शरीफ ने गुरूवार को देर रात कहा कि कश्मीर विभाजन से कायम विवाद है जब तक यह समाप्त नहीं हो जाता तब तक दोनों देशों में या उस क्षेत्र में शांति नहीं हो सकती है। राहील शरीफ ने कहा कि कश्मीरियों की अपेक्षा के अनुरूप कश्मीर समस्या का समादान जरूरी है वरना दीक्षण एशिया में स्थाई शांति नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में कोई आतंकी नेटवर्क नहीं हैं और ना ट्रेनिंग कैंप है , सबको नेस्तनाबूद किया जा चुका है। राहिल शरीफ ने अपने देश में हक्कानी नेटवर्क की मौजूदगी की बात को बकवास बताया।

अबसे लगभग एक पखवाड़ा पहले पाकिसतान के प्रधान मंत्री नवाज शरीफ ने कश्मीर पर आयोजित एक सेमिनार में का था कि ‘ पाकिस्तान कश्मीरियों के संघर्ष का समर्थन देता रहेग। कश्मीरी 70 साल से निर्मम दमन के शिकार हो रहे हैं।’  

लेकिन दूसरी तरफ सिडनी की इकॉनोमिक एंड पीस की ताजा रपट में कहा गया है कि दुनिया में आतंकवाद से सर्वादिक पीड़ित दस देशों में भारत सातवें स्थान पर है। रपट में हक्कानी नेटवर्क, अल कायदा, लश्कर-ए – तैयबा, जैश- ए- मोहममद और तहरीक-ए – तालिबान पाकिस्तान के आई एस आई के सहयोग से भारत में गड़बड़ी फैलाते हैं। रपट के अनुसार भारत में आतंकी हमलों में गतवर्ष सबसे ज्यादा सैनि ओर अर्द्ध सैनिक बलों के जवान मारे गये थे।     

 इन घटनाओं के बर अक्स भारत के प्रधानमंत्री के कथन के बाद इस तरह की प्रतिक्रिया का आना इस बात का संकेत है कि निकट भविष्य में खास कर जब तक भारत के पांच राज्यों में चुनाव हैं तब तक किसी प्रकार की शांति वर्ता नहीं हो सकती है।यही नहीं इस तरह की बातों का सदा राजनीतिक अर्थ होता है और ऐसी बातें एक राजनीतिक समरनीति के अंतरगत कही जातीं हैं। यहां दोनों की बातें घरेलू राजनीति आवेष्ठित हैं।  मोदी जी ने रायसिना वार्ता में जो कहा उसका अलावा कुछ कहना पाकिस्तान के प्रति नरम रुख को प्रतिदवनित करता जिसका जोखिम अभी मोदी जी नहीं ले सकते हैं। खास कर ऐसे समय में जब भारतीय क्षेत्र में कई आमतंकी हमले हुय  और सबके आरोप पाकस्तान पर लगाये गये। ऐसे में कुछ भी नरम कहना पाकिस्तान के प्रति नरमी दिखाने के बराबर होगा। राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी और पाकिस्तान के प्रति सावधानी पूर्वक तैयार की गयी नीति पांचो राज्यों में मतदाताओं के बीच अच्छा प्रचार का मसाला है। सरकार इस पाकिस्तान नीति को अपनी दृढ़ता के तौर पर प्रदर्शित कर रही है और इसमें जरा भी ढिलाई राजनीतिक तौर पर हानिकारक हो सकती है। मोदी सरकार ने पाकिस्तान को अलग थलग करने के लिये कूटनीतिक हमले किये हैं और अपना लक्ष्य हासिल करने के लिये वे हर उपलब्ध मंच का उपयोग करते हैं।

 इधर नवाज शरीफ के लिये भी यही समीकरण है। पाकिस्तान में 2018 में चुनाव होने वाले हैं , और वह भारत के कथित ‘अप्रसंगिक या नाजायज मांग के आगे झुक नहीं सकते हैं।’ दोनों तरफ से इसी सियासी लाभ के लिये कठोर बातें कही जा रहीं हैं। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है वहां ऐसे नाजुक मौके पर सेना प्रमुख बदले गये हैं और पाकिस्तान आंतरिक नीतियों को तय करने में सेना की जबरदस्त भूमिका होती है। नये प्रमुख को पड़ोसी देश के आंतरिक डायनामिक्स समझने में थोड़ा समय लगेगा। नवाज शरीफ ने अपने चुनाव के दौरान भारत से अच्छे संबंधों की बात कही थी। यह तो तय है कि दोनों देशों में एक दूसरे के नाम पर चुनाव नहीं लड़े जा सकते हें पर दोनों देशों के जटिल सम्बंधों के इतिहास को देखें तो पायेंगे कि दोनों देशों की आंतरिक राजनीति इन सम्बंधों से प्रभावित जरूर होती है। इसके लिये सार्क सममेलन एक अच्छा मंच था पर भारत ने आतंकी गुटों को लगातार मदद का आरोप लगाते हुये उसमें शामिल होने से इंकार कर दिया। इसके पहले अपने शपथ ग्रहण समारोह में मोदी जी ने सभी सार्क नेताओं को आमंत्रित किया था और इसके बाद बिना किसी घोषणा के खुद लाहौर गये भी थे जिसे बहुतों ने हवा का रुख बदलने वाला करार दिया था। पर इसके जवाब में पाकिस्तान और आतंकियों को भारत भेज दिया। पाकिस्तान के ये संकेत भविष्य की झलक हैं। आने वाले दिनों में खास कर चुनाव के दौरान आतंकी हमले या कश्मीर में गड़बड़ी बढ़ सकती है।

 

    

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